UP Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा चुनावी चक्र शुरू हो गया है। चुनाव आयोग ने यूपी की 10 राज्यसभा सीटों पर 16 अक्टूबर को मतदान का कार्यक्रम घोषित कर दिया है। इन सीटों में से ज्यादातर का कार्यकाल 25 नवंबर को पूरा हो रहा है, जबकि एक सीट डॉ. दिनेश शर्मा के इस्तीफे से पहले ही खाली हो चुकी है। मौजूदा सांसदों में भाजपा के बृजलाल, गीता शाक्य, हरदीप पुरी, नीरज शेखर, अरुण सिंह, बीएल वर्मा और सीमा द्विवेदी शामिल हैं। समाजवादी पार्टी से रामगोपाल यादव और बसपा से रामजी का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है। यूपी विधानसभा में इस समय 403 में से 6 सीटें रिक्त हैं, इसलिए कुल 397 विधायक वोट डालेंगे। एनडीए के पास करीब 294 विधायकों का समर्थन बताया जा रहा है, जबकि सपा के 101 और कांग्रेस के 2 विधायक विपक्ष में हैं। बसपा के पास अब प्रदेश में एक भी विधायक नहीं है। इसी वजह से कहा जा रहा है कि बसपा पहली बार राज्यसभा में शून्य पर आ सकती है।
चुनाव आयोग ने क्या कार्यक्रम तय किया
आयोग के अनुसार अधिसूचना 29 सितंबर को जारी होगी। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 6 अक्टूबर है। नामांकनों की जांच 7 अक्टूबर को होगी और नाम वापसी की आखिरी तारीख 9 अक्टूबर रखी गई है। मतदान 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा। उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना भी शुरू होगी। राज्यसभा चुनाव विधायकों के वोट से होता है, इसलिए सामान्य मतदाता इसमें सीधे भाग नहीं लेते। फिर भी यह चुनाव दलों की संगठनात्मक ताकत और विधायक संख्या का सीधा परीक्षण माना जाता है।
किन सांसदों का कार्यकाल पूरा हो रहा है
भाजपा खेमे से कई चेहरे इस बार सदन से बाहर हो रहे हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी हैं। अरुण सिंह, गीता शाक्य, नीरज शेखर, बृजलाल, बीएल वर्मा और सीमा द्विवेदी का कार्यकाल भी नवंबर में समाप्त हो रहा है। डॉ. दिनेश शर्मा पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं और अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल बनाए गए हैं। सपा की ओर से वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव की सीट खाली हो रही है। बसपा से रामजी की सदस्यता भी इसी दौर में खत्म होगी। दस सीटों में इस समय आठ भाजपा, एक सपा और एक बसपा के पास हैं।
विधानसभा में इस समय संख्याबल क्या है
यूपी विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 403 है, लेकिन छह सीटें खाली होने से प्रभावी संख्या 397 रह गई है। भाजपा के 256 विधायक हैं। अपना दल एस के 13, आरएलडी के 9, सुheldev भारतीय समाज पार्टी के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक एनडीए में गिने जा रहे हैं। जनसत्ता दल के 2 और तीन निर्दलीय विधायकों का रुख भी भाजपा के साथ बताया जा रहा है। इस हिसाब से एनडीए का आंकड़ा करीब 294 तक पहुंचता है। विपक्ष में सपा के 101 और कांग्रेस के 2 विधायक हैं। बसपा के विधायक अब शून्य हैं।
एक सीट जीतने के लिए कितने वोट चाहिए

राज्यसभा चुनाव में सिंगल ट्रांसफरेबल वोट प्रणाली चलती है। कुल मतदाताओं को खाली सीटों में एक जोड़कर भाग देने के बाद एक जोड़ने से कोटा निकलता है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार एक सीट के लिए करीब 37 से 40 विधायकों के वोट की जरूरत पड़ सकती है। इसी सूत्र से दलों का संभावित खाता तय होता है। संख्याबल सीधा नतीजा तय नहीं करता, क्योंकि क्रॉस वोटिंग और दूसरी पसंद के वोट भी असर डाल सकते हैं। फिर भी मौजूदा समीकरण से बड़ी तस्वीर साफ दिखती है।
बसपा क्यों राज्यसभा से बाहर हो सकती है
बहुजन समाज पार्टी के पास प्रदेश विधानसभा में अब कोई विधायक नहीं बचा। ऐसे में पार्टी अपने बल पर राज्यसभा उम्मीदवार नहीं जिता सकती। रामजी की सीट खाली हो रही है और उसे बचाने के लिए विधायकों का समर्थन जरूरी होता। बिना विधायक संख्या के बसपा का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व खत्म होने की आशंका सबसे अधिक है। अगर कोई अन्य दल सहयोग नहीं देता, तो पार्टी पहली बार राज्यसभा में शून्य पर पहुंच सकती है। यह बसपा की संसदीय उपस्थिति के लिहाज से बड़ा मोड़ माना जा रहा है।
एनडीए के लिए समीकरण कितना अनुकूल है
भाजपा और सहयोगी दलों के पास पर्याप्त विधायक हैं। सात सीटें आराम से आने का गणित बनता है। आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ सकती है। सहयोगी दल और निर्दलीय विधायक इसी बिंदु पर महत्वपूर्ण हो जाते हैं। एनडीए अगर अनुशासन बनाए रखे तो ज्यादातर सीटें अपने खाते में रख सकता है। राज्यसभा में संख्या बढ़ाने की कोशिश केंद्र की राजनीति के लिए भी मायने रखती है। इसलिए टिकट वितरण और जातीय संतुलन दोनों पर नजर रहेगी।
समाजवादी पार्टी कितनी सीटें पा सकती है
सपा के पास 101 विधायक हैं। दो सीटों के लिए यह संख्या काफी मानी जाती है। रामगोपाल यादव की सीट खाली हो रही है, इसलिए पार्टी कम से कम एक सीट बचाने और दूसरी सीट जोड़ने की स्थिति में दिखती है। कांग्रेस के दो विधायक भी विपक्षी खेमे में हैं, लेकिन बड़ी भूमिका सपा की ही रहेगी। अगर पार्टी अपने विधायकों को एकजुट रखती है तो दो सीटें उसके खाते में जा सकती हैं। पिछली बार कुछ क्रॉस वोटिंग की चर्चा हुई थी, इसलिए इस बार अनुशासन पार्टी के लिए परीक्षा बनेगा।
राज्यसभा सीटें अक्सर वरिष्ठ नेताओं, संगठन के कार्यकर्ताओं और सामाजिक संतुलन के लिए इस्तेमाल होती हैं। भाजपा की ओर से कई मौजूदा चेहरों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, इसलिए नए नामों की चर्चा तेज हो सकती है। सपा के लिए रामगोपाल यादव जैसा अनुभवी चेहरा naturally केंद्र में रहेगा। बसपा के पास सीट बचाने का संख्याबल नहीं है, फिर भी पार्टी राजनीतिक संदेश के लिए उम्मीदवार उतार सकती है। नामांकन 6 अक्टूबर तक होंगे, इसलिए अगले दो सप्ताह में नामों की घोषणा तय कर देगी कि कौन कितनी गंभीरता से मैदान में है।
विधानसभा चुनाव से पहले यह चुनाव क्यों देखा जा रहा है
यूपी विधानसभा चुनाव अगले वर्ष संभावित है। उससे पहले राज्यसभा चुनाव दलों के मनोबल और विधायक नियंत्रण की परीक्षा बनेगा। सत्ता पक्ष इसे अपनी पकड़ दिखाने का मौका मानेगा। विपक्ष इसे संगठन और एकजुटता का संदेश बनाने की कोशिश करेगा। क्रॉस वोटिंग हुई तो राजनीतिक संदेश और तेज होगा। इसलिए यह चुनाव सिर्फ दस सीटों तक सीमित नहीं रह जाएगा। यह 2027 के बड़े चुनावी माहौल का शुरुआती संकेत भी बन सकता है।
खाली विधानसभा सीटों का असर कितना है
छह विधानसभा सीटें खाली होने से कुल मतदाता घटकर 397 रह गए हैं। कोटा इसी संख्या पर आधारित होगा। खाली सीटों की वजह से हर वोट की कीमत और बढ़ जाती है। छोटे दल और निर्दलीय विधायक इसी कारण सौदेबाजी की स्थिति में आ सकते हैं। किसी एक वोट के इधर-उधर होने से आठवीं या दसवीं सीट का हिसाब बदल सकता है। इसलिए दोनों बड़े खेमे अपने विधायकों को लखनऊ में एकजुट रखने की तैयारी करेंगे।
आगे की प्रक्रिया कैसे चलेगी
29 सितंबर को अधिसूचना आने के बाद औपचारिक प्रचार और नामांकन शुरू होंगे। दलों के भीतर नामों को लेकर बैठकें तेज हो जाएंगी। 16 अक्टूबर को अगर आवश्यक हुआ तो विधायक गुप्त मतदान करेंगे। उसी शाम नतीजे आ सकते हैं। निर्वाचित सदस्य नवंबर के अंत में शपथ ले सकेंगे, जब मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होगा। दिनेश शर्मा की खाली सीट पर चुना गया सदस्य शेष कार्यकाल पूरा करेगा।
यूपी की 10 राज्यसभा सीटों का यह चुनाव संख्याबल, अनुशासन और गठबंधन की परीक्षा है। एनडीए के पास सबसे बड़ा विधायक समूह है, सपा दो सीटों की दावेदार दिखती है और बसपा के शून्य विधायक होने से उसका राज्यसभा प्रतिनिधित्व खतरे में है। 16 अक्टूबर का मतदान इन्हीं समीकरणों को हकीकत में बदलेगा। आने वाले दिनों में टिकटों के नाम और विधायकों की एकजुटता तय करेगी कि ऊपरी सदन में उत्तर प्रदेश का नया चेहरा कैसा होगा।
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Sanjana Gupta
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