चाईबासा: भारतीय सेना के वीर और पराक्रमी जवान रामाय बिरुली, जिन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ दो ऐतिहासिक युद्धों में शौर्य का परिचय दिया और बिना गोली खाए जिंदा लौटे, उनका दिरीदुलसुनुम रविवार को उनके पैतृक गांव बरकुंडिया में धूमधाम से संपन्न हुआ। इस अवसर पर उनके सगे-संबंधियों, मित्रों और चाहनेवालों ने उनकी कब्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनकी वीरता को नमन किया।
रामाय बिरुली: एक अद्वितीय साहस और पराक्रम की मिसाल
रामाय बिरुली का जन्म 1 जनवरी 1945 को चाईबासा जिले के सदर प्रखंड के बरकुंडिया गांव में हुआ था। उन्होंने भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा की और पाकिस्तान के खिलाफ हुए दो बड़े युद्धों में भाग लिया। महज 26 वर्ष की आयु तक उन्होंने न केवल इन युद्धों में अपने साहस का परिचय दिया, बल्कि अदम्य पराक्रम और वीरता के साथ दुश्मनों को हराया और जिंदा लौटे। उनका ये साहस और वीरता भारतीय सेना के लिए मिसाल बन गया।
रामाय बिरुली के सैन्य कार्यकाल की शुरुआत 18 वर्ष की आयु में 1963 में हुई थी, जब उन्होंने भारतीय सेना जॉइन की थी। उन्होंने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में भाग लिया। इन युद्धों में भारतीय सेना को विजय मिली थी और रामाय बिरुली ने इन संघर्षों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे उस समय बिहार रेजिमेंट का हिस्सा थे, और बिहार रेजिमेंट की सेना में एक प्रतिष्ठित स्थिति थी।
22 वर्षों में 11 गैलेंट्री अवार्ड्स: कर्तव्यनिष्ठता और साहस का प्रतीक
रामाय बिरुली ने अपने सैन्य करियर में कुल 22 वर्षों में 11 गैलेंट्री अवार्ड्स प्राप्त किए, जो उनकी वीरता और कर्तव्यनिष्ठता को प्रमाणित करते हैं। उनके साहस और समर्पण ने उन्हें न केवल युद्धभूमि पर अपितु कई सैन्य ऑपरेशंस में भी सफलता दिलाई। उनकी वीरता के कारण ही भारतीय सेना ने उन्हें बार-बार सम्मानित किया। इन पुरस्कारों में उनकी साहसिकता और पराक्रम का प्रतीक उनके उत्कृष्ट कार्य रहे।
रिटायरमेंट के बाद समाजसेवा में योगदान
रामाय बिरुली के सैन्य करियर का अंत 1985 में हवलदार के पद से रिटायरमेंट के रूप में हुआ। इसके बाद उन्होंने समाजसेवा में भी सक्रिय भागीदारी की और कैनरा बैंक में आर्म्ड गार्ड के रूप में काम किया। इसके अलावा, उनका जीवन उनके परिवार और समाज के प्रति समर्पित था। उनका जीवन संघर्ष और सेवा का प्रतीक था।
रामाय बिरुली का वैवाहिक जीवन कादलबेड़ा गांव की पालो कुई से हुआ था, जिनसे उन्हें तीन संतानें – बीरसिंह बिरुली, सुरा बिरुली और एक बहन हुई।
निधन और श्रद्धांजलि
रामाय बिरुली का निधन 26 फरवरी 2024 को हुआ। उनकी मृत्यु के बाद, उनके परिवार, दोस्तों और समर्पित सैनिकों द्वारा उन्हें याद किया जा रहा है और उनके योगदान को सम्मानित किया जा रहा है। उनका जीवन और उनके युद्धों में दिखाई गई वीरता भारतीय सेना और देशवासियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
रामाय बिरुली का योगदान और साहस, भारतीय सेना की परंपरा और वीरता का प्रतीक है। उनके द्वारा दिखाए गए अदम्य साहस और युद्ध कौशल को हमेशा याद किया जाएगा।

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