नियम के अनुसार अवैध कालोनी को वैध रास्ते पर लाने के लिए भूखंड लेकर विकास का प्रावधान है। अवैध निर्माण हटने के बाद कालोनाइजर पर एफआईआर का भी नियम है। स्थानीय रिपोर्टों में कहा गया है कि निगम ने इन दोनों रास्तों को पूरी तरह नहीं अपनाया, इसलिए आंकड़ा जस का तस पड़ा है। हाल में राजस्व विभाग की ओर से ग्रामीण इलाकों में अवैध कालोनी बसाने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं।
511 कालोनियों पर कार्रवाई क्यों अटकी हुई है?
नगर निगम की सीमा में चिन्हित 932 अवैध कालोनियों में से 511 पर न तो कार्रवाई पूरी हुई है और न कालोनी को नियम के तहत विकसित किया गया है। जानकारी मिलने के बाद दोनों विकल्प खुले थे: नियम विरुद्ध निर्माण पर सख्ती, या निर्धारित प्रक्रिया से विकास। रिपोर्टों के अनुसार दोनों अधूरे रह गए। खरीदारों को न साफ प्लॉट का रिकॉर्ड मिला, न बुनियादी विकास का भरोसा।
सड़क उखाड़ने और बाउंड्री तोड़ने वाली कार्रवाई कुछ स्थलों तक सीमित रही। पूरी सूची पर एक समान आदेश लागू होने का सार्वजनिक ब्योरा नहीं है। लंबित 511 कालोनियों का नक्शा, स्वामित्व और निर्माण की स्थिति अलग-अलग हो सकती है। एक ही नोटिस से सभी मामलों का निपटारा संभव नहीं।
खसरे के कॉलम 12 में दर्ज 379 कालोनियों पर नामांतरण क्यों रुक गया?
शहर के एसडीएम के जरिए अवैध कालोनियों की जानकारी जुटाकर उनके सर्वे नंबर खसरे के कॉलम 12 में दर्ज किए गए। नगर निगम सीमा की 379 कालोनियों पर यह काम अनुविभागीय अधिकारी स्तर पर पूरा हो चुका है। यह जानकारी निगम की ओर से प्रशासन को भेजी गई थी। सर्वे नंबर दर्ज होने के बाद तहसीलदार स्तर पर नामांतरण नहीं हो रहे।
नामांतरण रुकने से प्लॉट खरीदारों का नाम राजस्व रिकॉर्ड में नहीं चढ़ रहा। बैंक ऋण, बिक्री और बिजली-पानी कनेक्शन जैसे कामों में यह अड़चन बन सकता है। खरीदार पहले अवैध कालोनी में फंसे, अब रिकॉर्ड अपडेट भी अटका है। कॉलम 12 में दर्ज होना अपने आप नियमितीकरण नहीं है। यह चिह्न है कि भूमि का वह हिस्सा अवैध बसाहट के रूप में चिन्हित है।
ग्रामीण इलाकों में एफआईआर और 29 सितंबर के निर्देश का क्या मतलब है?
ग्रामीण क्षेत्र की अवैध कालोनियों पर कार्रवाई का अधिकार कलेक्टर के पास माना जाता है। करीब पांच माह पहले जिला प्रशासन और पुलिस ने बिजौली क्षेत्र समेत आसपास के गांवों में 17 अवैध कालोनियां बसाने वालों पर एफआईआर दर्ज कराई थी। बिल्डर और कालोनाइजरों के खिलाफ मध्यप्रदेश ग्राम पंचायत राज एवं स्वराज अधिनियम, 1993 के तहत प्रकरण बने।
29 सितंबर को कलेक्टर ने उन भूमिस्वामियों और कालोनी विकासकर्ताओं पर आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने के निर्देश दिए, जो वैध दस्तावेज नहीं दे पाए। नगर परिषद और ग्रामीण क्षेत्रों की कालोनियों पर अनुविभागीय अधिकारियों (राजस्व) ने नियमानुसार कार्रवाई के प्रस्ताव कलेक्टर के सामने रखे थे। संबंधित पक्ष दस्तावेज पेश करने में असफल रहे। इन निर्देशों का शहरी निगम सीमा वाली 511 लंबित कालोनियों से सीधा मेल हर मामले में नहीं बैठता। ग्रामीण और नगर निगम क्षेत्र की प्रक्रिया अलग है।
2016 की सूची में ग्वालियर सबसे ऊपर क्यों था?
नगरीय प्रशासन विभाग ने 2016 में प्रदेशभर में 7,981 अवैध कालोनियां चिन्हित की थीं। इनमें 3,155 कालोनियां सिर्फ 16 नगर निगम क्षेत्रों में थीं। उस समय ग्वालियर नगर निगम सूची में सबसे ऊपर था, जहां 696 अवैध बसाहटें दर्ज हुई थीं। अब की गिनती 932 है, यानी पुरानी सूची के बाद नई बसाहटें भी जुड़ीं या सर्वे में और मामले सामने आए।
दस साल बाद भी लंबित कार्रवाई बताती है कि चिह्नित करना और नियमित करना एक ही काम नहीं है। कालोनाइजर पर एफआईआर, खरीदार का नामांतरण और सड़क-नाली का विकास तीन अलग मोर्चे हैं। एक मोर्चे पर सख्ती दूसरे मोर्चे पर राहत अपने आप नहीं लाती।
प्लॉट खरीदारों के पास अभी कौन सा रास्ता बचता है?
जिनके सर्वे नंबर कॉलम 12 में दर्ज हैं, उन्हें नामांतरण तब तक मुश्किल रहेगा जब तक राजस्व और निगम संयुक्त प्रक्रिया न निकालें। दस्तावेज रखने वाले खरीदार रसीद, रजिस्ट्री और लेआउट की प्रति संभालकर रखें। बिना लेआउट अप्रूवल के नया सौदा करने से वही स्थिति दोहरा सकती है। ग्रामीण क्षेत्र में 29 सितंबर के निर्देश के बाद कालोनाइजर पर प्रकरण बढ़ सकते हैं, पर खरीदार का स्वामित्व अपने आप वैध नहीं हो जाता।
ग्वालियर में 932 चिन्हित कालोनियों में से 511 पर निगम की कार्रवाई लंबित है और 379 खसरे के कॉलम 12 में दर्ज हैं। कुछ जगह मशीन से सड़क और बाउंड्री हटी, पर पूरी सूची पर विकास या एफआईआर का चक्र पूरा नहीं हुआ। नामांतरण अटकने से खरीदार परेशान हैं। अगली स्थिति निगम, तहसील और कलेक्टर कार्यालय के संयुक्त आदेश पर निर्भर करेगी।
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