Chhath Puja 2026: देशभर के लाखों श्रद्धालु हर साल छठ पूजा 2026 का इंतजार बड़ी आस्था के साथ करते हैं। इस बार यह चार दिवसीय महापर्व 13 नवंबर शुक्रवार से शुरू होगा और 16 नवंबर सोमवार को उषा अर्घ्य के साथ पूरा होगा। वैदिक पंचांग के अनुसार पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक मनाया जाएगा। पहले दिन नहाय-खाय होगा, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन उगते सूर्य को उषा अर्घ्य दिया जाएगा। छठ पूजा 2026 में व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं। मान्यता है कि छठी मैया और सूर्य देव की विधिवत आराधना से संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ अब दिल्ली और अन्य महानगरों में भी घाट सजने लगते हैं। दीwali के कुछ दिन बाद आने वाले इस पर्व की तैयारी घर-घर में पहले से शुरू हो जाती है। नहाय-खाय से लेकर पारण तक का पूरा क्रम नीचे विस्तार से दिया गया है।
Chhath Puja 2026 का धार्मिक महत्व और पृष्ठभूमि
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का पर्व है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि शुद्धता, संयम और प्रकृति के प्रति आभार का अनुष्ठान माना जाता है। व्रती नदी या तालाब के जल में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह दृश्य पूरे पूर्वी भारत में आस्था का प्रतीक बन चुका है।
प्राचीन मान्यता के अनुसार इस व्रत का संबंध महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। कर्ण को सूर्य पुत्र माना जाता है और कहा जाता है कि उन्होंने जल में खड़े होकर सूर्य की आराधना की थी। आज भी वही भाव घाटों पर दिखाई देता है। छठ पूजा 2026 में भी यही परंपरा दोहराई जाएगी।
पर्व का सबसे कठिन हिस्सा निर्जला व्रत है। खरना के बाद व्रती न जल पीते हैं और न अन्न ग्रहण करते हैं। उषा अर्घ्य के बाद ही पारण होता है। परिवार के सदस्य इस दौरान व्रती की हर जरूरत का ध्यान रखते हैं। घाटों की सफाई, बांस के सूप, ठेकुआ और मौसमी फलों की व्यवस्था पहले से कर ली जाती है।
नहाय खाय 2026: पर्व की पवित्र शुरुआत
नहाय खाय छठ पूजा 2026 का पहला दिन है। यह 13 नवंबर शुक्रवार को पड़ेगा। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को व्रती सुबह स्नान करते हैं। नदी, तालाब या घर के स्वच्छ जल से स्नान के बाद सूर्य देव और कुल देवी की पूजा होती है।
इस दिन भोजन सात्विक होता है। लौकी की सब्जी, चने की दाल और चावल का भोग लगाया जाता है। प्याज-लहसुन का प्रयोग नहीं होता। भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण किया जाता है। घर की रसोई पूरी तरह शुद्ध रखी जाती है। कई परिवार आम की लकड़ी पर भोजन पकाते हैं।
नहाय खाय के दिन से ही घर में छठ की तैयारी तेज हो जाती है। बर्तन अलग रखे जाते हैं। व्रती मानसिक रूप से अगले तीन दिनों के कठिन अनुशासन के लिए तैयार होते हैं। यह दिन शुद्धिकरण का माना जाता है। शरीर और मन दोनों को व्रत के योग्य बनाने का यही अवसर होता है।
खरना 2026: निर्जला व्रत की शुरुआत
खरना 14 नवंबर शनिवार को मनाया जाएगा। कार्तिक शुक्ल पंचमी को यह दिन आता है। पूरे दिन व्रती उपवास रखते हैं। शाम को गुड़ की खीर और रोटी का भोग लगाया जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
खरना के दिन घर-घर में खीर बनती है। पड़ोसियों और रिश्तेदारों में प्रसाद बांटा जाता है। वातावरण भक्तिमय रहता है। लोकगीत गूंजने लगते हैं। व्रती इस दिन के बाद सूर्योदय तक कुछ नहीं खाते-पीते।
यह दिन संयम का प्रतीक है। परिवार वाले व्रती को आराम देने का पूरा ध्यान रखते हैं। खरना के बाद घाट की तैयारी और अंतिम सामग्री जुटाने का काम चलता रहता है। छठ पूजा 2026 में यह दूसरा दिन व्रत की असली परीक्षा का आरंभ माना जाता है।
संध्या अर्घ्य 2026: डूबते सूर्य को अर्पण
छठ पूजा 2026 का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण दिन संध्या अर्घ्य का है। यह 15 नवंबर रविवार को होगा। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती घाट के जल में खड़े होकर फल, ठेकुआ और जल अर्पित करते हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस दिन सूर्यास्त शाम 05 बजकर 45 मिनट पर होगा। समय शहर के अनुसार थोड़ा बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखना जरूरी है। घाटों पर दीये जलते हैं, सूप सजाए जाते हैं और छठी मैया के गीत गूंजते हैं।
संध्या अर्घ्य के समय पूरा परिवार घाट पर इकट्ठा होता है। महिलाएं रंग-बिरंगे वस्त्र पहनती हैं। पुरुष भी सहयोग करते हैं। यह दृश्य आस्था और सामूहिकता दोनों का प्रतीक बन जाता है। अर्घ्य देते समय सूर्य की किरणें जल पर पड़ती हैं और पूरा घाट सुनहरा दिखने लगता है।
उषा अर्घ्य 2026: उगते सूर्य के साथ व्रत का समापन
उषा अर्घ्य छठ पूजा 2026 का अंतिम दिन है। 16 नवंबर सोमवार को कार्तिक शुक्ल सप्तमी पर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्योदय सुबह 06 बजकर 47 मिनट पर बताया गया है। समय स्थान के हिसाब से अलग हो सकता है।
सुबह अंधेरे में ही व्रती घाट पहुंच जाते हैं। उगते सूर्य की पहली किरण के साथ अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रत का पारण होता है। परिवार के सदस्य प्रसाद बांटते हैं और व्रती को आशीर्वाद देते हैं।
उषा अर्घ्य के साथ चार दिन का कठिन अनुष्ठान पूरा होता है। लोग घर लौटकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। कई जगह सामुदायिक भोज भी आयोजित होता है। यह क्षण राहत और संतोष दोनों लेकर आता है। छठ पूजा 2026 का यह समापन लाखों परिवारों के लिए साल का सबसे पवित्र पल होता है।
घाटों की तैयारी और सामाजिक स्वरूप
छठ पूजा अब केवल गांवों तक सीमित नहीं रही। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में भी प्रवासी बिहारी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग घाट सजाते हैं। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन घाटों की सफाई और सुरक्षा का इंतजाम करते हैं।
नदी किनारे बांस के मंडप लगते हैं। बिजली की व्यवस्था की जाती है। भीड़ को देखते हुए यातायात प्रबंधन भी किया जाता है। छठ पूजा 2026 में भी यही दृश्य दोहराया जाएगा। युवा पीढ़ी भी इस पर्व से जुड़ रही है। सोशल मीडिया पर घाटों की तस्वीरें और लोकगीत साझा किए जाते हैं। साथ ही पर्यावरण का ध्यान रखने की अपील भी बढ़ी है। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने और घाट साफ रखने की बात कही जाती है। कई संगठन स्वैच्छिक सफाई अभियान चलाते हैं।
व्रत के नियम और पारंपरिक सामग्री
छठ पूजा में शुद्धता सबसे ऊपर रखी जाती है। रसोई में नया या अलग बर्तन इस्तेमाल होता है। व्रती के कपड़े साफ रखे जाते हैं। ठेकुआ, ठेकुआ के साथ मौसमी फल, नारियल, गन्ना और केला सूप में रखे जाते हैं।
लोकगीत इस पर्व की आत्मा हैं। बिहार और झारखंड के पारंपरिक गीत घाटों पर गूंजते हैं। ये गीत छठी मैया से संतान सुख और परिवार की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। नई पीढ़ी भी इन गीतों को सीख रही है। व्रत के दौरान व्रती को अधिक परिश्रम से बचाने की सलाह दी जाती है। परिवार वाले हर काम में हाथ बंटाते हैं। यह सामूहिकता ही छठ पूजा को विशेष बनाती है।
शहरों और गांवों में मनाए जाने का तरीका
गांवों में घाट प्राकृतिक होते हैं। नदी या तालाब किनारे पूरा गांव इकट्ठा होता है। शहरों में कृत्रिम घाट बनाए जाते हैं। तालाबों को साफ कर घाट का रूप दिया जाता है। दोनों जगह आस्था एक जैसी रहती है। नेपाल के तराई क्षेत्र में भी छठ बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। सीमा पार के रिश्ते इस पर्व में और मजबूत दिखते हैं। छठ पूजा 2026 में भी यही सांस्कृतिक जुड़ाव देखने को मिलेगा।
प्रशासन की ओर से सुरक्षा और चिकित्सा व्यवस्था बढ़ाई जाती है। ठंड के मौसम में बुजुर्ग व्रतियों का खास ख्याल रखा जाता है। चार दिनों का यह क्रम आस्था, अनुशासन और परिवार के साथ बिताए गए समय को जोड़ता है। नहाय-खाय से शुद्धिकरण होता है, खरना से व्रत की नींव पड़ती है, संध्या अर्घ्य में डूबते सूर्य को धन्यवाद दिया जाता है और उषा अर्घ्य में नई सुबह का स्वागत होता है। छठ पूजा 2026 इन सभी भावों को एक बार फिर जीवंत करेगा। घाटों पर दीये जलेंगे, लोकगीत गूंजेंगे और सूर्य की किरणें जल पर पड़कर पूरे वातावरण को पवित्र बना देंगी। जो परिवार इस वर्ष व्रत रख रहे हैं, वे स्थानीय पंचांग से सूर्योदय-सूर्यास्त का सटीक समय जरूर देख लें क्योंकि शहर के अनुसार समय में अंतर हो सकता है। आस्था का यह महापर्व एक बार फिर पूर्वी भारत की सांस्कृतिक पहचान को देशभर में याद दिलाएगा।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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