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‘मां के प्यार-दुलार की जरूरत’, झारखंड हाईकोर्ट ने पलटा फैमिली कोर्ट का फैसला, 4 साल की बच्ची की कस्टडी मां को सौंपी

Jharkhand High Court: बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में अदालतें अक्सर बच्चे के कल्याण को सबसे ऊपर रखती हैं, और झारखंड हाईकोर्ट ने भी हाल ही में एक ऐसे ही मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने एक फैमिली कोर्ट के आदेश को पलटते हुए चार वर्षीय बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा उसकी मां को सौंप दी है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और संजय प्रसाद की बेंच ने साफ तौर पर कहा कि इतनी कम उम्र में बच्ची को मां के स्नेह और प्यार की सख्त जरूरत है, और वह खुद समझदारी से कोई फैसला लेने की स्थिति में नहीं है। अदालत ने यह भी बताया कि बच्ची का जन्म आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन के जरिए हुआ था और मां ने इस प्रक्रिया से जुड़े दर्द व त्याग को झेला है। यह सुनवाई मां की उस अपील पर हुई, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के नवंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला सिर्फ अंतरिम कस्टडी पर है और स्थायी हिरासत के मामले पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

Jharkhand High Court: फैमिली कोर्ट के आदेश को क्यों पलटा हाईकोर्ट ने

झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि फैमिली कोर्ट ने गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 12 के तहत दाखिल मां की अर्जी पर उचित ढंग से विचार नहीं किया था। धारा 12 अदालत को बच्चे की अंतरिम कस्टडी को लेकर आदेश देने का अधिकार देती है, लेकिन फैमिली कोर्ट ने इस मुद्दे पर सीधा फैसला देने के बजाय माता-पिता दोनों के स्नेह की जरूरत पर ज्यादा जोर दिया। इसी आधार पर उसने मुख्य रूप से पिता के लिए विजिटेशन यानी मिलने-जुलने की व्यवस्था कर दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने गलत दृष्टिकोण करार दिया।

बच्चे की उम्र और कल्याण को माना गया सबसे अहम पहलू

सुनवाई के दौरान बच्ची की उम्र करीब साढ़े चार साल थी, और बेंच ने कहा कि यह उम्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बच्ची की तत्काल जरूरतों और अपनी पसंद खुद तय करने की क्षमता का आकलन किया जा सकता है। अदालत ने साफ किया कि माता-पिता के व्यक्तिगत दावों से कहीं ज्यादा जरूरी बच्चे का हित होता है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अभिरक्षा से जुड़े मामलों में बच्चे का आराम, स्वास्थ्य, शिक्षा, बौद्धिक विकास और सामाजिक कल्याण जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

फैमिली कोर्ट का रुख अदालत को लगा त्रुटिपूर्ण

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे का कल्याण केवल आर्थिक संपन्नता या भावनात्मक चिंता से तय नहीं होता, बल्कि इसके लिए सभी प्रासंगिक पहलुओं को संतुलित तरीके से देखना जरूरी है। बेंच ने स्पष्ट किया कि आईवीएफ से जुड़ा तथ्य अपने आप में कस्टडी के मुद्दे को तय नहीं करता, बल्कि इसे बाकी परिस्थितियों के साथ मिलाकर देखा गया। कोर्ट ने माना कि मां को अंतरिम कस्टडी से इनकार करने वाला फैमिली कोर्ट का आदेश विकृत था और उसे बरकरार रखना उचित नहीं था, जिसके चलते नवंबर 2025 का वह आदेश रद्द कर दिया गया।

मां को मिली कस्टडी, पिता के मिलने पर भी नहीं लगी रोक

बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपते हुए हाईकोर्ट ने पिता के अधिकारों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया। अदालत ने आदेश दिया कि पिता हर सप्ताहांत सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्ची से मुलाकात कर सकते हैं, जो दोनों पक्षों की सहमति से तय स्थान या फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित जगह पर हो सकती है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इस मुलाकात व्यवस्था से बच्ची की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए, और फैमिली कोर्ट को समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार इन शर्तों में बदलाव की स्वतंत्रता दी गई।

Jharkhand High Court: आगे की प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट के निर्देश

झारखंड हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को स्पष्ट निर्देश दिया कि बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा एक सप्ताह के भीतर मां को सौंपना सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि लंबित मुख्य अभिरक्षा कार्यवाही को बिना किसी अनावश्यक स्थगन के जल्द से जल्द निपटाया जाए। इससे साफ है कि हाईकोर्ट बच्ची के हित को ध्यान में रखते हुए पूरे मामले में तेजी लाना चाहता है, ताकि लंबी कानूनी प्रक्रिया का असर बच्ची पर न पड़े।

कुल मिलाकर झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में बच्चे के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की न्यायिक सोच को दर्शाता है। अदालत ने साफ किया है कि छोटे बच्चों के मामलों में माता-पिता के व्यक्तिगत अधिकारों से ज्यादा जरूरी उनकी भावनात्मक और मानसिक जरूरतों का ध्यान रखना है। यह फैसला आने वाले समय में इसी तरह के अन्य मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है, जहां अदालतें कानूनी तकनीकी पहलुओं से ज्यादा बच्चे के हित को प्राथमिकता देंगी।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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