Bihar Jharkhand Water Dispute: बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी को लेकर दशकों पुरानी खींच खत्म होने की खबर सोमवार को आई। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली बैठक में सहमति बनी। उन्होंने इसे किसानों और राज्य के हित में बड़ी उपलब्धि बताया।
झारखंड अलग राज्य बना तब से यह हिसाब अधूरा था। अब कागज पर बंटवारा तय होने की बात कही जा रही है। कितना पानी नहर में सचमुच उतरेगा, यह अगला अध्याय है। बैठक में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मौजूद रहने का उल्लेख है।
Bihar Jharkhand Water Dispute: दिल्ली में क्या हुआ
सम्राट चौधरी के पोस्ट के अनुसार विवाद 26 साल से लंबित था। केंद्र की मध्यस्थता में दोनों राज्य एक टेबल पर आए। पूर्वी आंचलिक परिषद की पिछली बैठकों और केंद्रीय जल आयोग से जुड़ी तकनीकी समिति की चर्चा का हवाला पहले से खबरों में था। सोमवार की बैठक उसी कड़ी का औपचारिक पड़ाव बताई जा रही है।
मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री का आभार जताया। झारखंड के लोगों को भी लाभ मिलने की बात उन्होंने कही। राजनीतिक स्वर अलग-अलग हो सकते हैं, पानी का फॉर्मूला एक ही दस्तावेज में बंधेगा। हस्ताक्षर और राजपत्र की प्रति सार्वजनिक होने पर शर्तें साफ होंगी।
पानी का हिसाब रिपोर्टों में क्या है
अविभाजित बिहार को 1973 के बानसागर समझौते में सोन बेसिन से जुड़ा हिस्सा मिला था। कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट के उस हिस्से को अब दो राज्यों में बांटने की चर्चा है। कई रिपोर्टों में बिहार के लिए 5.75 और झारखंड के लिए 2.0 मिलियन एकड़ फीट का आंकड़ा लिखा गया है।
यह आंकड़ा समाचार स्रोतों का सार है। अंतिम समझौतानामा आने तक इसे मसौदा समझें। झारखंड को पहली बार स्पष्ट हक मिलना राज्य के लिए नई बात मानी जा रही है। बिहार के लिए पुरानी व्यवस्था का नया बंटवारा है। दोनों तरफ संतोष और सवाल साथ रह सकते हैं। देखने पर लगता है कि आंकड़ा तय करना आसान हिस्सा था, नहर और जलाशय पर अमल कठिन रहेगा।
किसानों तक पानी कैसे पहुंचेगा
सम्राट चौधरी ने कहा कि सिंचाई के लिए उपलब्धता बढ़ेगी। सोन नहर प्रणाली भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, पटना, गया, अरवल जैसे जिलों से जुड़ी रही है। गर्मी में नहर सूखे तो फसल पहले पूछती है, प्रेस नोट बाद में।
इंद्रपुरी जलाशय जैसी परियोजनाएं विवाद के कारण अटकने की चर्चा पुरानी है। सहमति के बाद ठेके, पर्यावरण मंजूरी और बजट अपनी गति से चलेंगे। एक बैठक से धान की बालियां नहीं भरतीं। फिर भी कानूनी अड़चन हटने से फाइल आगे खिसक सकती है। मामला कुछ इस तरह से है कि नदी ऊपर से एक है, राज्य दो हो गए। बंटवारा कागज पर हुआ, खेत तक पाइप अभी बनना बाकी है।
झारखंड की जरूरत और केंद्र की भूमिका
पठारी राज्य में सिंचाई और पेयजल दोनों मोर्चे हैं। सोन का निर्धारित हिस्सा मिलने से योजना बनाना आसान होगा, अधिकारी यही तर्क देते रहे। बिहार का मैदान नहरों पर ज्यादा निर्भर रहा। इसलिए दोनों दावे टकराते थे।
केंद्र ने जल शक्ति मंत्रालय और गृह मंत्रालय के मंच से बात आगे बढ़ाई। अंतरराज्यीय नदी विवाद अदालत तक जाने से पहले समझौता सस्ता पड़ता है। अमल न हो तो अदालत फिर खुल सकती है। इसलिए निगरानी समिति और माप की व्यवस्था दस्तावेज में होनी चाहिए।
जानकार बताते हैं कि मानसून घट-बढ़ से एमएएफ का कागजी आंकड़ा हर साल एक जैसा नहीं उतरता। सूखे साल में झगड़ा फिर उठ सकता है अगर साझा नियम कमजोर हों।
Bihar Jharkhand Water Dispute: आगे क्या देखना होगा
औपचारिक हस्ताक्षर, दोनों मंत्रिमंडलों की पहले मिली मंजूरी और राजपत्र। पानी मापने वाले स्टेशन, नहर की मरम्मत और किसानों को समय पर सूचना। विपक्ष पूछेगा कि खेत तक बूंद कब पहुंची। सत्ता पक्ष उपलब्धि का श्रेय लेगा।
एक छोटा ट्विस्ट यह है कि 26 साल बाद आई सहमति उसी नदी पर है जिसकी बाढ़ कभी नुकसान भी करती है। बंटवारा सिर्फ सूखे का विषय नहीं, अतिरिक्त पानी के साल में भी नियम चाहिए। किसान दोनों चेहरे जीता है।
बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी जल विवाद पर दिल्ली बैठक में सहमति की घोषणा हुई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इसे ऐतिहासिक बताया। रिपोर्टों में 5.75 बनाम 2.0 मिलियन एकड़ फीट वाले बंटवारे का जिक्र है। सिंचाई का असल फायदा नहर और जलाशय के काम पर टिका है। समझौतानामा सार्वजनिक होने के बाद शर्तें जांचिए। खेत तक पानी पहुंचे तभी फैसला पूरा माना जाएगा। अगली निगाह दस्तावेज और अमल की समय-सारिणी पर है।
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Sanjana Gupta
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