Punjab Politics: पंजाब की सियासत में इन दिनों एक पुरानी दोस्ती के फिर से लौटने की चर्चा जोरों पर है। अगले साल की शुरुआत में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, और ठीक इसी वक्त भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के गठबंधन को लेकर कयासों का बाजार गर्म हो गया है। ऊपर से भाजपा भले ही यह कहती दिखे कि वह सभी 117 सीटों पर अकेले लड़ेगी, लेकिन पर्दे के पीछे की तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है।
सूत्रों की मानें तो सुखबीर सिंह बादल की अगुवाई वाले अकाली दल और भाजपा के बड़े नेताओं के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत का दौर चल रहा है। मगर सवाल यही है कि आखिर पांच साल पुराना यह रिश्ता अब तक सिरे क्यों नहीं चढ़ पाया है? इसका जवाब जितना सीधा लगता है, असल में उतना है नहीं।
Punjab Politics: कृषि कानूनों ने बिगाड़ी थी बात, अब सुधरने की कवायद
बात 2020 की है, जब केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने एनडीए का साथ छोड़ दिया था। उस वक्त शायद ही किसी को अंदाजा रहा हो कि यह दूरी इतनी लंबी खिंच जाएगी। इसके बाद 2022 का विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव, दोनों दलों ने अलग-अलग राह पर चलकर लड़े।
नतीजा दोनों के लिए ही निराशाजनक रहा। 2022 में आम आदमी पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई, और 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा और अकाली दल, दोनों ही मुख्य मुकाबले से बाहर हो गए। यही वह दर्द है जो अब दोनों को फिर एक साथ ला खड़ा कर रहा है।
अकाली दल की इकलौती लोकसभा सांसद हरसिमरत कौर बादल, उनके भाई और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया समेत पार्टी के कई कद्दावर नेता खुलकर गठबंधन की पैरवी कर रहे हैं। मगर देखने पर लगता है कि यह मामला सिर्फ नेताओं की इच्छा भर से नहीं सुलझने वाला।
भाजपा का पलड़ा अब पहले से कहीं भारी
यहीं से असली ट्विस्ट शुरू होता है। 2024 लोकसभा चुनाव के आंकड़े उठाकर देखें तो कहानी पूरी तरह पलट चुकी है। भाजपा का वोट शेयर 9 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी पर पहुंच गया, यानी ठीक दोगुना। दूसरी तरफ अकाली दल का वोट शेयर 27 फीसदी से गिरकर महज 13 फीसदी रह गया।
सोचने वाली बात यह है कि भाजपा को भले ही पंजाब में अभी तक कोई सीट न मिली हो, लेकिन जमीन पर उसका आधार लगातार मजबूत हुआ है। शहरी हिंदू वोटर तो पहले से उसके साथ था ही, अब पार्टी ने ग्रामीण इलाकों में दलित और सिख वोटरों के बीच भी सेंध लगानी शुरू कर दी है। जबकि अकाली दल का पारंपरिक वोट बैंक आधा रह गया है।
जाहिर है, बातचीत की मेज पर अब भाजपा कमजोर पार्टनर नहीं, बल्कि बड़े भाई की भूमिका में नजर आ रही है। और यही बात अकाली दल के लिए सबसे बड़ी चिंता की वजह बनी हुई है।
पुराने साथी अब दूसरे खेमे में, बढ़ी मुश्किल
गठबंधन की राह में सबसे बड़ा रोड़ा शायद यही है। 2020 के बाद से अकाली दल और कांग्रेस के कई पुराने चेहरे भाजपा का दामन थाम चुके हैं। माझा क्षेत्र, जो कभी अकाली दल का गढ़ माना जाता था, वहां के पूर्व विधायक अमरपाल बोनी, मनजीत सिंह मन्ना और रवि करण सिंह काहलों जैसे नेता अब भाजपा में हैं।
इतना ही नहीं, कांग्रेस से आए केवल ढिल्लों और पूर्व केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जैसे नाम भी भाजपा के साथ खड़े हैं, जो कभी अकाली दल के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते थे। एक और दिलचस्प नाम है एचएस फुल्का का। 1984 के सिख विरोधी दंगा पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए मशहूर यह वरिष्ठ वकील और आप के पूर्व नेता भी अब भाजपा में शामिल हो चुके हैं, और वे बादल परिवार के धुर विरोधी रहे हैं।
अब जरा सोचिए, ऐसे में अकाली और भाजपा नेता एक ही मंच पर कैसे खड़े होंगे? कार्यकर्ताओं के स्तर पर वोट ट्रांसफर कराना तो और भी टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
पंथिक वोट बैंक पर भी मंडरा रहा खतरा
अकाली दल इस वक्त चारों तरफ से घिरा हुआ नजर आता है। एक ओर अमृतपाल सिंह के ‘वारिस पंजाब दे’ और कुछ दूसरे अकाली धड़े उसके पंथिक यानी सिख धार्मिक वोट बैंक में सीधी सेंध लगा रहे हैं। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस भी अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हैं।
जानकार बताते हैं कि इसी दबाव के चलते अकाली दल को भाजपा जैसे मजबूत सहारे की जरूरत महसूस हो रही है। मगर पार्टी के भीतर ही एक धड़ा यह मानता है कि आज की भाजपा वह पुरानी भाजपा नहीं रही, जो अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर में हुआ करती थी।
मौजूदा भाजपा अब पंजाब में महज सहयोगी नहीं, बल्कि बड़े भाई की भूमिका चाहती है। और सबसे अहम बात, वह सिख बहुल सीटों पर भी अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है, जो कभी अकाली दल का अपना दायरा माना जाता था। यही वह पेंच है, जिसने पूरी गठबंधन वार्ता को अटका रखा है।
Punjab Politics: आम जनता के लिए क्या मायने रखता है यह सियासी उठापटक
पंजाब की जनता के लिए यह सिर्फ दो पार्टियों की सौदेबाजी भर नहीं है। किसान आंदोलन के दौरान जिस मुद्दे पर अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ा था, वह अब भी लोगों के जेहन में ताजा है। ऐसे में गठबंधन होता है तो पार्टी को अपने पुराने रुख पर सफाई देनी पड़ सकती है, और वोटरों के भरोसे की परीक्षा भी नए सिरे से होगी।
पंजाब के लोग बार-बार बदलते सियासी समीकरणों से थोड़े ऊब भी चुके हैं, यह कहना गलत नहीं होगा। ऐसे में यह गठबंधन बनेगा या नहीं, इसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर पड़ना तय है।
कुल मिलाकर पंजाब की सियासत इस वक्त एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है, जहां पुरानी दोस्ती और नए समीकरण आपस में उलझे हुए हैं। अकाली दल को जहां भाजपा के सहारे की दरकार है, वहीं भाजपा अब बराबरी की नहीं, बड़े भाई की हैसियत में बातचीत करना चाहती है। दलबदल और बदलते वोट बैंक ने मामले को और पेचीदा बना दिया है। आने वाले कुछ हफ्तों में यह साफ हो सकता है कि दोनों दल पुराना गठबंधन बहाल करते हैं या फिर अलग-अलग राह पर ही आगे बढ़ते हैं। फिलहाल पंजाब की राजनीति पर हर किसी की नजर टिकी हुई है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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