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UCC पर राज्य-दर-राज्य आगे क्यों बढ़ रही BJP? क्या सीधे केंद्रीय कानून से बचने की है कोई खास रणनीति?

UCC: देश में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुंबई में दिए एक बयान में साफ कर दिया है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और राजग शासित सभी 21 राज्यों में यूसीसी लागू कर दी जाएगी। शाह के इस बयान ने न सिर्फ भाजपा के भीतर बल्कि उसके सहयोगी दलों और विपक्ष के बीच भी नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब यूसीसी को संविधान में जगह मिली हुई है, तो केंद्र सरकार सीधे संसद के जरिए इसे पूरे देश में लागू करने के बजाय राज्य-दर-राज्य यह कानून क्यों बनवा रही है। उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्य पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं, जबकि बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही असहमति के सुर सुनाई दे रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझने की जरूरत है।

UCC: शाह का बड़ा ऐलान, क्या कहा गया मुंबई में

रविवार को मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यूसीसी को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले कुछ वर्षों में भाजपा और राजग के शासन वाले सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता की व्यवस्था लागू हो जाएगी। शाह ने इस मौके पर तीन तलाक प्रथा को समाप्त करने का जिक्र भी किया और इसे मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने की दिशा में सरकार के प्रयासों से जोड़ा। उनका यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं है, बल्कि इसे भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति के एक अहम पड़ाव के तौर पर देखा जा रहा है, जिसकी समय-सीमा अब स्पष्ट रूप से तय कर दी गई है।

यूसीसी भाजपा के लिए क्यों है खास मुद्दा

समान नागरिक संहिता लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी के मूल वैचारिक एजेंडे का हिस्सा रही है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना भी इसी सूची में शामिल रहे हैं, जिन्हें अब पूरा किया जा चुका है। इस लिहाज से यूसीसी पार्टी का वह लक्ष्य है, जो अभी अधूरा है। गुजरात में यूसीसी विधेयक पास होने के बाद खुद अमित शाह कह चुके हैं कि हर नागरिक के लिए एक समान कानून बनाना पार्टी की स्थापना के समय से ही प्रतिबद्धता रही है। इस मुद्दे की वैचारिक जड़ें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी मानी जाती हैं, हालांकि संघ का रुख इसे लागू करने के तरीके और समय को लेकर हमेशा थोड़ा सतर्क रहा है। जब 2023 में मोदी सरकार ने पहली बार इसे बड़े राजनीतिक एजेंडे के तौर पर उठाया था, तब संघ से जुड़े सूत्रों ने कहा था कि यह मामला पूरे समाज को प्रभावित करता है, इसलिए इस पर गहन अध्ययन और व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है। संघ की प्राथमिकता यही रही है कि पहले भाजपा शासित राज्य अपने स्तर पर कानून बनाएं और उसके बाद ही केंद्र किसी व्यापक राष्ट्रीय कानून पर विचार करे।

राज्य-दर-राज्य रणनीति के पीछे की असली वजह

UCC
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संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि पांच के तहत विवाह, तलाक, गोद लेना, वसीयत, उत्तराधिकार और संयुक्त परिवार से जुड़े विषय आते हैं। इसका सीधा मतलब है कि इन मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार संसद और राज्य विधानसभा, दोनों के पास है। यही वजह है कि भाजपा शासित राज्य अपने स्तर पर यूसीसी कानून पारित कर पा रहे हैं। लेकिन इस रणनीति के पीछे संवैधानिक वजह से ज्यादा राजनीतिक कारण मायने रखता है। पूरे देश के लिए एक साझा कानून बनाना आसान काम नहीं है, क्योंकि भारत में पर्सनल लॉ और पारंपरिक रीति-रिवाजों में जबरदस्त विविधता पाई जाती है। यह विविधता खासतौर पर आदिवासी समुदायों और पूर्वोत्तर के राज्यों में और अधिक जटिल हो जाती है। भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने पहले भी स्पष्ट किया था कि यूसीसी को आपराधिक कानून की तरह एक समान संहिता में नहीं बांधा जा सकता, क्योंकि उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश के आदिवासी समुदायों की परंपराएं छत्तीसगढ़ या पूर्वोत्तर के आदिवासी समाज से काफी अलग हैं। राज्यवार रास्ता अपनाने से भाजपा को अलग-अलग मॉडल आजमाने, स्थानीय परंपराओं का ध्यान रखने और देशव्यापी कानून की जटिलताओं में उलझे बिना इसे व्यावहारिक रूप में लागू करके दिखाने का मौका मिलता है। साथ ही इससे यूसीसी का मुद्दा राजनीतिक तौर पर लगातार चर्चा में बना रहता है।

अब तक कहां-कहां पारित हो चुका है यूसीसी कानून

अब तक भाजपा शासित चार राज्यों उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में यूसीसी कानून पारित किया जा चुका है, हालांकि फिलहाल यह सिर्फ उत्तराखंड में ही व्यावहारिक रूप से लागू है। उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में अपने यूसीसी कानून को अमल में लाया था। इस कानून के तहत विवाह, तलाक, संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार जैसे मामलों में समान नियम तय किए गए हैं, साथ ही बहुविवाह पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई है और शादी का पंजीकरण अनिवार्य बना दिया गया है। इस कानून की सबसे चर्चित बात लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियम हैं, जिनके तहत जोड़ों को अपने रिश्ते की शुरुआत और उसके खत्म होने, दोनों का पंजीकरण कराना जरूरी है। इसके साथ ही ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को कानूनी रूप से वैध संतान का दर्जा दिया गया है।

गुजरात, असम और मध्य प्रदेश के कानूनों में क्या है खास

गुजरात ने मार्च 2026 में अपना यूसीसी विधेयक पारित किया, जो काफी हद तक उत्तराखंड मॉडल पर आधारित है। इसमें भी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों को शामिल किया गया है, साथ ही बहुविवाह की प्रथा पर रोक लगाई गई है। इसके कुछ महीनों बाद मई में असम विधानसभा ने भी अपना विधेयक पास कर दिया। असम के कानून में भी विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधान शामिल हैं, बहुविवाह प्रतिबंधित किया गया है और लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। मध्य प्रदेश में जुलाई में यह विधेयक पारित हुआ, जो अन्य राज्यों से कुछ अलग भी है। इसमें गोद लेने से जुड़े प्रावधानों के साथ-साथ तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं को खत्म करने के प्रावधान भी जोड़े गए हैं। यहां भी लिव-इन संबंधों का पंजीकरण जरूरी किया गया है और बहुविवाह पर रोक लगाई गई है। इन सभी कानूनों में एक बात समान है कि अनुसूचित जनजाति यानी एसटी समुदायों को इनके दायरे से बाहर रखा गया है। उत्तराखंड ने इसके अलावा कुछ अन्य समुदायों को भी छूट दी है, जिन्हें संवैधानिक तौर पर पारंपरिक कानूनी संरक्षण मिला हुआ है। इसका मतलब यह हुआ कि चारों राज्यों के कानून आपस में काफी मिलते-जुलते तो हैं, लेकिन पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं और इनमें से कोई भी कानून पूरी आबादी पर समान रूप से लागू नहीं होता।

विपक्षी दलों का रुख और उनकी आपत्तियां

यूसीसी को लेकर विपक्षी दल शुरू से ही सवाल उठाते रहे हैं। उनकी मुख्य आपत्ति यह है कि क्या भाजपा वाकई महिलाओं को बराबरी का हक देना चाहती है या इसकी आड़ में बहुसंख्यक समुदाय को खुश करने और अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ में बदलाव करने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस ने गुजरात के यूसीसी विधेयक को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी थी और इसे अल्पसंख्यक विरोधी करार दिया था। मध्य प्रदेश के विधेयक को लेकर भी कांग्रेस ने इसे संघ का एजेंडा बताते हुए निशाना साधा था। असम में विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर व्यापक जनसंवाद की मांग उठाई और आदिवासी समुदायों को दी गई छूट के साथ-साथ लिव-इन संबंधों के नियमन को लेकर भी चिंता जताई।

राजग के सहयोगी दलों की बेचैनी

भाजपा के लिए यह मुद्दा सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि खुद उसके सहयोगी दलों के लिए भी यह असहज स्थिति पैदा करता रहा है। जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू का रुख हमेशा से यह रहा है कि वह यूसीसी के सैद्धांतिक रूप से खिलाफ नहीं है, लेकिन इसे थोपने के बजाय आम सहमति से लागू किया जाना चाहिए। नीतीश कुमार पहले भी विधि आयोग से कह चुके हैं कि यूसीसी को भारत के विभिन्न धार्मिक और जातीय समूहों के बीच बने नाजुक संतुलन का पूरा सम्मान करना चाहिए। तेलुगु देशम पार्टी ने भी इसी तरह का रुख अपनाते हुए चर्चा और सहमति पर जोर दिया है और 2024 में कहा था कि वह मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा सुनिश्चित करेगी। अमित शाह के ताजा बयान के बाद बिहार में यह असहमति खुलकर सामने आ चुकी है। जेडीयू ने साफ कह दिया है कि बिहार में फिलहाल यूसीसी लागू नहीं हो पाएगा, जिससे राजग गठबंधन के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद और गहरे हो गए हैं।

संविधान में यूसीसी का जिक्र और विधि आयोग की राय

UCC
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संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि राज्य पूरे देश के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। लेकिन यह प्रावधान राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा है, न कि मौलिक अधिकारों का। अनुच्छेद 37 के अनुसार, नीति निर्देशक तत्व शासन चलाने के लिए बुनियादी तो माने जाते हैं, लेकिन इन्हें अदालत के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता। यही वजह है कि यूसीसी को धार्मिक स्वतंत्रता, पारंपरिक रीति-रिवाजों और आदिवासी समुदायों को मिले संवैधानिक संरक्षण के साथ तालमेल बिठाने को लेकर लगातार बहस होती रही है। संविधान सभा में भी इस बात पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई थी कि यूसीसी में आखिर क्या-क्या शामिल किया जाए, और यही एक बड़ी वजह रही कि इसे नीति निर्देशक तत्वों में रखा गया। 21वें विधि आयोग ने 2018 में पारिवारिक कानून सुधार से जुड़े अपने परामर्श पत्र में कहा था कि मौजूदा हालात में यूसीसी न तो जरूरी है और न ही वांछनीय है। आयोग ने इसके बजाय भारत की सामाजिक विविधता को बनाए रखते हुए पर्सनल लॉ में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों को सुधारने की सिफारिश की थी। आयोग का जोर अलग-अलग समुदायों के बीच एकरूपता लाने के बजाय पुरुषों और महिलाओं के बीच तथा एक ही समुदाय के भीतर समानता लाने पर अधिक था, और उसने धीरे-धीरे बदलाव का रास्ता अपनाने की सलाह दी थी। बाद में 22वें विधि आयोग ने 2023 में इस मुद्दे को फिर से खोलते हुए जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों से नए सिरे से सुझाव मांगे थे। आयोग का तर्क था कि पुराने परामर्श को काफी समय बीत चुका है और अदालतों के हालिया फैसलों के मद्देनजर इस विषय पर नए सिरे से विचार जरूरी हो गया है, हालांकि इस पर अभी तक कोई औपचारिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है।

UCC: आगे की राह क्या होगी

अमित शाह का 2029 से पहले सभी भाजपा-राजग शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने का ऐलान इस मुद्दे को अब एक तय समय-सीमा से जोड़ देता है, जिसे लंबे समय से चली आ रही वैचारिक रणनीति का व्यावहारिक चरण माना जा रहा है। लेकिन इस रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बिहार जैसे राज्यों में गठबंधन के भीतर ही असहमति सामने आ चुकी है, जबकि आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी सहयोगी दल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। इसके अलावा हर राज्य में आदिवासी समुदायों को दी गई छूट और अलग-अलग प्रावधानों की वजह से एक समान राष्ट्रीय ढांचा खड़ा करना आसान नहीं होगा। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा शासित बाकी राज्य किस रफ्तार से इस दिशा में आगे बढ़ते हैं और विपक्ष शासित राज्यों तथा गठबंधन सहयोगियों का रुख इस मुद्दे पर किस तरह बदलता है।

कुल मिलाकर अमित शाह का यह बयान यूसीसी को लेकर भाजपा की सोच को एक नई स्पष्टता देता है, जहां अब लक्ष्य सिर्फ वैचारिक प्रतिबद्धता तक सीमित नहीं, बल्कि एक तय समय-सीमा वाला राजनीतिक कार्यक्रम बन चुका है। उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश के अनुभव आने वाले राज्यों के लिए मॉडल का काम करेंगे, लेकिन बिहार में जेडीयू की असहमति यह भी दिखाती है कि राजग के भीतर हर सहयोगी इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। संविधान में यूसीसी का उल्लेख होने के बावजूद इसे लागू करने का रास्ता संवैधानिक से ज्यादा राजनीतिक चुनौतियों से भरा नजर आता है, और 2029 का लक्ष्य इसी उलझी हुई राह पर भाजपा की अगली परीक्षा साबित होगा।

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Author: Sanjna Gupta

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