Litchi Crop Damage: उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में पारा चढ़ने के साथ ही लीची की खेती करने वाले किसानों की चिंताएं बेहद बढ़ गई हैं। लखीमपुर खीरी जिले सहित कई इलाकों में तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण पेड़ों पर लटकी लीची के फल बीच से फटने लगे हैं। इस समस्या की वजह से फल का रंग और उसकी क्वालिटी खराब हो रही है, जिससे बाजार में किसानों को सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं। कृषि एक्सपर्ट्स का मानना है कि मई और जून का महीना लीची की फसल के लिए सबसे नाजुक समय होता है। ऐसे में बागवानों की जरा सी लापरवाही पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है। बागों में लीची के फटने (फ्रूट क्रैकिंग) की बढ़ती समस्या को देखते हुए सरकारी महकमे ने एडवाइजरी जारी कर किसानों को तुरंत जरूरी कदम उठाने की सलाह दी है।
Litchi Crop Damage: क्यों फट जाता है लीची का फल? जिला उद्यान अधिकारी ने समझाया गणित
लखीमपुर खीरी के जिला उद्यान अधिकारी मृत्युंजय सिंह ने इस समस्या के पीछे के वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारणों को विस्तार से साझा किया है। उन्होंने बताया कि जब लंबे समय तक बाग की मिट्टी में नमी की कमी रहती है और अचानक किसान एक साथ बहुत सारा पानी खेत में भर देते हैं, तो लीची का पौधा तेजी से पानी सोखने लगता है। इस अचानक मिली नमी के कारण फल का अंदरूनी हिस्सा यानी गूदा बहुत तेजी से बढ़ता है, जबकि पानी की कमी से पहले से ही सूख चुका बाहरी छिलका उस दबाव को झेल नहीं पाता और बीच से फट जाता है।
इसके अलावा मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी भी एक बड़ी वजह है। जब मिट्टी में कैल्शियम, बोरॉन और पोटाश जैसे जरूरी तत्वों की कमी होती है, तो फल की बाहरी परत यानी छिलका मजबूत नहीं बन पाता। मौसम के बदलते मिजाज और दिन-रात के तापमान में बड़े अंतर के कारण फल के अंदरूनी हिस्से में एक हाई प्रेशर बनता है जो छिलके को फाड़ देता है।
बाजार में मांग भरपूर, लेकिन किसानों को सता रहा है नुकसान का डर
गर्मियों के इस मौसम में लीची की मांग बाजारों में बहुत ज्यादा रहती है। स्वाद में मीठी और रसीली होने के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो चिलचिलाती गर्मी में शरीर को तुरंत ताजगी देते हैं। इस समय खुदरा बाजार में लीची 100 रुपये से लेकर 120 रुपये प्रति किलो के ऊंचे भाव पर बिक रही है।
इतनी अच्छी मांग के बावजूद बागवान परेशान हैं। लखीमपुर खीरी जिला वैसे तो पारंपरिक रूप से गन्ना और धान की बंपर पैदावार के लिए जाना जाता है, लेकिन पिछले कुछ सालों में यहां के किसानों ने बड़े पैमाने पर लीची की बागवानी शुरू की है। अब जब पेड़ों पर लाल-लाल लीची के गुच्छे तैयार हैं, तब इस बीमारी ने दस्तक दे दी है। फटे हुए फलों को मंडी में कोई व्यापारी उचित दाम पर खरीदने को तैयार नहीं होता, जिससे सीधे तौर पर किसानों की लागत डूबने की कगार पर पहुंच गई है।
Litchi Crop Damage: किसान अपनी फसल को कैसे बचाएं? जानिए बचाव के आसान तरीके
जिला उद्यान विभाग ने इस नुकसान से बचने के लिए किसानों को कुछ बेहद सरल और वैज्ञानिक उपाय सुझाए हैं, जिन पर अमल करके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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नियमित हल्की सिंचाई: बागों में एक साथ ज्यादा पानी भरने के बजाय हल्के अंतराल पर नियमित सिंचाई करें ताकि मिट्टी में नमी का स्तर एक समान बना रहे। इसमें ड्रिप सिंचाई तकनीक सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित होती है।
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बौछार सिंचाई (स्प्रिंकलर): लीची के पेड़ों पर ऊपर से पानी की बौछार करने से पेड़ों के आसपास का तापमान कम रहता है और फल का छिलका मुलायम बना रहता है, जिससे वह फटता नहीं है।
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मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल: पेड़ों के तने के आसपास सूखी घास, पुआल, भूसा या प्लास्टिक की मल्चिंग शीट बिछा दें। इससे तेज धूप में भी जमीन की नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
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बोरेक्स का छिड़काव: जिन पेड़ों पर फल फटने की समस्या बहुत ज्यादा दिख रही है, वहां 0.2 प्रतिशत बोरेक्स के घोल का छिड़काव करें। 15 दिनों के अंतराल पर दो बार यह छिड़काव करने से फल मजबूत होते हैं और क्रैकिंग बंद हो जाती है। इसके साथ ही कैल्शियम और पोटाश का संतुलित इस्तेमाल करें।
इसके साथ ही बागवानों को सलाह दी गई है कि वे फलों के पूरी तरह पकने का इंतजार न करें और सही समय पर ही फलों की तुड़ाई कर लें। देर से की गई तुड़ाई भी फलों के फटने का एक मुख्य कारण बनती है। अधिकारियों का कहना है कि इन उपायों को अपनाकर किसान अपनी मेहनत की फसल को बचा सकते हैं और मंडी में लीची का बेहतरीन भाव हासिल कर सकते हैं।
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