Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी खर्च की जवाबदेही को लेकर एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। याचिका में मांग की गई है कि जो विधायक बिना किसी अनिवार्य कारण के स्वेच्छा से इस्तीफा देकर उसी सीट पर दोबारा उपचुनाव लड़ते हैं, उनसे उपचुनाव का पूरा सरकारी खर्च वसूला जाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने 27 अक्टूबर 2026 को इस याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी पक्षों से जवाब मांगा है।
यह मुद्दा तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के बाद AIADMK के छह विधायकों के इस्तीफे से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसे उपचुनावों का बोझ करदाताओं पर नहीं पड़ना चाहिए। मद्रास हाईकोर्ट पहले इस याचिका को खारिज कर चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अब नए सिरे से कानूनी सवाल उठ रहे हैं।
याचिका में क्या मांग की गई है और Election Expenditure Security क्या है?
याचिका में चुनाव खर्च की जवाबदेही तय करने के लिए ‘Election Expenditure Security’ नामक एक व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है। इसके तहत यदि कोई विधायक स्वेच्छा से इस्तीफा देने के बाद उसी सीट पर होने वाले उपचुनाव में फिर से उम्मीदवार बनता है, तो उसे नामांकन के समय एक निर्धारित राशि जमा करनी होगी। यह राशि संबंधित उपचुनाव पर सरकारी खजाने से खर्च होने वाली रकम के बराबर रखने का प्रस्ताव है।
याचिकाकर्ता के. सुथन का कहना है कि इस्तीफे के कारण उपचुनाव कराना पड़ता है, जिससे सार्वजनिक धन का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। उनका तर्क है कि जनता द्वारा दिए गए जनादेश और उसे लागू करने में खर्च किए गए पैसे की सुरक्षा होनी चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसा कदम नई अयोग्यता नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था है। अदालत को अब यह देखना है कि यह प्रस्ताव मौजूदा कानून के दायरे में आता है या नहीं।
तमिलनाडु के AIADMK विधायकों से जुड़ा मामला क्या है?
याचिका तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के बाद हुई घटनाओं पर आधारित है। AIADMK के छह निर्वाचित विधायकों ने अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया था। इनमें एस. जयकुमार, मरगाथम कुमारवेल, पी. सत्यबामा, डॉ. एसाक्की सुब्बैया, सी. विजयभास्कर और एम. आर. विजयभास्कर के नाम शामिल हैं।
याचिका में दावा किया गया है कि इन इस्तीफों के कारण संबंधित विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव कराने पड़े। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि विधायकों ने बिना किसी अनिवार्य परिस्थिति के राजनीतिक कारणों से इस्तीफा दिया। इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा। मामला केवल पार्टी बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाताओं के जनादेश और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से भी जुड़ा हुआ है। पुलिस या अन्य एजेंसियों की कोई भूमिका इसमें नहीं बताई गई है; यह विशुद्ध रूप से चुनावी कानून और वित्तीय जवाबदेही का सवाल है।
मद्रास हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की थी?
याचिकाकर्ता के. सुथन की इस जनहित याचिका को पहले मद्रास हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को खारिज कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश एस. ए. धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने कहा कि चुनाव खर्च की वसूली के लिए नई व्यवस्था बनाना और इस्तीफा देने वाले विधायकों पर नई अयोग्यता लागू करना विधायी नीति का विषय है।
हाईकोर्ट का मानना रहा कि न्यायपालिका मौजूदा कानून की व्याख्या और उसका प्रवर्तन कर सकती है, लेकिन वह अपने आदेश से नया दंडात्मक या वित्तीय ढांचा नहीं बना सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और संविधान के मौजूदा प्रावधानों में ऐसे इस्तीफों के लिए प्रस्तावित दंड का स्पष्ट आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह मुद्दा संसद या विधानमंडल के क्षेत्र में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कार्रवाई की है?
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन शामिल हैं, ने 27 अक्टूबर 2026 को याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग (ECI), तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और संबंधित विधायकों सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है।
अदालत ने अभी यह अंतिम निर्णय नहीं दिया है कि प्रस्तावित व्यवस्था संविधान के अनुरूप है या नहीं। पीठ ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है ताकि आगे की सुनवाई में मौजूदा चुनाव कानून, उम्मीदवारों के अधिकार और सार्वजनिक धन की जवाबदेही के बीच संतुलन का मुद्दा स्पष्ट हो सके। सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई को चुनावी सुधारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने कौन-से कानूनी सवाल खड़े हैं?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि इस्तीफा देकर उपचुनाव कराने की स्थिति पैदा करने वाले उम्मीदवार पर चुनावी खर्च के बराबर अग्रिम जमा राशि की शर्त लगाना नई अयोग्यता होगी या एक वैध व्यवस्था। याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत का भी सहारा लिया है और पूछा है कि क्या जनता द्वारा दिए गए चुनावी जनादेश तथा उसे लागू करने में खर्च किए गए सार्वजनिक धन की सुरक्षा इस सिद्धांत के दायरे में आती है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करना और उससे एक निर्धारित राशि जमा कराने की शर्त लगाना कानूनी रूप से अलग प्रश्न हो सकते हैं। आगे की सुनवाई में अदालत को यह देखना होगा कि मौजूदा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान के प्रावधानों के तहत ऐसी व्यवस्था लागू की जा सकती है या नहीं। फिलहाल मामला नोटिस के चरण में है और सभी पक्षों के जवाब आने के बाद विस्तृत बहस होगी।
यह याचिका चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सार्वजनिक धन की सुरक्षा को लेकर व्यापक चर्चा का आधार बन सकती है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने वाले समय में विधायकों के इस्तीफे और उपचुनावों के नियमों पर असर डाल सकता है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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