Building Collapse Data: देश में इमारतों के ढहने की घटनाएं अब सिर्फ हादसे नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाला गंभीर मुद्दा बनती जा रही हैं। दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में 6 सितंबर को एक पीजी बिल्डिंग के ढहने की घटना ने एक बार फिर इस सवाल को हवा दी है कि आखिर ये इमारतें रहने की जगह हैं या खतरे का घर बन चुकी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 से 2024 के बीच पांच वर्षों में स्ट्रक्चरल कोलैप्स की घटनाओं ने 7,874 लोगों की जान ले ली है। साल 2026 में अब तक देशभर में 264 इमारतें ढह चुकी हैं, हालांकि इनमें हुई मौतों का अभी कोई औपचारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है। रिपोर्ट के मुताबिक इन हादसों में सबसे ज्यादा शिकार रिहायशी इमारतें बन रही हैं, जो कुल घटनाओं का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा हैं। यह आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि जर्जर ढांचे, बिना नक्शे के बने निर्माण और निगरानी की कमी आम लोगों की जान पर भारी पड़ रही है।
Building Collapse Data: NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं

NCRB की “भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024” रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 में देशभर में बिल्डिंग गिरने की कुल 1,435 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 1,525 लोगों की मौत हुई। इनमें से 1,473 मौतें राज्यों में और 52 मौतें केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज की गईं। मरने वालों में 1,134 पुरुष और 391 महिलाएं शामिल थीं। अगर पांच साल के आंकड़ों की बात करें तो 2020 से 2024 के बीच कुल 7,650 घटनाएं स्ट्रक्चरल कोलैप्स की सामने आईं, जिनमें 7,874 लोगों की जान गई। इस हिसाब से हर साल औसतन 1500 से 1600 के बीच लोग इमारतों के मलबे में दबकर अपनी जान गंवाते हैं, जो किसी भी संवेदनशील समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा हुई मौतें
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो स्ट्रक्चरल कोलैप्स से सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं, जहां 60 महिलाओं समेत कुल 224 लोगों की जान गई। इसके बाद महाराष्ट्र में 223, मध्य प्रदेश में 179, राजस्थान में 131 और झारखंड में 123 मौतें साल 2024 में दर्ज की गईं। वहीं घटनाओं की संख्या के हिसाब से महाराष्ट्र सबसे आगे रहा, जहां 215 मामले सामने आए, जबकि उत्तर प्रदेश में 196 और मध्य प्रदेश में 177 घटनाएं दर्ज हुईं। झारखंड, राजस्थान और गुजरात में भी 100 से ज्यादा मामले सामने आए, जबकि ओडिशा और नागालैंड ऐसे राज्य रहे जहां 2024 में इस तरह की किसी मौत का मामला दर्ज नहीं हुआ।
रिहायशी इमारतें सबसे ज्यादा बन रहीं हादसों का शिकार

आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में हुए कुल 1,435 स्ट्रक्चरल कोलैप्स मामलों में से 922 मामले सिर्फ रिहायशी इमारतों से जुड़े थे, जो कुल घटनाओं का 64.3 प्रतिशत हिस्सा है। सरकारी या कॉमर्शियल इमारतों से जुड़े मामले सिर्फ 51 यानी 3.6 प्रतिशत रहे, जबकि बाकी 462 मामले यानी 32.2 प्रतिशत अन्य तरह के ढांचों से जुड़े थे। मौतों के लिहाज से भी रिहायशी इमारतों का आंकड़ा सबसे ज्यादा रहा, जहां 988 लोगों की जान गई। इसके मुकाबले सरकारी और कॉमर्शियल इमारतों के गिरने से 59 मौतें और अन्य ढांचों से 478 मौतें दर्ज की गईं, जिससे 2024 में कुल मौतों का आंकड़ा 1,525 तक पहुंचा।
दिल्ली और महाराष्ट्र में हाल की घटनाओं पर प्रशासन की कार्रवाई
दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी बिल्डिंग ढहने की घटना के बाद दिल्ली सरकार ने पूरे शहर में अवैध रूप से बनी 5 मंजिला इमारतों को तुरंत सील करने के निर्देश जारी किए हैं। अधिकारियों को सत्य निकेतन और आसपास के उन इलाकों में सघन जांच करने को कहा गया है, जहां बड़ी संख्या में छात्र और कामकाजी युवा किराए पर रहते हैं। नियमों का उल्लंघन करने वाली या मंजूर नक्शे के उलट बनी इमारतों और पीजी को बिना देरी सील करने के आदेश दिए गए हैं। वहीं महाराष्ट्र के भिवंडी में 30 जुलाई 2026 को एक पुरानी जर्जर इमारत गिरने की घटना के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने म्युनिसिपल कमिश्नर को खतरनाक इमारतों को बल प्रयोग करके खाली करवाने और संबंधित ठेकेदार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
Building Collapse Data: नियम मौजूद हैं, फिर भी क्यों हो रही हैं घटनाएं
देश में ढांचागत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी यानी NDMA सर्वोच्च संस्था के तौर पर काम करती है, और केंद्र सरकार नेशनल बिल्डिंग कोड तथा आपदा प्रबंधन दिशानिर्देशों के जरिए इस पर नियंत्रण रखने की कोशिश करती है। इस कोड में प्रशासनिक प्रावधान, डेवलपमेंट कंट्रोल नियम, आग से सुरक्षा, मैटेरियल और स्ट्रक्चरल डिजाइन से जुड़ी शर्तें, इलेक्ट्रिकल इंस्टॉलेशन, लिफ्ट, वेंटिलेशन और प्लंबिंग सेवाओं से जुड़े नियम शामिल हैं। इसके बावजूद हर साल हजारों की संख्या में इमारतें ढहना यह दिखाता है कि नियमों के क्रियान्वयन और निगरानी में बड़ी खामियां मौजूद हैं। जर्जर इमारतों की समय पर पहचान न होना और बिना मंजूरी के हो रहे निर्माण इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।
कुल मिलाकर NCRB के आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि स्ट्रक्चरल कोलैप्स की समस्या अब किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। रिहायशी इमारतों का सबसे ज्यादा प्रभावित होना यह दिखाता है कि आम नागरिकों की सुरक्षा सीधे तौर पर दांव पर लगी है। दिल्ली और महाराष्ट्र जैसी हालिया घटनाओं के बाद प्रशासन की सख्ती जरूर बढ़ी है, लेकिन जब तक नियमों का सख्ती से पालन और नियमित निगरानी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक इन हादसों पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल बना रहेगा। आने वाले समय में इस दिशा में ठोस और स्थायी कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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