Bhadohi News: उत्तर प्रदेश के भदोही जिले की पहचान एक बार फिर बदल गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को घोषणा की कि अब इस जिले को संत रविदास नगर भदोही के नाम से जाना जाएगा। कालीन नगरी के रूप में मशहूर यह जिला जिला बनने के बाद से अब तक पांचवीं बार अपना नाम बदल चुका है।
यह घोषणा कारपेट एक्सपो मार्ट में पचासवें अंतरराष्ट्रीय कालीन मेले के उद्घाटन के बाद भिखारीपुर मैदान में आयोजित जनसभा में की गई। घोषणा के बाद मौजूद लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए। भदोही की यह नई पहचान संत रविदास के सम्मान से जुड़ी है जिनके विचारों में समानता भाईचारा और सामाजिक समरसता का संदेश प्रमुख रहा है।
सीएम योगी ने कब और कहां की घोषणा?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को कारपेट एक्सपो मार्ट में पचासवें अंतरराष्ट्रीय कालीन मेले का उद्घाटन किया। इसके बाद भिखारीपुर मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जिले के नाम को लेकर ऐलान किया। उन्होंने कहा कि अब भदोही को संत रविदास नगर भदोही के नाम से जाना जाएगा।
जनसभा में मौजूद लोगों ने इस घोषणा का स्वागत जय श्री राम के नारों के साथ किया। कालीन उद्योग से जुड़े इस आयोजन के दौरान हुई घोषणा ने जिले की नई पहचान को औपचारिक रूप दे दिया। यह बदलाव स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि जिले का नाम पहले भी कई बार बदला जा चुका है।
भदोही जिला कब बना और पहले क्या नाम था?
भदोही को तीस जून उन्नीस सौ चौहत्तर को वाराणसी से अलग कर नया जिला बनाया गया था। उस समय इसका नाम भदोही रखा गया। करीब तीन साल बाद जिले के नाम में पहला बदलाव हुआ।
चार दिसंबर उन्नीस सौ सत्तानवे को तत्कालीन मायावती सरकार ने इसका नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया। यह नाम संत रविदास के सम्मान में रखा गया था। इसके बाद नाम बदलने का सिलसिला जारी रहा। बारह नवंबर उन्नीस सौ निन्यानवे को तत्कालीन मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता की भाजपा सरकार ने दोनों नामों को जोड़ दिया। इसके बाद जिला संत रविदास नगर भदोही कहलाने लगा।
नाम परिवर्तन का सिलसिला कैसे चलता रहा?
वर्ष दो हजार चौदह में एक बार फिर नाम बदला। छह दिसंबर दो हजार चौदह को अखिलेश यादव सरकार ने संत रविदास नगर नाम हटा दिया और जिले की पहचान फिर भदोही कर दी। अब योगी आदित्यनाथ की घोषणा के बाद एक बार फिर संत रविदास नगर भदोही नाम वापस आ गया है।
इस तरह उन्नीस सौ चौहत्तर में जिला बनने के बाद नाम में यह पांचवां बदलाव है। बत्तीस साल के इस सफर में जिले की पहचान राजनीतिक बदलावों के साथ बार बार बदली है। हर सरकार ने अपने तरीके से नाम तय किया। कभी सिर्फ भदोही तो कभी संत रविदास नगर और कभी दोनों नामों का संयोजन।
संत रविदास का नाम क्यों जोड़ा गया?
संत रविदास भारतीय समाज के प्रमुख संत और कवि माने जाते हैं। उनके विचारों में समानता भाईचारा और सामाजिक समरसता का संदेश प्रमुख रहा है। जिले के नाम के साथ उनका नाम जुड़ना इसी विरासत को सम्मान देने के तौर पर देखा जा रहा है।
भदोही कालीन उद्योग के लिए जाना जाता है। कालीन नगरी के रूप में इसकी पहचान लंबे समय से बनी हुई है। नाम में संत रविदास का जुड़ाव सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू को भी जोड़ता है। स्थानीय लोगों के लिए यह बदलाव नई पहचान लेकर आया है जबकि इतिहास में नाम परिवर्तन के कई अध्याय पहले से मौजूद हैं।
नाम बदलाव का इतिहास क्यों महत्वपूर्ण है?
जिला गठन के बाद से अब तक पांच बार नाम बदला जाना दर्शाता है कि भदोही की पहचान राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़ी रही है। उन्नीस सौ चौहत्तर में वाराणसी से अलग होने के बाद भदोही नाम से शुरुआत हुई। मायावती सरकार ने संत रविदास नगर किया। भाजपा सरकार ने दोनों जोड़ दिए। अखिलेश यादव सरकार ने फिर भदोही कर दिया। अब योगी सरकार ने संत रविदास नगर भदोही वापस ला दिया।
यह सिलसिला बताता है कि जिले का नाम स्थिर नहीं रहा। हर बदलाव के साथ आधिकारिक दस्तावेजों प्रशासनिक कामकाज और स्थानीय पहचान में असर पड़ता है। कालीन मेले जैसे आयोजन के दौरान हुई घोषणा ने इस बदलाव को और प्रमुख बना दिया। जनसभा में नारेबाजी के साथ स्वागत ने स्थानीय प्रतिक्रिया को भी रेखांकित किया।
भदोही अब संत रविदास नगर भदोही के रूप में जाना जाएगा। यह नाम संत रविदास की विरासत और जिले की पुरानी पहचान दोनों को समेटे हुए है। बत्तीस साल में पांचवें बदलाव के साथ जिला अपनी नई आधिकारिक पहचान की ओर बढ़ गया है। कालीन उद्योग से जुड़े इस क्षेत्र के लिए नाम का यह संयोजन सांस्कृतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्व रखता है।
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