Sawan Geet Bihar and UP: जब जेठ की तपती दुपहरी के बाद आसमान में काले कजरारे बादल घिर आते हैं और मिट्टी सोंधी खुशबू के साथ सावन की पहली फुहार का स्वागत करती है, तब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों की पगडंडियों पर एक मधुर तान गूंजने लगती है ‘कजरी’। यह सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि सावन के उल्लास, विरह की वेदना और प्रकृति के सौंदर्य का वो संगम है, जो सदियों से हमारी लोक संस्कृति की पहचान बना हुआ है। सोमवार, 8 जून 2026 को जब हम सावन की दहलीज पर खड़े हैं, तो चलिए जानते हैं कि आखिर क्यों झूलों के साथ कजरी का ये रिश्ता इतना गहरा है और इसके पीछे का इतिहास क्या है।
Sawan Geet Bihar and UP: क्या है कजरी और कैसे हुई इसकी शुरुआत?
‘कजरी’ शब्द की उत्पत्ति हिंदी के ‘कजली’ या ‘काजल’ शब्द से मानी जाती है। जैसे आंखों में काजल की गहराई होती है, वैसे ही सावन के काले बादलों की सघनता को दर्शाने के लिए इसे कजरी कहा गया। ऐतिहासिक रूप से इसकी जड़ें उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती हैं। कहा जाता है कि मिर्जापुर की लोकगाथाओं से निकलकर यह विधा बनारस, भोजपुर और फिर पूरे मिथिलांचल तक फैल गई। आज यह बिहार की रग-रग में बस चुका है।
हालांकि कजरी को उप-शास्त्रीय संगीत (Semi-Classical Music) का दर्जा भी प्राप्त है, लेकिन इसकी असली आत्मा ग्रामीण अंचलों के खेतों और झूलों में ही बसती है। शास्त्रीय संगीत के मंचों पर जहां इसे रागों में पिरोया जाता है, वहीं गांवों में इसे महिलाएं अपनी सहज और सुरीली आवाज में सामूहिक रूप से गाती हैं।
महिलाओं के उल्लास और विरह की कहानी
बिहार में कजरी मुख्य रूप से महिलाओं का गीत है। सावन और भादो के महीने में जब बारिश की बूंदें धरती को भिगोती हैं, तो महिलाएं और लड़कियां पेड़ों पर ऊंचे झूले डालती हैं। झूला झूलते हुए जब वे कजरी गाती हैं, तो पूरा माहौल संगीतमय हो जाता है। यह गीत केवल खुशी का प्रतीक नहीं है, बल्कि पुराने समय में यह ‘विरह’ यानी जुदाई का दुख व्यक्त करने का माध्यम भी था।
पहले के दौर में जब पुरुष रोजगार के लिए परदेस (कोलकाता या अन्य शहर) चले जाते थे, तो सावन के रोमांटिक मौसम में महिलाएं अपने पति की याद में कजरी गाती थीं। उन गीतों में सखी-सहेलियों के साथ अपनी व्यथा बांटना और बादलों के जरिए संदेश भेजना एक आम विषय हुआ करता था। आज भी खेतों में धान की रोपनी करते समय महिलाएं साथ मिलकर कजरी गाती हैं, जिससे कठिन परिश्रम भी संगीत की लय में बदल जाता है।
कजरी का धार्मिक आधार और राधा-कृष्ण की लीलाएं
कजरी का एक गहरा धार्मिक पक्ष भी है। इसे देवी विंध्यवासिनी (मिर्जापुर) के गुणगान से जोड़कर देखा जाता है। इसके अलावा, सावन का महीना भगवान शिव और श्री कृष्ण की लीलाओं का होता है। कजरी के बोल अक्सर राधा और कृष्ण के प्रेम, झूला झूलने की कहानियों और ‘रे हरी’ की तान के इर्द-गिर्द घूमते हैं।
जैसे चैत के महीने में गाई जाने वाली ‘चैती’ में ‘हो रामा’ की टेक आती है, वैसे ही कजरी के गीतों के अंत में ‘रे हरी’ का प्रयोग इसकी पहचान है। उदाहरण के लिए“रिमझिम बरसे पनिया, झूले राधा रनिया रे हरी…”। यह धार्मिक जुड़ाव ही है जिसने कजरी को केवल एक मनोरंजन का साधन न रहकर एक सांस्कृतिक उत्सव बना दिया है।
Sawan Geet Bihar and UP: पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती विरासत
कजरी की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी मौखिक परंपरा है। इसके लिए किसी संगीत विद्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बिहार के घरों में दादी-नानी अपनी बहुओं और बेटियों को कजरी के बोल विरासत में देती हैं। मां से बेटी और सास से बहू तक यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। यह लोकगीत पीढ़ियों के बीच एक पुल का काम करता है, जो आधुनिकता के इस दौर में भी हमें अपनी जड़ों से जोड़े हुए है।
आज के डिजिटल युग में भले ही हम पॉप और फिल्मी गानों की ओर बढ़ रहे हों, लेकिन सावन में जब बिजली कड़कती है और कोयल कूकती है, तो दिल के किसी कोने से आज भी कजरी की वो पुरानी तान ही फूटती है। कजरी के बिना बिहार का सावन आज भी अधूरा ही लगता है।
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