51 Shakti Peeth: हिंदू धर्म में शक्तिपीठों को मां आदिशक्ति की उपासना के प्रमुख केंद्र माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे। मान्यता है कि माता सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुए। भारत में कुल 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं। इनमें से पांच मंदिर अपनी अनोखी मान्यता और परंपरा के कारण खास जगह रखते हैं। ये मंदिर देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित हैं और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
पौराणिक कथा और शक्तिपीठों का महत्व
शक्तिपीठों की मान्यता सीधे माता सती की कथा से जुड़ी है। जब शिव उनके शरीर को लेकर घूमने लगे तो भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से शरीर के अंगों को काट दिया। जहां-जहां ये अंग गिरे वहां शक्तिपीठ बने। हर शक्तिपीठ में देवी का अलग स्वरूप और अलग अंग की मान्यता जुड़ी है। इन स्थानों को देवी की शक्ति का केंद्र माना जाता है। श्रद्धालु यहां मनोकामना पूरी करने और आशीर्वाद लेने आते हैं। नवरात्रि जैसे अवसरों पर इन मंदिरों में विशेष भीड़ जुटती है।
मां कामाख्या मंदिर की अनोखी परंपरा
असम के गुवाहाटी में नीलांचल पहाड़ी पर स्थित मां कामाख्या मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां माता सती की योनि गिरी थी। इसलिए इस मंदिर को स्त्री शक्ति, सृजन और प्रकृति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यहां देवी की सामान्य प्रतिमा की जगह गर्भगृह में प्राकृतिक शिलाखंड में बनी योनि के आकार की आकृति की पूजा होती है। मंदिर में एक प्राकृतिक जलधारा भी बहती है। अंबुबाची मेले के दौरान मंदिर के कपाट बंद रखे जाते हैं। यह माता के वार्षिक रजस्वला होने की मान्यता से जुड़ा है। बाद में विशेष अनुष्ठान के साथ मंदिर खोल दिया जाता है। यहां साधु-संत और तांत्रिक साधक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। कामाख्या को तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र भी माना जाता है।
मां कालीघाट मंदिर और काली पूजा
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित मां कालीघाट मंदिर को भी शक्तिपीठों में गिना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती के दाएं पैर का अंगूठा गिरा था। मंदिर में मां काली की पूजा विशेष श्रद्धा के साथ की जाती है। सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। दुर्गा पूजा और काली पूजा के दौरान यहां विशेष धार्मिक माहौल बन जाता है। काली पूजा पश्चिम बंगाल के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। इस अवसर पर मां काली की विशेष पूजा-अचना होती है। मंदिर के आसपास फूल, प्रसाद और पूजा सामग्री की दुकानें भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। यह मंदिर शहर की आस्था और सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जुड़ा है।
मां ज्वाला देवी मंदिर की प्राकृतिक ज्वालाएं
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी मंदिर अपनी प्राकृतिक ज्वालाओं के लिए प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां माता सती की जीभ गिरी थी। मंदिर में देवी की पूजा प्राकृतिक रूप से निकलने वाली ज्वालाओं के रूप में की जाती है। ये ज्वालाएं चट्टानों के बीच से निकलने वाली प्राकृतिक गैस के जलने से बनती हैं। इन्हें तेल और बाती की जरूरत नहीं पड़ती। भक्त इन्हें मां का दिव्य स्वरूप मानते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। पहाड़ी क्षेत्र में स्थित यह मंदिर अपनी प्राकृतिक विशेषता के कारण भी देशभर में जाना जाता है।
मां विशालाक्षी और मां तारा तारिणी मंदिर
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मीर घाट के पास स्थित मां विशालाक्षी मंदिर को भी शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती का कुंडल गिरा था। अलग-अलग परंपराओं में इसे दाहिने कान का कुंडल या मणि बताया जाता है जिससे मणिकर्णिका का नाम पड़ा। काशी में मां विशालाक्षी को देवी पार्वती का स्वरूप माना जाता है। श्रद्धालु यहां सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना लेकर आते हैं। नवरात्रि में यहां भीड़ बढ़ जाती है। ओडिशा के गंजाम जिले में ऋषिकुल्या नदी के पास कुमारी पहाड़ियों पर स्थित मां तारा तारिणी मंदिर में माता सती के स्तन गिरने की मान्यता है। यहां मां तारा और मां तारिणी की पूजा होती है। कई श्रद्धालु बच्चों के कल्याण और मुंडन संस्कार के लिए भी यहां पहुंचते हैं। पहाड़ी पर स्थित मंदिर का प्राकृतिक वातावरण आकर्षित करता है।
भारत के ये पांच शक्तिपीठ अपनी अलग-अलग मान्यताओं और परंपराओं के कारण श्रद्धालुओं के लिए खास महत्व रखते हैं। कामाख्या की अंबुबाची परंपरा से लेकर ज्वाला देवी की प्राकृतिक ज्वालाओं तक हर मंदिर अपनी अनोखी पहचान रखता है। माता सती के अंग गिरने की पौराणिक कथा इन सभी स्थानों को जोड़ती है। हर साल नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर ये मंदिर लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र बन जाते हैं। इन शक्तिपीठों की यात्रा सिर्फ दर्शन नहीं बल्कि देवी शक्ति से जुड़ने का अनुभव भी माना जाता है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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