TMC Symbol Dispute 2026: पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा उपचुनावों से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस के भीतर छिड़ा घमासान अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। पार्टी के नाम, फंड और मशहूर चुनाव चिन्ह ‘जोड़ा फूल’ यानी घास-फूल के आधिकारिक मालिकाना हक को लेकर संस्थापक ममता बनर्जी गुट और बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी गुट के बीच सियासी और कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। साल 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद से यह तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास का सबसे बड़ा अंदरूनी संकट माना जा रहा है। दोनों गुट अब चुनाव आयोग के सामने खुद को ‘असली टीएमसी’ साबित करने में जुटे हैं, जिससे पार्टी की पहचान को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
TMC Symbol Dispute 2026: कैसे शुरू हुई तृणमूल में बगावत की चिंगारी
तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की यह आग 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के हाथों मिली हार के बाद भड़की। जून 2026 में पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने कुल 80 में से 58 तृणमूल विधायकों का समर्थन जुटा लिया, जो बाद में बढ़कर 64 तक पहुंच गया। दो-तिहाई का आंकड़ा पार करने की वजह से दलबदल विरोधी कानून का असर टलता चला गया और विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें आधिकारिक रूप से नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दे दी।
बागी गुट ने संगठन पर भी जमाया दावा
बगावत के बाद बागी गुट ने एक विशेष राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक बुलाकर ममता बनर्जी को पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सीट से हटाने की घोषणा कर दी। इसी बैठक में वरिष्ठ नेता अरूप रॉय को नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जबकि अभिषेक बनर्जी को पार्टी से निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, बागी विधायकों ने कोलकाता स्थित पार्टी के मुख्य परिचालन कार्यालय ‘तृणमूल भवन’ पर भी भौतिक रूप से अपना नियंत्रण जमा लिया, जिससे विवाद और गहरा गया।
दोनों गुटों ने चुनाव आयोग में रखे अपने-अपने तर्क
चुनाव आयोग के सामने दोनों पक्षों ने अपने-अपने ठोस तर्क पेश किए हैं। ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय गुट का कहना है कि विधानसभा में 80 में से 60 से अधिक विधायकों का लिखित समर्थन उनके पास है, इसलिए चुनाव चिह्न नियमावली 1968 के अनुसार पार्टी के प्रतीक पर उनका अधिकार बनता है। दूसरी ओर ममता बनर्जी और कुणाल घोष गुट का तर्क है कि 1998 में पार्टी का गठन और उसका पूरा संगठनात्मक ढांचा ममता बनर्जी ने ही तैयार किया था, इसलिए निष्कासित नेताओं को पार्टी के नाम और चिन्ह का इस्तेमाल करने का न तो कानूनी और न ही नैतिक अधिकार है।
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग से की जल्द फैसले की मांग
दोनों गुटों ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी दलीलें, हस्ताक्षर और जरूरी दस्तावेज पहले ही जमा कर दिए हैं। हाल ही में ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि बागी गुट को अतिरिक्त समय न दिया जाए और ‘जोड़ाफूल’ चिन्ह को लेकर जल्द से जल्द अंतिम फैसला सुनाया जाए। इस पत्र के जरिए ममता गुट ने साफ संकेत दिया है कि उपचुनाव से पहले इस विवाद का निपटारा उनके लिए कितना अहम है।
TMC Symbol Dispute 2026: आगे चुनाव आयोग के सामने क्या विकल्प हैं
सुप्रीम कोर्ट के सादिक अली मामले की मिसाल के आधार पर चुनाव आयोग इस विवाद में ‘बहुमत के परीक्षण’ के सिद्धांत को अपनाएगा, जिसमें विधायकों और सांसदों की संख्या के साथ-साथ पार्टी के संगठनात्मक पदाधिकारियों के समर्थन को भी तौला जाएगा। अगर आयोग उपचुनाव से पहले किसी एक गुट के पक्ष में स्पष्ट फैसला नहीं ले पाता है, तो ‘जोड़ाफूल’ चिन्ह को अस्थायी रूप से फ्रीज किया जा सकता है और दोनों गुटों को अलग-अलग नाम व नए चुनाव चिह्न आवंटित किए जा सकते हैं।
कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस का यह आंतरिक संकट आने वाले उपचुनावों की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी गुट के बीच चल रही यह लड़ाई सिर्फ चुनाव चिन्ह भर की नहीं, बल्कि पार्टी की पूरी पहचान और विरासत से जुड़ी है। चुनाव आयोग का फैसला जिस भी पक्ष में जाए, उसका सीधा असर पश्चिम बंगाल की आगामी चुनावी राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है। अब सबकी नजरें आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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