News Delhi: आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले इस बहुपक्षीय मंच के सामने सबसे बड़ी चुनौती सदस्य देशों के बीच बढ़ते मतभेदों को दूर कर साझा सहमति कायम करने की है। ब्रिक्स का विस्तार भले ही इसे अधिक प्रभावशाली वैश्विक मंच बना रहा हो, लेकिन सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक राय बनाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
भारत की अध्यक्षता में मई में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति न बन पाना इसी चुनौती को उजागर करता है। पारंपरिक रूप से ब्रिक्स सर्वसम्मति के आधार पर काम करता है। ऐसे में किसी अहम बैठक के बाद साझा बयान जारी न हो पाना संगठन के भीतर मौजूद मतभेदों का संकेत माना गया।
पश्चिम एशिया के मुद्दे पर फंसा पेंच
विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया की स्थिति, फलस्तीन और लाल सागर में नौवहन सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद सामने आए। खास तौर पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के रुख में अंतर ने बातचीत को मुश्किल बनाया।
ईरान पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर अधिक कड़े शब्दों के इस्तेमाल पर जोर दे रहा था। वहीं, कुछ सदस्य देशों ने प्रस्तावित भाषा पर आपत्ति जताई। फलस्तीन और लाल सागर से जुड़े कुछ प्रावधानों को लेकर भी ईरान की ओर से असहमति जताई गई।
आखिरकार सदस्य देशों के बीच साझा सहमति नहीं बन सकी और संयुक्त घोषणापत्र के बजाय भारत को अध्यक्षीय बयान जारी करना पड़ा। यह घटनाक्रम बताता है कि अंतरराष्ट्रीय संकटों पर ब्रिक्स के सभी सदस्यों को एक मंच पर लाना आसान नहीं रह गया है।
विस्तार के साथ बढ़ी चुनौतियां
ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे पांच प्रमुख देशों के मंच के रूप में हुई थी। अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी शामिल हैं।
विस्तारित ब्रिक्स दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इससे संगठन का वैश्विक प्रभाव बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही सदस्य देशों के राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित भी अधिक विविध हो गए हैं।
कई सदस्य देश अलग-अलग क्षेत्रीय और सामरिक समीकरणों से जुड़े हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया, सुरक्षा, युद्ध और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे मुद्दों पर एक समान दृष्टिकोण तैयार करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

भारत के सामने संतुलन साधने की परीक्षा
ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे भारत के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा संगठन के भीतर संतुलन बनाए रखने की है। भारत का जोर वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने पर रहा है।
नई दिल्ली के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करने की भी है कि ब्रिक्स किसी एक देश या किसी एक राजनीतिक धड़े के प्रभाव वाला मंच न बन जाए। भारत लंबे समय से ब्रिक्स को विकासशील देशों के आर्थिक हितों, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की दिशा में प्रभावी मंच के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा है।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच भारत को सभी सदस्यों के हितों के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिससे संगठन की एकजुटता बनी रहे।
क्या साझा सुर तलाश पाएगा ब्रिक्स?
आगामी शिखर सम्मेलन में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि क्या विस्तारित ब्रिक्स अपने आंतरिक मतभेदों के बावजूद साझा एजेंडा तैयार कर पाएगा। आर्थिक सहयोग, व्यापार, विकास और वैश्विक दक्षिण जैसे अपेक्षाकृत साझा हितों पर सहमति बनाना आसान हो सकता है, लेकिन भू-राजनीतिक संकटों पर एक समान रुख अपनाना बड़ी चुनौती बना रहेगा।
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन केवल अपनी अध्यक्षता की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने का अवसर नहीं, बल्कि ब्रिक्स की बढ़ती सदस्य संख्या के बीच सर्वसम्मति की पुरानी कार्यशैली को बनाए रखने की कूटनीतिक परीक्षा भी होगा।

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