BRICS Summit 2026: राजधानी दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स समिट की तैयारियां जोरों पर हैं, मगर ठीक इसी बीच एक ऐसा ऐलान हुआ है जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने 5 सितंबर को दिल्ली में बड़े प्रदर्शन का एलान कर दिया है, और यह तारीख किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकती है कि आखिर इतने अहम अंतरराष्ट्रीय आयोजन से ठीक पहले यह कदम क्यों उठाया गया। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह वाकई युवाओं की जायज मांग है, या फिर किसी और मकसद से जुड़ा मामला।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी में होने वाले इस ब्रिक्स समिट में ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका समेत कई देशों के नेता शामिल होने वाले हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सात साल बाद भारत आने की चर्चा भी जोरों पर है, और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी इस बैठक में हिस्सा लेने वाले हैं। ऐसे बड़े मंच से ठीक एक हफ्ता पहले सीजेपी का यह ऐलान दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए नई चुनौती बनता दिख रहा है।

BRICS Summit 2026: जुलाई में अधूरी रह गई थीं तीन बड़ी मांगें
सीजेपी का कहना है कि जुलाई महीने में सरकार की तरफ से जो आश्वासन दिए गए थे, वे अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं। यही वजह है कि संगठन को दोबारा सड़क पर उतरने का फैसला लेना पड़ा। दरअसल जुलाई में सीजेपी ने जंतर मंतर पर करीब 36 से 37 दिनों तक लगातार आंदोलन चलाया था। यह आंदोलन नीट-यूजी पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शुरू हुआ था।
20 जुलाई को जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, तो पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल कर भीड़ को रोका। इस दौरान कई युवा घायल हुए थे। बाद में सरकार और संगठन के बीच बातचीत हुई और 25 जुलाई को आंदोलन वापस ले लिया गया। इसी दौरान तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया था।

मुआवजा, एफआईआर वापसी और माफी की मांग अब भी अधूरी
सीजेपी का आरोप है कि एक महीना बीत जाने के बाद भी तीन अहम मांगें पूरी नहीं हुई हैं। इनमें मुआवजे का भुगतान, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना, और पुलिस तथा आरएएफ की तरफ से माफी मांगना शामिल है। संगठन की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि उनके धैर्य को कमजोरी न समझा जाए और सरकार अच्छे विश्वास का फायदा न उठाए।
सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने साफ चेतावनी दी है कि अगर मांगें नहीं मानी गईं तो 5 सितंबर को प्रदर्शन तय है। इस बार मार्च इंडिया गेट से शुरू होकर दिल्ली पुलिस मुख्यालय की तरफ जाएगा। खास बात यह है कि इस मार्च की अगुवाई उन परिवारों के हाथों में होगी, जिनके बच्चे नीट परीक्षा की अनियमितताओं के बाद आत्महत्या कर चुके हैं। साथ ही जुलाई के प्रदर्शन में पुलिस कार्रवाई का सामना कर चुके युवा भी इसमें शामिल होंगे। संगठन ने छात्रों और युवा संगठनों से अपील की है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से इस मार्च में हिस्सा लें।

BRICS Summit 2026: टाइमिंग पर उठ रहे सवाल, सरकार अभी चुप
देखने पर लगता है कि इस प्रदर्शन के समय को लेकर ही सबसे ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं। ब्रिक्स समिट भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि साबित हो सकता है, जिसमें वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने, भुगतान व्यवस्था को जोड़ने और डिजिटल सहयोग बढ़ाने जैसे मुद्दे चर्चा में रहेंगे। ऐसे मौके पर जब दुनिया भर की नजरें दिल्ली पर होंगी, सड़कों पर प्रदर्शन और संभावित तनाव भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर डाल सकता है।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं की समस्याएं वाकई गंभीर हैं, मगर प्रदर्शन का समय और तरीका जरूर सवाल खड़े करता है। वहीं दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि यह सिर्फ मुआवजे और एफआईआर वापसी की लड़ाई भर नहीं, बल्कि कहीं बड़े मकसद से जुड़ी रणनीति भी हो सकती है। जानकार बताते हैं कि इस पूरे मसले को दो नजरिए से देखा जा रहा है, एक तरफ लोकतांत्रिक अधिकार की बात हो रही है तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय छवि की चिंता जताई जा रही है।
फिलहाल सरकार की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस दोनों ही इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट भी जुलाई की घटनाओं को लेकर सक्रिय रहा है। अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जबरदस्ती कार्रवाई न करने के निर्देश दिए थे, और हाल ही में एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की बात भी सामने आई है, जिसमें पूर्व जज और पूर्व सीबीआई प्रमुख को शामिल किया जा सकता है।

BRICS Summit 2026: दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए दोहरी चुनौती
एक तरफ ब्रिक्स समिट की तैयारियां चल रही हैं तो दूसरी तरफ 5 सितंबर के प्रदर्शन की आहट भी सुनाई दे रही है। लेफ्टिनेंट गवर्नर हाल ही में समिट से जुड़ी व्यवस्थाओं का जायजा ले चुके हैं, और सुरक्षा एजेंसियां हर स्तर पर सतर्क हैं। ट्रैफिक, होटल, एयरपोर्ट जैसी हर व्यवस्था को लेकर तैयारी जोरों पर चल रही है। ऐसे माहौल में 5 सितंबर का प्रदर्शन प्रशासन के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।
सीजेपी मूल रूप से एक ऑनलाइन व्यंग्य मंच के तौर पर शुरू हुई थी, जो बाद में एक चीफ जस्टिस की टिप्पणी के बाद युवा आंदोलन में बदल गई। ‘कॉकरोच’ शब्द को अपनाकर संगठन ने अपने गुस्से को एक पहचान दी। परीक्षा लीक जैसे मुद्दे बार-बार सामने आते रहे हैं, और इससे कई परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। मुआवजे और जवाबदेही की मांग को काफी हद तक जायज माना जा रहा है, हालांकि जुलाई के प्रदर्शन के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा भी देखने को मिली थी। पुलिस का कहना था कि अनधिकृत मार्च और बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की वजह से कार्रवाई करनी पड़ी।
दिल्लीवासी अब एक साथ दो बड़े घटनाक्रमों को करीब से देख रहे हैं। एक तरफ दुनिया भर के नेता राजधानी में जुटेंगे और भारत वैश्विक सहयोग की तस्वीर पेश करेगा, तो दूसरी तरफ अपने ही युवा सड़क पर उतरकर जवाबदेही मांगेंगे। 5 सितंबर और उसके ठीक बाद 12-13 सितंबर, यह दोनों तारीखें दिल्ली की सड़कों और सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से बेहद अहम साबित हो सकती हैं। युवाओं की समस्याएं नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं, वहीं अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि भी उतनी ही मायने रखती है। फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार आने वाले दिनों में क्या रुख अपनाती है और प्रदर्शन आखिरकार शांतिपूर्ण रहता है या नहीं।
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Sanjana Gupta
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