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Muzaffarpur Shahi Litchi: मुजफ्फरपुर की शाही लीची पर मौसम की दोहरी मार फसल को भारी नुकसान चिंता में डूबे किसान

Muzaffarpur Shahi Litchi: देश-दुनिया में अपनी अनूठी मिठास और खास खुशबू के लिए प्रसिद्ध बिहार के मुजफ्फरपुर की शाही लीची पर इस बार प्रकृति का सबसे क्रूर प्रहार हुआ है। उत्तर बिहार के बागानों में इस साल बदलते मौसम, सर्दियों में कम ठंड और मार्च-अप्रैल में अचानक बढ़े पारे ने लीची की फसल को करीब 70 फीसदी तक तबाह कर दिया है। हालत यह है कि जो बागान मई के महीने में गहरे गुलाबी और लाल रंग के रसीले फलों से लदे दिखाई देते थे, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है और किसान अपनी बर्बाद हो चुकी उपज को देखकर गहरे आर्थिक संकट की चिंता में डूबे हुए हैं।

जलवायु परिवर्तन और बेमौसम बारिश के साथ-साथ कीटों के अप्रत्याशित हमले ने मुजफ्फरपुर समेत वैशाली और पश्चिम चंपारण के लीची बेल्ट की कमर तोड़कर रख दी है। कृषि वैज्ञानिकों और स्थानीय किसान संघों द्वारा किए गए शुरुआती आकलनों के मुताबिक, इस साल बागानों में केवल 30 प्रतिशत ही लीची सुरक्षित बची है, जिससे बाजार में इसकी आपूर्ति बेहद कम होने वाली है। लीची के इस बड़े संकट ने न केवल स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है, बल्कि इस सीजन में देश के कोने-कोने में रहने वाले लीची प्रेमियों के लिए भी इस खास फल का स्वाद लेना काफी मुश्किल और महंगा होने वाला है।

Muzaffarpur Shahi Litchi: देश के सबसे बड़े लीची हब में छाया सन्नाटा केवल तीस फीसदी पैदावार की उम्मीद

मुजफ्फरपुर को भारत में लीची की राजधानी का दर्जा हासिल है, जहां की मिट्टी और जलवायु इस फल के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। बिहार लीची एसोसिएशन के अध्यक्ष बच्चा सिंह ने बागानों की मौजूदा स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि इस साल की स्थिति पिछले कई दशकों में सबसे खराब है। बागानों में पेड़ों पर फलों की संख्या नाममात्र की रह गई है, जिससे पूरा व्यापारिक गणित गड़बड़ा गया है। स्थानीय फल मंडियों में काम करने वाले व्यापारियों और बागान मालिकों के बीच इस समय छाई खामोशी साफ बयां कर रही है कि नुकसान का दायरा कितना बड़ा है।

एक अन्य अनुभवी किसान सुरेश चौधरी ने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि हर साल मई के दूसरे पखवाड़े तक पेड़ों की हरी पत्तियों के बीच लटकते खूबसूरत लाल गुच्छे हर किसी का मन मोह लेते थे। इस बार जब आप बागानों के भीतर जाएंगे तो आपको निराशा के अलावा कुछ दिखाई नहीं देगा। फल न केवल आकार में छोटे रह गए हैं बल्कि उनकी तादाद इतनी कम है कि लागत निकालना भी असंभव लग रहा है। किसानों ने बैंकों से जो लोन लिए थे या स्थानीय साहूकारों से बागान लीज पर लेने के लिए जो अग्रिम भुगतान किया था, वह पूरी तरह डूबने की कगार पर है।

सर्दियों में कम ठंड और मार्च में कीटों के हमले ने कैसे बिगाड़ा पूरी फसल का खेल

फसल की इस दुर्दशा के पीछे की तकनीकी और वैज्ञानिक वजहों का खुलासा करते हुए राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास ने बताया कि यह संकट मुख्य रूप से तीन अलग-अलग चरणों में मौसम के प्रतिकूल व्यवहार के कारण पैदा हुआ है। सबसे पहली गड़बड़ी नवंबर और दिसंबर 2025 के महीनों में हुई, जब उत्तर भारत में सामान्य से काफी कम ठंड पड़ी। लीची के पेड़ों में बेहतर फ्लावरिंग यानी फूल आने के लिए सर्दियों में एक निश्चित न्यूनतम तापमान और पर्याप्त ठंड की जरूरत होती है। ठंड कम पड़ने की वजह से पेड़ों पर समय से फूल आने के बजाय नई कोपलें और पत्तियां निकल आईं, जिसने शुरुआती चक्र को ही बिगाड़ दिया।

इसके बाद जब फरवरी और मार्च के महीने में बची-कुची फ्लावरिंग शुरू हुई, तो आसमान में लगातार बादल छाए रहने और बिना मौसम की अनियोजित बारिश ने रही-सही कसर पूरी कर दी। इस उमस भरे और नमी वाले माहौल के कारण बागानों में ‘फ्लोवर वेबर’ नामक खतरनाक कीट का प्रकोप तेजी से फैल गया। इस कीट ने पेड़ों पर आए फूलों को जाले में लपेटकर पूरी तरह नष्ट कर दिया। जो थोड़े-बहुत फूल फल में तब्दील हो पाए, वे अप्रैल और मई की शुरुआत में पड़ी रिकॉर्डतोड़ भीषण गर्मी और तेज पछुआ हवाओं के कारण समय से पहले ही टूटकर जमीन पर गिर गए। इन तीनों प्राकृतिक मारों ने मिलकर पूरी फसल को नेस्तनाबूद कर दिया।

जीआई टैग वाली शाही लीची का गणित बिगड़ा हजारों डिब्बों की जगह चंद बॉक्स ही बचे

भारत के कुल लीची उत्पादन में अकेले बिहार की हिस्सेदारी लगभग 43 प्रतिशत है, जिसमें से सबसे बड़ा हिस्सा मुजफ्फरपुर जिले के करीब 12,000 हेक्टेयर में फैले बागानों से आता है। यहां की विशेष ‘शाही लीची’ को अपनी बेमिसाल गुणवत्ता के कारण भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग भी प्राप्त है। इस विशिष्ट दर्जे के कारण देश के बड़े महानगरों के साथ-साथ विदेशों में भी इसकी भारी मांग रहती है, लेकिन इस साल इस अंतरराष्ट्रीय ब्रांड पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

बागान मालिक भोला नाथ झा ने आंकड़ों के जरिए नुकसान की भयावहता को स्पष्ट करते हुए बताया कि उनके पास करीब 40 से 50 एकड़ का बड़ा बागान है। सामान्य वर्षों में इस क्षेत्र से वे आसानी से 25,000 बॉक्स लीची की पैकिंग करके देश की विभिन्न मंडियों में भेजते थे। इस साल पूरी मेहनत और कीटनाशकों के भारी छिड़काव के बावजूद उनके बागान से बमुश्किल 7,000 से 8,000 बॉक्स ही निकलने की उम्मीद है। उत्पादन में आई यह भारी गिरावट यह दर्शाती है कि इस बार लीची की रिटेल कीमतें आसमान छूने वाली हैं और आम उपभोक्ताओं की जेब पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

Muzaffarpur Shahi Litchi: बदलती जलवायु से प्रभावित हो रही फलों की गुणवत्ता वैज्ञानिक भी मान रहे बड़ा संकट

बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मोहम्मद फेजा अहमद ने इस स्थिति पर अपनी राय देते हुए कहा कि लीची एक बेहद संवेदनशील फल है, जिसे पकने और तैयार होने के लिए एक बेहद सटीक तापमान, हवा में निश्चित नमी और अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। पिछले कुछ वर्षों से अप्रैल और मई के दौरान बार-बार आने वाले आंधी-तूफान, तेज गर्म हवाओं और अचानक बढ़ते पारे ने लीची के पौधों के जैविक चक्र को पूरी तरह प्रभावित किया है। इस मौसम परिवर्तन के कारण न केवल फल की मात्रा कम हो रही है, बल्कि जो फल पेड़ों पर बच रहे हैं, उनके छिलके फटने और गूदे की मिठास कम होने जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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