DUSU Election 2026: दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन यानी DUSU चुनाव को लेकर इस बार माहौल विवादों में घिर गया है। चुनाव प्रचार के दौरान डीयू के नॉर्थ कैंपस इलाके में हिंसा की घटनाएं सामने आईं, जिसके बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक जा पहुंचा। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लेते हुए जीत के बाद निकाले जाने वाले जुलूसों पर रोक लगा दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कैंपस में सुरक्षा और अनुशासन को लेकर सवाल उठने लगे थे। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच के सामने इस मामले की सुनवाई हुई, जिसमें कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणियां कीं। भारी पुलिस बल तैनात होने के बावजूद हिंसा की घटनाएं कैसे हुईं, इसे लेकर हाईकोर्ट ने प्रशासन से जवाब तलब किया है। इस पूरे विवाद ने छात्र राजनीति में हो रही अराजकता को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
DUSU Election 2026: हाईकोर्ट ने पुलिस से पूछे तीखे सवाल
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस के रवैये पर सीधे सवाल खड़े किए। कोर्ट ने पूछा कि जब कैंपस और आसपास के इलाकों में भारी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात थे, तो इसके बावजूद हिंसा की घटनाएं कैसे घटित हुईं। बेंच ने साफ शब्दों में कहा कि तस्वीरों में जो कुछ दिखा है, उसे नकारा नहीं जा सकता। कोर्ट के सामने पेश हुई जानकारी के मुताबिक, 10 से 20 गाड़ियों का एक बड़ा काफिला कैंपस के भीतर और आसपास घूमता रहा, जिसे लेकर हाईकोर्ट ने सीधा सवाल किया कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में वाहनों को अनुमति किसने और कैसे दी। अदालत ने यह भी कहा कि अगर पुलिस बल पर्याप्त मात्रा में तैनात था, तो फिर इस तरह की अव्यवस्था को रोकने में नाकामी क्यों हुई। यह सवाल सीधे तौर पर पुलिस प्रशासन की कार्यशैली और निगरानी व्यवस्था पर उंगली उठाता है।
बिना नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को लेकर कोर्ट की नाराजगी
मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया, जिसमें बताया गया कि बिना नंबर प्लेट और बिना उम्मीदवारों के नाम वाली गाड़ियां कैंपस क्षेत्र में बेरोकटोक घूमती रहीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने डीसीपी नॉर्थ से सीधा सवाल किया कि ऐसी गाड़ियों को दिल्ली की सड़कों पर और नॉर्थ कैंपस के भीतर व आसपास आने-जाने की इजाजत कैसे मिली। कोर्ट का कहना था कि यह लापरवाही सिर्फ ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी चूक को दर्शाती है। पहचान छिपाकर घूमने वाले वाहन किसी भी अप्रिय घटना को अंजाम दे सकते थे, और इसी वजह से अदालत ने इसे बेहद गंभीरता से लिया। न्यायपालिका की यह टिप्पणी प्रशासनिक तंत्र की निगरानी क्षमता पर सवाल खड़े करती है।
गाड़ियों की छतों पर खड़े उम्मीदवार, कोर्ट ने बताया गुंडागर्दी

सुनवाई के दौरान एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया, जिसमें उम्मीदवारों के गाड़ियों की छतों और बोनट पर खड़े होने की तस्वीरें कोर्ट के सामने पेश हुईं। हाईकोर्ट ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह का व्यवहार किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है और इसे सीधे तौर पर गुंडागर्दी करार दिया। अदालत ने पूछा कि ऐसे काफिलों को रोकने के लिए प्रशासन की ओर से क्या ठोस कदम उठाए गए, क्योंकि इस तरह की हरकतें आम लोगों और छात्रों के बीच डर, दहशत और दबदबे का माहौल पैदा करती हैं। इसके जवाब में डीसीपी नॉर्थ ने अदालत को बताया कि पुलिस की टीमें लगातार वाहनों की जांच कर रही हैं। हालांकि कोर्ट इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आया और उसने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल बरकरार रखे।
गुरुवार को भी जताई थी हाईकोर्ट ने नाराजगी
यह पहला मौका नहीं है जब दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर नाराजगी जाहिर की हो। इससे पहले गुरुवार को भी दिल्ली यूनिवर्सिटी में चुनाव से पहले हुई हिंसा की घटनाओं पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया था। उस सुनवाई में हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी प्रशासन, दिल्ली पुलिस और सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि हिंसा की घटनाओं के पीछे असल वजह क्या रही और प्रशासन ने इसे रोकने के लिए क्या कार्रवाई की। इसके साथ ही अदालत ने एक सख्त चेतावनी भी जारी की थी कि अगर उठाए गए कदमों से वह संतुष्ट नहीं होता है, तो वोटों की गिनती और चुनाव परिणाम की घोषणा पर भी रोक लगाई जा सकती है। इस चेतावनी से साफ है कि हाईकोर्ट इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से देख रहा है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने रखे तथ्य
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए एडवोकेट प्रशांत मनचंदा ने अदालत को बताया कि डीयू छात्र संघ चुनाव को लेकर कोर्ट ने साल 2025 में ही कुछ अहम दिशा-निर्देश जारी किए थे। उन्होंने कहा कि इस याचिका के अदालत में लंबित रहने के बावजूद बीते बुधवार को कुछ उम्मीदवारों के साथ मिलकर उपद्रवियों ने पूरे डीयू कैंपस क्षेत्र पर कब्जा जैसी स्थिति पैदा कर दी थी। इस दौरान मारपीट की घटनाएं भी हुईं, जिससे कैंपस में माहौल पूरी तरह अशांत हो गया। याचिकाकर्ता के मुताबिक, उपद्रवियों के पास हथियार के तौर पर बंदूकें और पेचकस जैसी वस्तुएं भी मौजूद थीं, जो इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को और बढ़ाती हैं। इन तथ्यों ने अदालत को इस मामले में सख्त रुख अपनाने के लिए प्रेरित किया।
छात्र राजनीति और कैंपस सुरक्षा पर उठे सवाल
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर छात्र राजनीति में हिंसा और दबंगई की प्रवृत्ति को लेकर बहस छेड़ दी है। डीयू जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह की घटनाएं न सिर्फ छात्रों की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि कैंपस के शैक्षणिक माहौल को भी प्रभावित करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक प्रशासन और पुलिस चुनाव प्रचार के दौरान सख्त निगरानी और नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं करेंगे, तब तक ऐसी घटनाओं पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल होगा। दिल्ली हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में होने वाले छात्र संघ चुनावों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट आगे इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या प्रशासन कोर्ट की चिंताओं को दूर करने में कामयाब हो पाता है। जीत जुलूस पर लगी रोक के बाद यह साफ हो गया है कि अदालत इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। पुलिस प्रशासन को अब अपनी कार्यप्रणाली पर आत्ममंथन करना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। छात्र संघ चुनाव जैसे लोकतांत्रिक अभ्यास को शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से संपन्न कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है, और दिल्ली हाईकोर्ट का यह कदम इसी दिशा में एक जरूरी हस्तक्षेप साबित हो सकता है।
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Sanjana Gupta
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