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Delhi Air Pollution: सात दशक पुरानी चेतावनी से लेकर GRAP तक क्यों नहीं सुधरी सर्दियों की हवा?

Delhi Air Pollution: GRAP Explained, दिल्ली-एनसीआर की सर्दियां हर साल एक परिचित चेतावनी के साथ शुरू होती हैं। जैसे ही तापमान गिरता है और हवा स्थिर हो जाती है, वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) “बहुत खराब” या “गंभीर” श्रेणी में पहुंच जाता है। बुजुर्गों, बच्चों और श्वसन संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह मौसम खासतौर पर मुश्किल बन जाता है। मास्क पहनने, घरों के अंदर रहने और बाहरी गतिविधियों से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि हवा में मौजूद महीन कण (पीएम2.5 और पीएम10) फेफड़ों तक पहुंचकर स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं।

यह डर न तो हाल के वर्षों का है और न ही अचानक पैदा हुआ है। राजधानी की हवा को लेकर औपचारिक चिंता सात दशक पहले दर्ज हो चुकी थी। उसके बाद के दशकों में वैज्ञानिक अध्ययनों, अदालती हस्तक्षेपों और सरकारी रिपोर्टों के जरिए बार-बार आगाह किया गया। बावजूद इसके सर्दियों की हवा में स्थायी सुधार नहीं दिखा। आइए, इस पूरी कहानी को समझते हैं।

दिल्ली में वायु प्रदूषण की चिंता पहली बार कब और कैसे उठी?

Delhi Air Pollution
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राजधानी की आबोहवा को लेकर सबसे शुरुआती औपचारिक अध्ययन 1954 में सामने आया। उस शोध पत्र का शीर्षक था कि 1952 और 1953 की लगातार दो गर्मियों में मई-जून के दौरान दिल्ली में असामान्य रूप से धूल भरा मौसम रहा, क्या यह राजस्थान के रेगिस्तान के दिल्ली की ओर बढ़ने का संकेत है?

अध्ययन में उन वर्षों की धूल भरी आंधियों और मौसमी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। सवाल तो उठाया गया, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि रेगिस्तान सच में राजधानी की तरफ बढ़ रहा था। फिर भी यह दस्तावेज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पहली बार दिल्ली की हवा में धूल और कणों की असामान्य उपस्थिति को व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया गया। उस समय के वैज्ञानिकों ने यह संकेत दिया कि शहरी विस्तार और आसपास के क्षेत्रों की प्राकृतिक स्थिति मिलकर हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। यह प्रारंभिक चेतावनी बाद के दशकों में और गहरी होती गई।

बाद के दशकों में जहरीली हवा को लेकर कैसे चेताया जाता रहा?

1960 के दशक में स्थिति और स्पष्ट हुई। 1960 से 1962 के बीच एकत्र किए गए वायु कणों पर आधारित अध्ययन 1965 में प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक “स्टडीज ऑन एट्मोस्फेरिक पार्टिकुलेट मैटर एट दिल्ली” था। इसमें दिल्ली की हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों की रासायनिक संरचना का विस्तृत विवरण दिया गया। यह पहली बार था जब वैज्ञानिकों ने हवा की रासायनिक बनावट का शुरुआती खाका पेश किया और संकेत दिया कि केवल धूल नहीं, बल्कि अन्य प्रदूषक भी बढ़ रहे हैं।

1980 का दशक स्वास्थ्य संकट और कानूनी दखल का समय रहा। जब प्रदूषण जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनने लगा, तो पर्यावरण मामलों के वकील एम.सी. मेहता ने 1985 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस याचिका के बाद अदालती हस्तक्षेपों की एक श्रृंखला शुरू हुई, जिसमें उद्योगों और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर नियंत्रण के निर्देश दिए गए।

1990 के दशक में चिंता और बढ़ी। 1996 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने “स्लो मर्डर: द डेडली स्टोरी ऑफ व्हीकुलर पॉल्यूशन इन इंडिया” नामक रिपोर्ट जारी की, जिसमें वाहनों के धुएं से होने वाले जानलेवा स्वास्थ्य जोखिमों को उजागर किया गया। अगले वर्ष 1997 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण पर पहला आधिकारिक व्हाइट पेपर और एक्शन प्लान जारी किया।

2010 के दशक में चेतावनियां और तीखी हो गईं। 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के डेटाबेस में पीएम2.5 के आधार पर दिल्ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया। 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा लगता है जैसे दिल्लीवासी गैस चैंबर में सांस ले रहे हैं। इन घटनाओं ने प्रदूषण को केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि गंभीर जनस्वास्थ्य संकट के रूप में स्थापित किया।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए अब तक कौन-कौन से प्रमुख कदम उठाए गए?

Delhi Air Pollution
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1985 की याचिका के बाद कानूनी और प्रशासनिक प्रयास तेज हुए। 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन बसों को सीएनजी में बदलने का आदेश दिया। उसी वर्ष प्रदूषण नियंत्रण उपायों की निगरानी के लिए पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) का गठन हुआ।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में प्रवेश करने वाले व्यावसायिक ट्रकों पर पर्यावरण शुल्क और प्रवेश संबंधी कड़े प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया। 2016 में दिल्ली सरकार ने निजी वाहनों से उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए ऑड-ईवन योजना लागू की।

2017 में वायु गुणवत्ता खराब होने पर चरणबद्ध आपातकालीन पाबंदियां लागू करने के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) शुरू किया गया। इसी दौरान बदरपुर थर्मल पावर प्लांट को स्थायी रूप से बंद किया गया और कनॉट प्लेस में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में स्मॉग टावर लगाया गया।

2021 में वायु प्रदूषण दिल्ली की सीमाओं से आगे होने के कारण कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) का गठन हुआ, जो पंजाब से उत्तर प्रदेश तक वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए काम करता है। हाल के वर्षों में एआई-संचालित कमांड सेंटर, कैमरे और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) की प्रयोगशालाओं के जरिए वास्तविक समय में प्रदूषण स्रोतों की निगरानी की जा रही है।

इन कदमों का प्रभाव कितना रहा है?

सरकारों ने कई बड़े कदम उठाए, फिर भी रिपोर्टों और विश्लेषणों के अनुसार सर्दियों की वायु गुणवत्ता में लगातार या स्थायी सुधार नहीं दिखता। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के विश्लेषण के मुताबिक, 2022 में ग्रैप में संशोधन के बाद पिछले चार वर्षों (2022 से 2026) के दौरान AQI में उतार-चढ़ाव बना रहा।

दिल्ली ने इन चार सर्दियों के दौरान लगभग 78 से 83 प्रतिशत दिन, यानी लगभग हर पांच में से चार दिन, ग्रैप चरण-II या उससे सख्त पाबंदियों के अंतर्गत बिताए। जब ग्रैप के कड़े चरण (चरण-III और IV) लागू किए गए, तो पाबंदी के अगले सात दिनों का औसत AQI पिछले सात दिनों की तुलना में अधिक ही रहा। कड़े कदम लागू होने के पहले दो दिनों में AQI में औसतन 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई, जिसे ग्रैप से पहले की मौसमी परिस्थितियों से जोड़ा गया।

आपात पाबंदियों का असर सीमित रहा क्योंकि मूल स्रोत पूरे साल सक्रिय रहते हैं। वाहनों, उद्योगों, निर्माण धूल, पराली और द्वितीयक एयरोसोल (सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अमोनिया से बनने वाले कण) का योगदान मौसम के हिसाब से बदलता रहता है।

इस बार सर्दियों की तैयारी में क्या खास कदम शामिल हैं?

इस बार तैयारी में अंतर-राज्यीय समन्वय पर जोर दिया गया है। दिल्ली सरकार ने फरीदाबाद, गुरुग्राम, नोएडा, सोनीपत और बहादुरगढ़ की पुलिस तथा ट्रैफिक टीमों के साथ मिलकर वाहनों के उत्सर्जन पर निगरानी बढ़ाई है।

धूल नियंत्रण के लिए सड़कों पर पानी का छिड़काव, मैकेनाइज्ड स्वीपिंग और एंटी-स्मॉग गन का इस्तेमाल तेज किया गया है। एनएचएआई ने एक्सप्रेसवे पर 60 वाटर स्प्रिंकलर, 14 एंटी-स्मॉग गन, 23 स्वीपिंग मशीनें और 900 से अधिक कर्मी तैनात किए हैं। निर्माण सामग्री को ढककर रखने और जियो-टैग्ड फोटो के साथ रोजाना रिपोर्टिंग अनिवार्य कर दी गई है।

एआई और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा है। डीपीसीसी का एआई-आधारित कमांड सेंटर रियल-टाइम में वायु गुणवत्ता, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण स्थलों की सीसीटीवी फीड और नागरिक शिकायतों की निगरानी कर रहा है। 13 नए मॉनिटरिंग स्टेशन जोड़कर कुल केंद्रों की संख्या 60 कर दी गई है। आईआईटीएम की एएटीएए लैब रियल-टाइम सोर्स अपॉर्शन्मेंट के जरिए वाहन, सेकेंडरी एयरोसोल और सड़क की धूल जैसे स्रोतों की वैज्ञानिक पहचान कर रही है।

पराली और बायोमास प्रबंधन पर भी ध्यान है। पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है। ईंट-भट्टों और थर्मल पावर प्लांटों में पराली से बनी बायोमास पेलेट्स की को-फायरिंग और कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्रों में पराली का उपयोग अनिवार्य किया गया है। उपग्रह डेटा, ड्रोन और एएनपीआर कैमरों से पराली जलाने पर नजर रखी जा रही है और उल्लंघन पर कार्रवाई हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आपातकालीन ग्रैप पाबंदियों पर निर्भर रहने के बजाय पूरे साल मूल स्रोतों से उत्सर्जन घटाने पर ध्यान देना जरूरी है। इसमें पीएम10 के साथ-साथ पीएम2.5 और गैसीय प्रदूषकों पर भी लक्षित कार्रवाई शामिल होनी चाहिए।

दिल्ली की हवा सात दशक से चेतावनियों और कदमों के बीच घूम रही है। अस्थायी उपायों ने राहत दी है, लेकिन स्थायी सुधार के लिए साल भर के स्रोत-नियंत्रण और क्षेत्रीय समन्वय की जरूरत बनी हुई है। मौजूदा तैयारी उम्मीद जगाती है, लेकिन नतीजे आने वाले हफ्तों में ही स्पष्ट होंगे।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

Sanjana Gupta Hindi Content Writer | New Media Kiran Sanjana Gupta is a Hindi Content Writer at New Media Kiran, creating accurate, engaging, and reader-friendly news and web content for digital platforms. She specializes in well-researched Hindi articles that keep audiences informed and interested.

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