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Amit Shah: UCC पर अमित शाह का बड़ा दांव, टीडीपी-शिवसेना साथ, नीतीश की जेडीयू ने क्यों दिखाई तल्खी?

Amit Shah: देश की राजनीति में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी एक बार फिर बड़ी बहस का केंद्र बन गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में यूसीसी लागू कर दी जाएगी। इस घोषणा के बाद गठबंधन के भीतर साफ तौर पर दो खेमे नजर आने लगे हैं। चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और जीतन राम मांझी की हम पार्टी अमित शाह के रुख के साथ खड़ी दिख रही हैं, जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू ने साफ कह दिया है कि बिहार में इस तरह का कोई कदम स्वीकार नहीं किया जाएगा। यूसीसी लंबे समय से बीजेपी के मूल एजेंडे का हिस्सा रहा है, और राम मंदिर तथा अनुच्छेद 370 के बाद अब पार्टी इसे भी अमली जामा पहनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। सवाल यह है कि जेडीयू आखिर बाकी सहयोगियों से अलग रास्ता क्यों चुन रही है।

Amit Shah: बीजेपी की राज्य स्तरीय रणनीति

समान नागरिक संहिता का मूल भाव यह है कि देश के सभी नागरिकों के लिए, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या लिंग के हों, एक समान कानून लागू हो। जनसंघ के जमाने से ही यह बीजेपी के बुनियादी एजेंडे का हिस्सा रहा है। संसद के रास्ते इसे लागू करने के बजाय पार्टी ने अब राज्य विधानसभाओं के जरिए कानून लाने की रणनीति अपनाई है। उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश के बाद अब पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी यूसीसी को लागू करने की तैयारी चल रही है।

21 राज्यों में लागू करने का लक्ष्य

अमित शाह ने साफ किया है कि बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए शासित कुल 21 राज्यों में 2029 के चुनाव से पहले यूसीसी लागू कर दी जाएगी। इनमें से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखंड, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, त्रिपुरा, मणिपुर और दिल्ली में बीजेपी अपने दम पर सरकार चला रही है। इसके अलावा बिहार, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, सिक्किम और मिजोरम में गठबंधन या समर्थित सरकारें काम कर रही हैं। जहां अपने दम पर सरकार है, वहां यूसीसी लाना आसान माना जा रहा है, लेकिन गठबंधन वाले राज्यों में यह इतना सीधा नहीं दिख रहा।

टीडीपी और शिवसेना का समर्थन

एनडीए के भीतर यूसीसी को लेकर स्थिति एक जैसी नहीं है। एकनाथ शिंदे की शिवसेना शुरू से ही इस मुद्दे की समर्थक रही है और इसे अनुच्छेद 370 तथा राम मंदिर की तरह जरूरी कदम मानती है। शिंदे ने खुद कहा कि पार्टी के संस्थापक बाल ठाकरे ने समान कानून की कल्पना पहले ही कर ली थी। दूसरी ओर आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी ने अपेक्षाकृत लचीला रुख अपनाया है। पार्टी का कहना है कि वह राष्ट्रीय मुद्दों पर बीजेपी का साथ देने को तैयार है, बशर्ते अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों से कोई समझौता न हो।

बिहार में बंटी हुई राय

बिहार में एनडीए के भीतर यूसीसी को लेकर स्पष्ट मतभेद देखने को मिल रहे हैं। जीतन राम मांझी ने राष्ट्रीय सुरक्षा और एक देश-एक कानून की बात करते हुए अमित शाह के बयान का समर्थन किया है। इसके उलट जेडीयू नेता विजय कुमार चौधरी ने कहा कि पार्टी पहले यूसीसी बिल का अध्ययन करेगी, और अगर उसके प्रावधान स्वीकार्य लगे तो बिना ठोस कारण विरोध नहीं किया जाएगा। यह बयान जेडीयू के सतर्क और गणनात्मक रुख को दर्शाता है।

जेडीयू क्यों ले रही अलग स्टैंड

नीतीश कुमार की पार्टी शुरू से ही यूसीसी पर सर्वसम्मति और बातचीत आधारित रुख अपनाती रही है। पार्टी नेता श्याम रजक ने स्पष्ट कहा कि नीतीश कुमार पहले ही कह चुके हैं कि बिहार में यूसीसी लागू नहीं होने दी जाएगी। इसके पीछे बड़ी वजह बिहार की सामाजिक बनावट मानी जा रही है। राज्य में करीब 17 फीसदी मुस्लिम आबादी है, और जेडीयू का जनाधार सिर्फ कुर्मी-कोयरी या अति पिछड़ा वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि पसमांदा मुस्लिम और महिला मतदाताओं तक फैला हुआ है।

धर्मनिरपेक्ष छवि बचाने की कोशिश

जेडीयू का तर्क है कि यूसीसी को किसी एक समुदाय पर थोपने के बजाय सभी पक्षों से संवाद करके ही लागू किया जाना चाहिए। पार्टी पहले भी विधि आयोग को भेजे पत्र में कह चुकी है कि भारत विविधताओं का देश है, इसलिए धार्मिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान जरूरी है। बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चलाने के बावजूद नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि से समझौता करते नहीं दिखना चाहते, क्योंकि विपक्ष लगातार उन पर बीजेपी के आगे झुकने के आरोप लगाता रहा है।

Amit Shah: क्या टिक पाएगा जेडीयू का विरोध

अमित शाह ने दो टूक कहा है कि बीजेपी अपने वैचारिक संकल्पों से पीछे नहीं हटेगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जेडीयू अपने रुख पर अंत तक कायम रह पाएगी। इससे पहले सीएए, ट्रिपल तलाक और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर भी जेडीयू ने शुरुआत में विरोध जताया था, लेकिन बाद में नीतीश कुमार ने इन पर समझौता कर लिया था। वक्फ संशोधन बिल के दौरान भी मुस्लिम समुदाय के भारी विरोध के बावजूद नीतीश ने बीजेपी की नीति का समर्थन किया था, जिससे इस बार भी उनके अंतिम रुख को लेकर सवाल बने हुए हैं।

कुल मिलाकर, समान नागरिक संहिता को लेकर एनडीए के भीतर की तस्वीर पूरी तरह एकसमान नहीं है। जहां शिवसेना और टीडीपी जैसे सहयोगी दल इसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं जेडीयू बिहार की सामाजिक और राजनीतिक जमीन को ध्यान में रखते हुए सतर्क रुख अपना रही है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी अपने गठबंधन सहयोगियों को कैसे साथ लेकर 2029 से पहले यूसीसी को अमलीजामा पहनाती है, और नीतीश कुमार अपने पुराने रुख पर कितनी देर तक टिके रह पाते हैं।

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Author: Sanjna Gupta

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