Janmashtami 2026 Bihar Jharkhand: जन्माष्टमी हर साल तिथि को लेकर बहस छेड़ देती है। एक पंचांग 4 तारीख लिखता है, दूसरा 5 का शोर मचा देता है। बिहार और झारखंड के परिवार इस बार यही पूछ रहे हैं कि व्रत किस रात रखें। ज्योतिषाचार्य डॉ. रतन कुमार मिश्रा के अनुसार दोनों राज्यों में पर्व शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। मिथिला पंचांग में रोहिणी नक्षत्र का संयोग अष्टमी के साथ बन रहा है। इसलिए जयंती पूजन 4 सितंबर की मध्यरात्रि 12 बजे बताया गया है। दो दिन का उत्सव इस गणना में नहीं टूटा।
भाद्रपद यानी भादो के कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर श्रीकृष्ण जन्म मनाया जाता है। भक्त व्रत रखते हैं और आधी रात पूजा करते हैं। मान्यता है कि विधि से रखा व्रत कृपा दिलाता है। असमंजस तब होता है जब पड़ोसी राज्य अलग तारीख चला दें। इस बार स्थानीय गणना एक दिन पर ठहरी है।
Janmashtami 2026 Bihar Jharkhand: बिहार-झारखंड में एक ही दिन क्यों तय हुआ
बिहार और झारखंड दोनों में जन्माष्टमी 4 सितंबर को है। मिथिला पंचांग के हिसाब से रोहिणी का योग अष्टमी तिथि से जुड़ा है। जन्म की पूजा उसी संयोग पर मध्यरात्रि में मानी गई। दोनों राज्यों में उत्सव एक ही दिन रहेगा, यह बात उन्होंने अलग से दोहराई।
देश के कुछ हिस्सों में 4 या 5 सितंबर का फर्क चर्चा में है। वहां सूर्योदय और निशीथ काल का हिसाब अलग पढ़ा जाता है। बिहार-झारखंड के लिए दी गई राय मिथिला पंचांग और रोहिणी योग पर टिकी है। सोशल मीडिया की सामान्य तारीख पर अंधा भरोसा न करें। घर का पुरोहित या क्षेत्रीय पंचांग एक बार और मिला लेना ठीक रहता है। समय शहर के हिसाब से कुछ मिनट सरक सकता है, दिन 4 सितंबर बताया गया है। मध्यरात्रि 12 बजे जयंती पूजन का मतलब झूला और आरती उसी घड़ी है। सुबह-सुबह पारण की जल्दबाजी इस नियम से मेल नहीं खाती।
व्रत में अन्न क्यों नहीं, फलाहार कितना चलता है
जन्माष्टमी व्रत में अन्न नहीं खाया जाता। भक्त क्षमता देखकर निर्जला रह सकते हैं या फलाहार ले सकते हैं। सब पर एक जैसा नियम थोपना स्रोत में नहीं कहा गया। बुजुर्ग और बच्चे अक्सर फल-दूध पर रहते हैं। जो निर्जला रखते हैं, वे पानी तक नहीं लेते। शरीर साथ न दे तो क्षमता वाली छूट इसीलिए लिखी गई है।
व्रत से एक दिन पहले लहसुन-प्याज जैसे तामसिक पदार्थ छोड़ने को कहा गया है। यानी 3 सितंबर से रसोई सात्विक रखने की तैयारी कई घरों में शुरू हो जाती है। बाजार का चटपटा खाना उस दिन और भारी लगता है। जानकार बताते हैं कि व्रत की सुबह तब हल्की पड़ती है जब एक दिन पहले ही परहेज बैठ चुका हो।
पारण मध्यरात्रि की पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण कर अगली सुबह किया जाता है। आधी रात झूला झुलाया, आरती की, प्रसाद लिया। पूरा व्रत तोड़ने का काम अगली सुबह का बताया गया है। रात भर जागकर भोर होते ही भारी भोजन कई परिवार टाल देते हैं। नियम प्रसाद पहले, पारण सुबह वाला है।
पूजा स्थल, तुलसी और मध्यरात्रि झूला
पूजा से पहले स्थान अच्छी तरह साफ होना चाहिए। साफ कपड़े पहनकर श्रीकृष्ण की आराधना शुरू करने को कहा गया है। फूल ताजे और शुद्ध रखने हैं। तुलसी का पत्ता पूजा में अनिवार्य माना गया है। बिना तुलसी के थाली अधूरी कही जाती है। यह बात घर-घर दोहराई जाती है, फिर भी कई बार पत्ता छूट जाता है।
पूजन के समय मन शांत रखने और निष्ठा से सेवा करने की सलाह है। शोरगुल वाली तैयारी अलग, आरती वाला क्षण अलग। मध्यरात्रि में भगवान को झूला झुलाकर आरती करने की परंपरा पुरानी बताई गई है। मंदिर हो या आंगन का छोटा पालना, यही दृश्य रात बारह बजे दिखता है।
मामला कुछ इस तरह से चलता है कि दिनभर मेहंदी और झांकी सजती है, असल पूजा आधी रात ठहरती है। बच्चों को जगाए रखना परिवार का फैसला है। विधि का केंद्र निशीथ पूजन है।
Janmashtami 2026 Bihar Jharkhand: भ्रम क्यों हर साल लौटता है
तिथि सूर्यास्त के बाद खिसकती है। एक राज्य उदया तिथि मानता है, दूसरा निशीथ योग। रोहिणी जुड़े तो जन्माष्टमी और वजनदार मानी जाती है। इस बार बिहार-झारखंड के लिए वही योग 4 सितंबर की रात बताया गया। इसीलिए दो दिन का उत्सव यहां एक रात में समेटा गया।
बिहार और झारखंड में कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जाएगी। मिथिला पंचांग में अष्टमी के साथ रोहिणी संयोग है। जयंती पूजन उसी रात बारह बजे बताया गया है। व्रत में अन्न वर्जित है। निर्जला या फलाहार क्षमता पर है। एक दिन पहले लहसुन-प्याज छोड़ने को कहा गया। पारण पूजा के प्रसाद के बाद अगली सुबह होता है। तुलसी अनिवार्य है। झूला और आरती मध्यरात्रि की परंपरा है। स्थानीय पंचांग से समय एक बार और मिला लें। इस बार दोनों राज्यों का उत्सव एक ही रात पर टिका है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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