Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि आतंकवाद विरोधी कानून अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट यानी यूएपीए के तहत हर विदेशी नागरिक की जमानत पर पूर्ण रोक नहीं लग सकती। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि धारा 43डी(7) की सख्त शर्तें तभी लागू होती हैं जब आरोपी का भारत में शुरुआती प्रवेश बिना अनुमति या गैरकानूनी तरीके से हुआ हो। बाद में वीजा खत्म होने या अवैध रूप से रहने के आधार पर यह रोक नहीं लगती। कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें श्रीलंकाई नागरिक मोहम्मद रिफास की जमानत बहाल की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए जमानत पर क्या कहा?
बेंच ने साफ किया कि अभियोजन पक्ष को पहले यह साबित करना होगा कि आरोपी भारतीय नागरिक नहीं है और उसकी भारत में शुरुआती एंट्री बिना अनुमति या अवैध थी। अगर कोई विदेशी वैध वीजा पर कानूनी तरीके से आया हो, तो बाद में वीजा अवधि समाप्त होने या अवैध रहने की वजह से उसे धारा 43डी(7) के सख्त नियम के तहत नहीं लाया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि सरकार रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाई जिससे पहली नजर में साबित हो कि एंट्री बिना अनुमति थी। एक अलग एफआईआर से भी पता चलता है कि रिफास वैध वीजा पर आए थे और वीजा खत्म होने के बाद ही उनका रहना अवैध हुआ।
यूएपीए की धारा 43डी(7) क्या प्रावधान करती है?
धारा 43डी आतंकवाद से जुड़े अपराधों में जमानत पर कड़े प्रतिबंध लगाती है। इसमें अग्रिम जमानत पर रोक शामिल है और यह शर्त भी है कि अगर आरोप पहली नजर में सही लगें तो अदालत कुछ मामलों में जमानत देने से मना कर सकती है। धारा 43डी(7) उन विदेशी नागरिकों के लिए और सख्त नियम बनाती है जो बिना अनुमति या गैरकानूनी तरीके से भारत आए हों। इस धारा के तहत जमानत सिर्फ बहुत ही खास हालात में और लिखित कारणों के साथ दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि इतनी सख्त शर्त का मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की संप्रभुता की रक्षा करना है।
मोहम्मद रिफास का मामला क्या था?
मामला अप्रैल 2018 में तमिलनाडु में दर्ज एक एफआईआर से शुरू हुआ था। रिफास और कुछ अन्य लोगों पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने, सरकार के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष छेड़ने और जेलों में बंद साथियों को छुड़ाने की साजिश का आरोप लगाया गया था। उन पर यूएपीए और अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई हुई। जांच एजेंसी तय समय में चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई। इसलिए जुलाई 2018 में रिफास को क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 167(2) के तहत डिफॉल्ट जमानत मिल गई थी। बाद में एनआईए ने जांच अपने हाथ में ली और जनवरी 2021 में चार्जशीट दाखिल की। नवंबर 2019 में एक अलग एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें आरोप था कि वे श्रीलंकाई नागरिक हैं, वीजा खत्म होने के बाद भी भारत में रुके रहे और धोखे से भारतीय पहचान दस्तावेज हासिल किए।
केंद्र सरकार ने जमानत रद्द करने की क्यों मांग की?
अप्रैल 2022 में केंद्र सरकार ने उनकी जमानत रद्द करने की मांग की। सरकार का तर्क था कि रिफास ने जमानत मांगते समय अपनी विदेशी नागरिकता छिपाई थी और धारा 43डी(7) विदेशी नागरिकों की जमानत पर रोक लगाती है। स्पेशल कोर्ट ने जुलाई 2022 में उनकी जमानत रद्द कर दी। लेकिन मद्रास हाई कोर्ट ने दिसंबर 2023 में स्पेशल कोर्ट का फैसला पलट दिया और जमानत बहाल कर दी। इसके बाद केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट ने किन तर्कों को खारिज किया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिफास को धारा 167(2) के तहत कानूनी डिफॉल्ट जमानत मिली थी। यह अधिकार यूएपीए के मामलों पर भी लागू होता है क्योंकि धारा 43डी(2) के जरिए यह प्रावधान यूएपीए पर भी लागू है। बेंच ने माना कि धारा 43डी(7) का सख्त प्रावधान डिफॉल्ट जमानत के कानूनी अधिकार को खत्म या ओवरराइड नहीं करता। कोर्ट ने यह भी पाया कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद सरकार जमानत रद्द करने का कोई ठोस और पक्का आधार साबित नहीं कर पाई। चार्जशीट जनवरी 2021 में दी गई थी, लेकिन रद्द करने की अर्जी अप्रैल 2022 में दाखिल की गई। सरकार ने इतनी देरी का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया।
जमानत रद्द करना और मूल आदेश पलटना में क्या फर्क है?
बेंच ने समझाया कि जमानत रद्द करना और जमानत देने वाले मूल आदेश को पलटना दो अलग बातें हैं। जमानत बाद में गलत काम करने या नई परिस्थितियों के आधार पर रद्द की जा सकती है। लेकिन ऊपरी अदालत मूल जमानत आदेश में हस्तक्षेप कर सकती है अगर वह कानूनन टिकने लायक नहीं है या गलत है। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल बहुत सावधानी से करना चाहिए क्योंकि व्यक्तिगत आजादी का संवैधानिक महत्व बहुत ज्यादा है।
अंतिम फैसला और उसका महत्व क्या है?
केंद्र सरकार की अपील में कोई दम न पाकर सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को सही ठहराया और मोहम्मद रिफास की जमानत बहाल रखने का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि सरकार यह साबित करने में नाकाम रही कि रिफास की एंट्री बिना अनुमति या गैरकानूनी थी, इसलिए धारा 43डी(7) की सख्त रोक इस मामले में लागू नहीं होती। यह फैसला यूएपीए के तहत विदेशी नागरिकों की जमानत के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सिर्फ विदेशी होना या बाद में अवैध रहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गैरकानूनी एंट्री साबित करना जरूरी है।
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Sanjana Gupta
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