Ganesh Chaturthi: मुंबई की गलियों में जब ढोल-ताशों की गूंज शुरू होती है, तो पूरा शहर एक ही नाम की तरफ खिंचा चला जाता है लालबागचा राजा। इसी के साथ प्रभादेवी स्थित सिद्धिविनायक मंदिर में भी भक्तों की भीड़ हर दिन बढ़ती जाती है। 14 सितंबर 2026 को गणेश चतुर्थी के पहले दिन इन दोनों धार्मिक स्थलों पर भक्ति का सैलाब उमड़ पड़ा है। एक तरफ अस्थायी पंडाल है, जो साल के गिने-चुने दिनों के लिए ही सजता है, तो दूसरी तरफ स्थायी मंदिर है, जो बारहों महीने भक्तों के लिए खुला रहता है। दोनों जगहों की अपनी अलग कहानी, अलग परंपरा और अलग मान्यताएं हैं, लेकिन आस्था की डोर एक ही जगह जाकर मिलती है गणपति बाप्पा के चरणों में। आज के दिन लालबागचा राजा का 93वां वर्ष शुरू हुआ है, जबकि सिद्धिविनायक मंदिर में उत्सव की रौनक देखते ही बनती है। इस रिपोर्ट में जानिए इन दोनों स्थलों से जुड़ी हर जरूरी बात।
Ganesh Chaturthi: आज गणेश चतुर्थी पर क्यों बदला हुआ है माहौल

आज का दिन भगवान गणेश के जन्मोत्सव का दिन है और मुंबई में इसी के साथ गणेशोत्सव की औपचारिक शुरुआत हो चुकी है। लालबागचा राजा की प्रतिष्ठापना आज सुबह पांच बजे की गई, जिसके बाद दर्शन का सिलसिला शुरू हो गया। यह पंडाल अपने 93वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, जो अपने आप में इसकी लंबी और गहरी परंपरा को दर्शाता है। दूसरी ओर सिद्धिविनायक मंदिर को भी फूलों और रोशनी से खास तरीके से सजाया गया है, जहां सुबह से ही भक्तों की कतारें लगनी शुरू हो गईं।
सामान्य दिनों की तुलना में आज का नजारा पूरी तरह अलग है। लालबागचा राजा तो सामान्य दिनों में मौजूद ही नहीं होता, यह सिर्फ गणेशोत्सव के दस-ग्यारह दिनों के लिए ही सज-धज कर तैयार होता है। सिद्धिविनायक मंदिर भले ही साल भर खुला रहता हो, लेकिन गणेश चतुर्थी के दौरान यहां आने वाले भक्तों की संख्या सामान्य दिनों से कई गुना अधिक हो जाती है। इसी वजह से आज का दिन शुरुआत का दिन माना जा रहा है स्थापना का दिन, पहली आरती का दिन और पूरे उत्सव के आगाज का दिन।
93 साल पुरानी परंपरा और नवसाचा गणपति की कहानी
लालबागचा राजा को भक्त प्यार से “नवसाचा गणपति” कहते हैं, यानी वह गणपति जो मन्नत पूरी करते हैं। इस परंपरा की जड़ें 1930 के दशक में मिलती हैं, जब लालबाग-परेल का इलाका “गिरनगांव” के नाम से जाना जाता था। उस दौर में यहां कपड़ा मिलों का बोलबाला था और मछुआरे-व्यापारी पेरू चाल के पास खुले बाजार में अपना व्यापार चलाते थे। साल 1932 में यह बाजार अचानक बंद हो गया, जिससे स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी पर गहरा संकट आ गया।
इसी मुश्किल घड़ी में मछुआरों और व्यापारियों ने भगवान गणेश से एक मन्नत मांगी अगर उन्हें स्थायी बाजार मिल जाए, तो वे हर साल सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाएंगे। कुछ ही समय बाद उन्हें जमीन मिल गई और लालबाग मार्केट का निर्माण हुआ। 1934 में इस मन्नत को पूरा करते हुए 12 सितंबर 1934 को पहली बार लालबागचा राजा की स्थापना की गई। उस पहले साल की मूर्ति मछुआरे की पारंपरिक पोशाक में सजाई गई थी, और तभी से यह परंपरा बिना किसी रुकावट के चली आ रही है।
आज भी भक्तों के बीच यह विश्वास गहरा है कि राजा हर मन्नत सुनते हैं। चरण स्पर्श की कतार में घंटों खड़े रहने वाले श्रद्धालु अपने साथ नौकरी, शादी, स्वास्थ्य और व्यापार से जुड़ी अनगिनत इच्छाएं लेकर आते हैं। इलाके में कई सालों से चली आ रही अधूरी मन्नतों के पूरे होने की कहानियां आम हैं, जो किसी कल्पना का हिस्सा नहीं बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती साझा स्मृति है।
दाईं सूंड वाले गणपति और सिद्धिविनायक मंदिर का इतिहास

प्रभादेवी में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण 19 नवंबर 1801 को लक्ष्मण विठू पाटिल और देउबाई पाटिल ने करवाया था। देउबाई संतानहीन थीं और उन्होंने यह मंदिर इसी भावना से बनवाया था कि अन्य निःसंतान महिलाओं को भी संतान सुख का आशीर्वाद मिल सके। मंदिर में विराजमान मूर्ति काले पत्थर से बनी है और इसकी सबसे खास बात यह है कि इसकी सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है, जबकि आमतौर पर गणेश जी की प्रतिमाओं में सूंड बाईं ओर होती है।
दाईं सूंड वाले गणपति को “सिद्धिविनायक” कहा जाता है, यानी सिद्धि प्रदान करने वाले देवता। मान्यता है कि इस स्वरूप के गणपति शक्तिशाली तो होते ही हैं, साथ ही थोड़े कठोर स्वभाव के भी माने जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अगर विधि-विधान से पूजा की जाए तो मनोकामना जल्दी पूरी होती है। मंदिर परिसर में रिद्धि और सिद्धि देवी भी विराजमान हैं, जिनके दर्शन से बाधाएं दूर होने और नई शुरुआत शुभ होने की मान्यता प्रचलित है।
सिनेमा जगत की जानी-मानी हस्तियों से लेकर राजनीति और आम जनजीवन से जुड़े लोग तक, हर वर्ग के श्रद्धालु सिद्धिविनायक मंदिर में शीश झुकाने पहुंचते हैं। कई भक्त तो लगातार 21 मंगलवार दर्शन करने की मन्नत भी लेते हैं, जिसे विशेष फलदायी माना जाता है।
साल भर में कब होती है सबसे ज्यादा भीड़ और महत्व
मंगलवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है, और यही वजह है कि सिद्धिविनायक मंदिर में इस दिन सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती है। मंगलवार के दिन मंदिर सुबह सवा तीन बजे ही खोल दिया जाता है और देर रात तक भक्तों के लिए खुला रहता है। कई श्रद्धालु लगातार इक्कीस मंगलवार का व्रत रखने का संकल्प लेते हैं, जिसे विशेष रूप से फलदायी समझा जाता है।
हर महीने की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है, जिस दिन उपवास रखकर चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। अगर यह तिथि मंगलवार को पड़ जाए तो इसे “अंगारकी संकष्टी” कहा जाता है, और इसे सबसे शक्तिशाली संकष्टी माना जाता है। इन सबके बीच गणेश चतुर्थी का दिन सबसे ऊपर आता है, क्योंकि यह साल का सबसे बड़ा उत्सव है। आज के दिन की गई स्थापना, पूजा और मन्नत को सबसे शुभ माना जाता है।
लालबागचा राजा के लिए तो साल में सिर्फ एक ही मौका होता है गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक का सीमित समय। अनंत चतुर्दशी विसर्जन का दिन है, जो लालबागचा राजा के लिए विदाई का दिन बन जाता है। लालबागचा राजा के लिए पूरा उत्सव ही महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन पहले दिन यानी आज और आखिरी दिन की अहमियत सबसे ज्यादा होती है। वहीं सिद्धिविनायक मंदिर में सामान्य दिनों में सुबह के समय जल्दी पहुंचना ज्यादा सुविधाजनक रहता है।
Ganesh Chaturthi: आज के दिन की खासियत और भक्तों की भावनाएं
आज का दिन इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि यह “प्रथम दर्शन” का दिन है। लालबागचा राजा के लिए यह पहला दिन है, तो सिद्धिविनायक मंदिर में भी उत्सव की शुरुआत का दिन है। भक्तों के बीच यह धारणा गहरी है कि आज मांगी गई मन्नत में ज्यादा ताकत होती है, क्योंकि बाप्पा अभी-अभी विराजमान हुए हैं।
लालबागचा राजा से जुड़ी कहानी सीधे तौर पर रोजी-रोटी और बाजार से जुड़ी है, जो आम मछुआरों और मजदूरों के संघर्ष और उनकी पूरी हुई मन्नत की गवाह है। वहीं सिद्धिविनायक मंदिर की कहानी मातृत्व और सिद्धि से जुड़ी हुई है। दोनों जगहों की आस्था का स्वरूप भले अलग हो, लेकिन दोनों का मूल एक ही है विघ्नहर्ता गणपति के प्रति अटूट श्रद्धा।
आज दोनों ही स्थानों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और कतारें काफी लंबी देखी जा रही हैं। पूरा माहौल पूरी तरह भक्तिमय बना हुआ है। लालबागचा राजा में चरण स्पर्श और मुख दर्शन के लिए अलग-अलग कतारें बनाई गई हैं, ताकि भीड़ को व्यवस्थित तरीके से संभाला जा सके। सिद्धिविनायक मंदिर में सामान्य दर्शन के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता, हालांकि भीड़ ज्यादा होने के कारण दर्शन में समय जरूर लग सकता है। जो भक्त सीधे मौके पर नहीं पहुंच पा रहे, उनके लिए दोनों ही जगहों पर ऑनलाइन लाइव दर्शन की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।
दो अलग परंपराएं, एक साझा आस्था
लालबागचा राजा और सिद्धिविनायक मंदिर को महज एक पंडाल या मंदिर के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। ये दोनों स्थान मुंबई की साझा सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा बन चुके हैं। एक जगह साल भर के लिए खुली रहती है, तो दूसरी सिर्फ कुछ दिनों के लिए सजती है, लेकिन भक्तों का समर्पण दोनों जगह समान रूप से देखने को मिलता है। जब आज पूरे शहर में “गणपति बाप्पा मोरया” के जयकारे गूंज रहे हैं, तब यह याद रखना जरूरी है कि ये दोनों ही स्थल आम लोगों की मेहनत और आस्था से खड़े हुए हैं।
जो श्रद्धालु आज दर्शन के लिए जा रहे हैं, उनके लिए धैर्य बनाए रखना और कतार का सम्मान करना सबसे जरूरी सलाह है। शुद्ध मन से मांगी गई मन्नत ही असल मायने रखती है, बाकी सब आडंबर है।
गणेश चतुर्थी का यह पहला दिन मुंबई के लिए सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि शहर की पहचान और सामूहिक आस्था का प्रतीक बन चुका है। लालबागचा राजा जहां संघर्ष से उपजी परंपरा की कहानी कहता है, वहीं सिद्धिविनायक मंदिर मातृत्व और सिद्धि की भावना को जीवंत रखता है। दोनों स्थानों पर उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सदियों बाद भी आस्था का यह सिलसिला कमजोर नहीं पड़ा है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे उत्सव आगे बढ़ेगा, भक्तों का यह सैलाब और बढ़ने की उम्मीद है, और अनंत चतुर्दशी तक यह भक्ति भाव पूरे शहर में बना रहेगा।
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Sanjana Gupta
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