Election Commission Dispute: गोवा में वोटर सूची के SIR को लेकर विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सत्ताधारी भाजपा पर आरोप लगाया है कि आगामी चुनाव प्रभावित करने की कोशिश हो रही है। प्रक्रिया वापस लेने की मांग भी की गई। चुनाव आयोग ने बयान जारी कर सफाई दी है।
आयोग के अनुसार फरवरी 2026 में जारी अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए 97 मामलों के लिए बीएलओ ने घर घर जाकर फॉर्म 6 भरवाने की प्रक्रिया अलग से पूरी की। इनमें से कई लोगों का नाम सूची में शामिल हो चुका है, बाकी मामलों पर काम चल रहा है। आयोग ने दोहराया कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम नहीं छूटेगा।
विपक्षी दलों ने उन रिपोर्टों का हवाला दिया जिनमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR के तहत गोवा समेत कई जगहों पर नाम हटाने से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताई थी। पार्टियों का कहना है कि यह चुनाव में गड़बड़ी जैसा है। आयोग अपने 97 मामलों वाले बयान पर टिका है। आरोप और सफाई दोनों अलग अलग दावे हैं।
चुनाव आयोग ने SIR पर क्या कहा?
आयोग के बयान का केंद्र वे 97 मामले हैं जो फरवरी 2026 की अंतिम सूची में नहीं आए। बीएलओ को घर घर फॉर्म 6 कराने का काम अलग से दिया गया। कई नाम जुड़ चुके हैं, शेष प्रक्रियाधीन हैं। अंतिम वाक्य यह है कि योग्य मतदाता छूटेगा नहीं।
यह आंकड़ा विपक्ष के 1.8 लाख वाले दावे से मेल नहीं खाता। आयोग 97 बचे मामलों की सुधार प्रक्रिया बता रहा है। गोवा फॉरवर्ड पार्टी पूरे प्रक्रिया में 1.8 लाख नाम कटने का दावा करती है। दोनों संख्याएं अलग स्रोत से हैं। उन्हें जोड़कर एक ही सूची न माना जाए।
आयोग ने भाजपा वाले आरोप का राजनीतिक जवाब नहीं दिया। बयान प्रशासनिक है। सूची से छूटे नामों को फॉर्म 6 से जोड़ने और बाकी फाइलों पर काम जारी रखने की बात कही गई है। योग्य मतदाता न छूटे, यह दोहराया गया वाक्य विपक्ष की आशंका का सीधा खंडन है, लेकिन कांग्रेस, जीएफपी और आप उसे पर्याप्त नहीं मान रहे।
कांग्रेस ने पणजी में क्या आरोप लगाए?
गोवा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सुनील कवथंकर ने पणजी में कहा कि भाजपा SIR के जरिए चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है, क्योंकि गोवा जैसे राज्यों में पार्टी का सत्ता में लौटना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा, “सही वोटरों के नाम हटाना चुनाव में गड़बड़ी करने जैसा है। भारत का चुनाव आयोग बीजेपी का एक अंग बन गया है, जिसका इस्तेमाल वे चुनाव जीतने के लिए कर रहे हैं।”
उन्होंने SIR वापस लेने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा, “पूरे देश में कांग्रेस को जो समर्थन मिल रहा है, उससे बीजेपी घबरा गई है, इसीलिए वे इस तरह के हथकंडों से चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं।” ये कांग्रेस के आरोप हैं। आयोग की स्वतंत्रता पर लगा आरोप गंभीर है, साबित ठहराया गया निष्कर्ष नहीं।
कांग्रेस का तर्क यह है कि नाम कटना महज तकनीकी गलती नहीं, चुनावी नतीजे बदलने वाला कदम है। आयोग का तर्क यह है कि छूटे 97 मामलों पर फॉर्म 6 चल रहा है और योग्य नाम जुड़ेंगे। दोनों पाठ एक दूसरे के सामने हैं। पणजी वाले बयान में मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम विपक्षी आरोप के केंद्र में रहा। आयोग के लिखित जवाब में व्यक्तिगत नाम लेकर खंडन नहीं है, प्रक्रिया का ब्योरा है।
जीएफपी ने 1.8 लाख वोटर और रद्द करने की मांग क्यों की?
गोवा फॉरवर्ड पार्टी अध्यक्ष विजय सरदेसाई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वोटर सूची से हटाए गए सभी नाम तुरंत बहाल किए जाएं, सिवाय उन लोगों के जिनकी मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि प्रक्रिया के दौरान 1.8 लाख वोटर सूची से हटाए गए।
सरदेसाई ने याद दिलाया कि गोवा में चुनाव बहुत कम अंतर से जीते जाते हैं, कभी कभी 100 से भी कम वोटों से। ऐसे में नाम हटने से 2027 के नतीजे गलत हो सकते हैं, ऐसा उनका कहना है। चुनाव नजदीक हैं और आयोग के पास SIR दोबारा करने का समय नहीं, इसलिए पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी जाए, यह उनकी मांग है।
छोटे अंतर वाला तर्क गोवा की पुरानी चुनावी हकीकत से जुड़ा है। उसे 1.8 लाख वाले दावे से जोड़कर जीएफपी ने जोखिम बढ़ाकर पेश किया। आयोग ने 1.8 लाख की पुष्टि या खंडन इस बयान में नहीं किया। उसने 97 मामलों की बात कही। पाठक दोनों आंकड़ों को अलग रखे। बहाली की मांग मृत वोटरों को छोड़कर बाकी सभी पर है। रद्द करने की मांग समय की कमी पर टिकी है।
आप ने CEC के खिलाफ कार्रवाई क्यों मांगी?
आम आदमी पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। आरोप है कि SIR ने जमीनी स्तर के चुनाव अधिकारियों के अधिकार कमजोर कर दिए। गोवा अध्यक्ष वाल्मीकि नाइक ने कहा, “पहले हमारी जमीनें छीनी जा रही थीं, अब हमारे वोट भी छीने जा रहे हैं।”
उन्होंने गोवा को बड़ी समस्या का छोटा हिस्सा बताया। आरोप लगाया गया कि जो वोटर भाजपा का समर्थन नहीं करते थे, उन्हें सूची से हटाकर निशाना बनाया जा सकता है। यह इरादे वाला आरोप है। आयोग के बयान में पार्टीवार लक्ष्य का कोई उल्लेख नहीं। फॉर्म 6 वाली सुधार प्रक्रिया को आयोग सामान्य सुधार बता रहा है।
आप का जोर स्थानीय अधिकारियों की कम होती भूमिका पर है। कांग्रेस का जोर आयोग की स्वतंत्रता पर है। जीएफपी का जोर संख्या और छोटे अंतर पर है। तीनों दल SIR रोकने या काटने वाले असर को रद्द करने की दिशा में बोल रहे हैं। मांग एक जैसी है, तर्क अलग हैं।
आरोप और आधिकारिक सफाई के बाद स्थिति क्या है?
एक तरफ विपक्ष कहता है कि SIR से सही वोटर कट रहे हैं, चुनाव प्रभावित होगा, प्रक्रिया वापस हो। दूसरी तरफ चुनाव आयोग कहता है कि फरवरी 2026 की सूची से छूटे 97 मामलों पर घर घर फॉर्म 6 चला, कई नाम जुड़ चुके हैं, बाकी चल रहे हैं, योग्य मतदाता नहीं छूटेगा।
सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित चिंता का हवाला विपक्ष देता है। उस रिपोर्ट का पूरा पाठ इस सामग्री में नहीं है। हवाला आरोप की बुनियाद बनाया गया है। आयोग ने उस आंतरिक चिंता पर अलग टिप्पणी नहीं की। सार्वजनिक जवाब 97 मामलों और फॉर्म 6 तक सीमित रहा।
2027 के चुनाव और कम अंतर वाली सीटें विपक्ष के डर का कारण हैं। आयोग समयसीमा पर रद्द करने की मांग का जवाब नहीं देता, सुधार जारी रखने की बात करता है। गोवा SIR अब कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक विश्वास दोनों का विषय है। सूची में नाम जुड़ना आयोग का काम है। प्रक्रिया पर भरोसा विपक्ष का सवाल है। दोनों परतें एक बयान से खत्म नहीं होतीं। योग्य मतदाता न छूटे, यह वाक्य तभी वजनदार होगा जब बाकी लंबित मामले भी सूची में दिखें। विपक्ष तब तक 1.8 लाख और रद्दीकरण की मांग दोहराता रहेगा, जब तक उसे आंकड़ा मंजूर न हो। फिलहाल रिकॉर्ड में आयोग की सफाई और तीन दलों की अलग अलग मांगें साथ साथ हैं।
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