DPDP Act: डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के कई प्रावधानों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। संगठन का कहना है कि इस कानून में पत्रकारिता के लिए कोई विशेष छूट न होने से प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा असर पड़ सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।
DNPA ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दायर की है। इसमें 21 प्रमुख मीडिया संगठनों के डिजिटल विंग शामिल हैं। द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ग्रुप, जी, एनडीटीवी और नेटवर्क 18 जैसे नाम इस संगठन से जुड़े हैं।
DNPA ने DPDP एक्ट को क्यों चुनौती दी है?
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन का दावा है कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के कई सख्त प्रावधानों से मीडिया के काम में बाधा आएगी। याचिका के अनुसार, कानून के नियमों के मुताबिक किसी भी खबर के प्रकाशन से पहले खबर से संबंधित व्यक्ति की परमिशन और सहमति लेने की अनिवार्यता मीडिया के काम में दिक्कत पैदा करेगी।
संगठन का तर्क है कि पत्रकारिता के लिए कोई विशेष छूट न होने से देश में प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। DNPA ने इस कानून को मीडिया के लिए प्री-सेंसरशिप जैसी व्यवस्था बताया है और कहा है कि इससे मीडिया संस्थानों के बंद होने की नौबत आ सकती है। याचिका में डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की धाराओं और 2025 के नियमों को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई है।
आरटीआई एक्ट में संशोधन से क्या समस्या बताई गई है?
इस अधिनियम की धारा 44(3) के जरिए आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया है। इसके तहत व्यक्तिगत जानकारी के डिस्क्लोजर पर पहले जो जनहित का सुरक्षा कवच उपलब्ध था, उसे हटा दिया गया है। इससे सरकारी कामकाज में ट्रांसपेरेंसी और सूचना पाने के अधिकार पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
मीडिया संगठनों का कहना है कि जनहित में जानकारी साझा करने का अधिकार कमजोर होने से खबरों की विश्वसनीयता और जवाबदेही दोनों प्रभावित हो सकती हैं। यह संशोधन पारदर्शिता और व्यक्तिगत निजता के बीच संतुलन पर सवाल खड़े करता है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने कहा कि यदि पत्रकारों को रिपोर्टिंग से पहले खबर से जुड़े व्यक्ति से सहमति लेने के लिए मजबूर किया गया तो समाचार की मूल भावना पर बुरा असर पड़ेगा। उन्होंने तर्क दिया कि इससे मीडिया का काम प्रभावित होगा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग मुश्किल हो जाएगी।
DNPA ने जोर दिया कि सहमति की शर्त से खबरों के प्रकाशन में देरी होगी और कई महत्वपूर्ण कहानियां छप नहीं पाएंगी। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
CJI ने निजता और मीडिया अधिकारों पर क्या टिप्पणी की?
मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि नागरिकों की निजता और मीडिया के अधिकारों के बीच एक संतुलन बनाना आवश्यक है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से सुझाव मांगे कि इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं।
पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की है। अदालत का रुख साफ है कि निजता की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता दोनों महत्वपूर्ण हैं और दोनों के बीच उचित संतुलन होना चाहिए।
DNPA कौन है और याचिका में क्या शामिल है?
DNPA यानी डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन भारत के प्रमुख मीडिया घरानों के डिजिटल विंग्स का एक बड़ा संगठन है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में 21 प्रमुख मीडिया संगठनों के डिजिटल विंग शामिल हैं। इनमें द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ग्रुप, जी, एनडीटीवी और नेटवर्क 18 जैसे बड़े नाम शामिल हैं।
याचिका में डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की धाराओं और 2025 के नियमों को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई है। मीडिया संस्थानों का कहना है कि पत्रकारिता को विशेष छूट न मिलने से स्वतंत्र और समयबद्ध रिपोर्टिंग प्रभावित होगी। केंद्र सरकार के जवाब के बाद मामले की आगे की सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट में DPDP एक्ट को लेकर यह याचिका निजता और प्रेस स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण बहस का आधार बन सकती है। 17 नवंबर को होने वाली सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलें और विस्तार से सुनी जा सकती हैं।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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