New Delhi। भारत का ऑटोमोबाइल बाजार तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। लंबे समय तक पेट्रोल और डीजल वाहनों का दबदबा रहा, लेकिन अब ग्राहक अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से सीएनजी, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर भी तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में पिछले एक साल के दौरान उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है।
बदलती तस्वीर को सिर्फ इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री से नहीं समझा जा सकता। दोपहिया और तिपहिया वाहनों में भी इलेक्ट्रिक विकल्प तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। वहीं, सीएनजी और हाइब्रिड वाहन भी ग्राहकों के लिए आकर्षक विकल्प बनते जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आने वाले वर्षों में पेट्रोल वाहनों का दबदबा खत्म हो जाएगा?

इलेक्ट्रिक कारों की मांग में बड़ा उछाल
वाहन पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून 2026 के दौरान देश में 82,737 इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों का पंजीकरण हुआ। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 43,710 था। यानी एक साल में इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों के पंजीकरण में 89 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई।
इस बाजार में टाटा मोटर्स सबसे आगे रही। अप्रैल-जून 2026 के दौरान कंपनी के 32,283 इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों का पंजीकरण हुआ, जबकि पिछले साल यह संख्या 15,794 थी।
महिंद्रा के इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों का पंजीकरण भी 10,144 से बढ़कर 20,112 हो गया। वहीं जेएसडब्ल्यू एमजी के 16,502 इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों का पंजीकरण हुआ।

जुलाई में ईवी बिक्री ने बनाया नया रिकॉर्ड
इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती रफ्तार जुलाई में भी जारी रही। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के अनुसार, जुलाई 2026 में देश में कुल 3,27,901 इलेक्ट्रिक वाहनों की रिटेल बिक्री हुई। यह किसी एक महीने में इलेक्ट्रिक वाहनों का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा बताया गया।
कुल वाहन रिटेल में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी करीब 12.7 फीसदी रही, जबकि जुलाई 2025 में यह 9.6 फीसदी थी।
दोपहिया वाहनों में भी ईवी की हिस्सेदारी जुलाई 2026 में बढ़कर 11.24 फीसदी हो गई, जो एक साल पहले 7.65 फीसदी थी। सबसे बड़ा बदलाव तिपहिया वाहनों में दिखाई दिया, जहां इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 65.08 फीसदी तक पहुंच गई।

पेट्रोल से कम होता जा रहा अंतर
भारत के वाहन बाजार में पेट्रोल अभी भी सबसे बड़ा ईंधन विकल्प है, लेकिन अंतर तेजी से कम हो रहा है।
जुलाई 2026 में कुल वाहन रिटेल के ईंधन मिश्रण में पेट्रोल/एथेनॉल की हिस्सेदारी 41.68 फीसदी रही। सीएनजी/एलपीजी की हिस्सेदारी 24.67 फीसदी, डीजल की 17.73 फीसदी, हाइब्रिड की 8.02 फीसदी और ईवी की 7.90 फीसदी रही।
दिलचस्प बात यह है कि जुलाई 2026 में सीएनजी/एलपीजी, हाइब्रिड और ईवी को मिलाकर हिस्सेदारी 40.59 फीसदी हो गई। यानी पेट्रोल/एथेनॉल और इन तीन विकल्पों के बीच अंतर सिर्फ 1.09 प्रतिशत अंक रह गया।
जुलाई 2025 में यह अंतर 13.21 प्रतिशत अंक था। इसका मतलब है कि सिर्फ एक साल में भारतीय वाहन बाजार में ग्राहकों की पसंद में बड़ा बदलाव आया है।

हाइब्रिड भी बन रहा मजबूत विकल्प
पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने को लेकर अभी भी कुछ ग्राहकों के मन में चार्जिंग और लंबी दूरी जैसी चिंताएं हैं। ऐसे में हाइब्रिड वाहन उनके लिए बीच का रास्ता बनकर सामने आ रहे हैं।
हाइब्रिड वाहन में पेट्रोल इंजन के साथ इलेक्ट्रिक मोटर का इस्तेमाल होता है। इससे ईंधन की खपत कम करने में मदद मिल सकती है, जबकि ग्राहक को चार्जिंग नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता।
जुलाई 2025 में कुल वाहन रिटेल में हाइब्रिड की हिस्सेदारी 7.89 फीसदी थी, जो जुलाई 2026 में बढ़कर 8.02 फीसदी हो गई।

पेट्रोल की बढ़ती कीमत भी बड़ा कारण
ग्राहकों की पसंद बदलने की एक बड़ी वजह ईंधन खर्च भी है। दिल्ली में 2026 की शुरुआत में पेट्रोल की कीमत 94.77 रुपये प्रति लीटर थी। मई में यह बढ़कर 102.12 रुपये प्रति लीटर हो गई और इसके बाद जून, जुलाई और अगस्त में भी इसी स्तर पर बनी रही।
सितंबर 2025 में दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये प्रति लीटर था। इस लिहाज से एक साल में पेट्रोल की कीमत में करीब 7.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
जब ईंधन का खर्च बढ़ता है तो ग्राहक वाहन खरीदते समय सिर्फ गाड़ी की कीमत नहीं, बल्कि उसके लंबे समय के रनिंग कॉस्ट पर भी ध्यान देने लगते हैं।

सीएनजी क्यों बनी पसंद?
सीएनजी की कीमतों में भी हाल में बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली में सीएनजी की कीमत 29 अगस्त के बाद 83.09 रुपये से बढ़कर 86.98 रुपये प्रति किलो हो गई।
फिर भी पेट्रोल की तुलना में प्रति किलोमीटर कम खर्च सीएनजी को आकर्षक बनाता है।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई पेट्रोल कार 15 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती है तो 102.12 रुपये प्रति लीटर की दर से उसका ईंधन खर्च करीब 6.81 रुपये प्रति किलोमीटर होगा। वहीं 20 किलोमीटर प्रति किलो का माइलेज देने वाली सीएनजी कार में 86.98 रुपये प्रति किलो की दर से खर्च करीब 4.35 रुपये प्रति किलोमीटर बैठता है।
हालांकि वास्तविक खर्च वाहन के मॉडल, माइलेज, ट्रैफिक और ड्राइविंग स्टाइल पर निर्भर करेगा।

ई20 को लेकर भी चर्चा
पेट्रोल वाहनों से जुड़े बदलावों में ई20 भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। ई20 पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रण को दर्शाता है। इसका उद्देश्य पेट्रोल में आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और इथेनॉल के उपयोग को बढ़ाना है।
हालांकि, कुछ वाहन मालिकों ने ई20 के इस्तेमाल को लेकर माइलेज और वाहन के कुछ हिस्सों पर असर जैसी चिंताएं जताई हैं। खासतौर पर पुराने वाहनों को लेकर यह सवाल अधिक उठता है कि वे ई20 के लिए कितने अनुकूल हैं।
सरकार के अनुसार कुछ वाहनों में ई20 के कारण माइलेज में 2 से 6 फीसदी तक कमी हो सकती है। इसका असर वाहन के डिजाइन और इंजन तकनीक पर निर्भर करता है।

सीएनजी नेटवर्क भी हो रहा मजबूत
वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने में इंफ्रास्ट्रक्चर की अहम भूमिका है। सरकार के मुताबिक देश के 307 भौगोलिक क्षेत्रों में सिटी गैस वितरण नेटवर्क के विकास के लिए संस्थाओं को अधिकृत किया गया है। ये क्षेत्र करीब 733 जिलों और 34 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को कवर करते हैं।
सरकार ने 2032 तक देशभर में 18,336 सीएनजी स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। नेटवर्क के विस्तार से सीएनजी वाहनों को अपनाने में मदद मिल सकती है।

ईवी को बढ़ावा देने में सरकारी नीतियों की भूमिका
इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती बिक्री में सरकारी नीतियों की भी अहम भूमिका है। फेम-2 योजना के तहत करीब 16.72 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों को समर्थन मिला।
इसके बाद सरकार ने पीएम ई-ड्राइव योजना शुरू की। 10,900 करोड़ रुपये की इस योजना के तहत करीब 28.30 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देने का प्रावधान है।
इलेक्ट्रिक वाहनों और उनके चार्जर पर जीएसटी 5 फीसदी रखा गया है। राज्यों को ईवी पर रोड टैक्स में छूट देने की सलाह भी दी गई है।
7 अगस्त 2026 तक देश में 67,657 ईवी चार्जर स्थापित किए जाने की जानकारी दी गई है।

क्या पेट्रोल गाड़ियों का दौर खत्म होने वाला है?
आंकड़े बताते हैं कि पेट्रोल का दबदबा निश्चित रूप से कमजोर हो रहा है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पेट्रोल वाहनों का दौर खत्म होने वाला है।
वित्त वर्ष 2019-20 में वाहन पोर्टल पर इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी सिर्फ 0.71 फीसदी थी, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 8.26 फीसदी हो गई। 26 जुलाई 2026 तक वाहन पोर्टल पर सभी श्रेणियों को मिलाकर 1 करोड़ से अधिक इलेक्ट्रिक वाहन दर्ज थे।
इससे साफ है कि भारत में ऑटोमोबाइल बाजार अब एक ही ईंधन पर निर्भर नहीं रह गया है। पेट्रोल और डीजल के साथ सीएनजी, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहन समानांतर रूप से बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं।
आने वाले वर्षों में मुकाबला सिर्फ पेट्रोल बनाम इलेक्ट्रिक का नहीं होगा। ग्राहक कीमत, माइलेज, रनिंग कॉस्ट, चार्जिंग या फ्यूल नेटवर्क, मेंटेनेंस और अपनी रोजमर्रा की जरूरत के आधार पर विकल्प चुनेंगे।
इसलिए पेट्रोल गाड़ियों का दबदबा खत्म होने के बजाय भारतीय ऑटो बाजार एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां कई तरह के ईंधन और पावरट्रेन एक साथ मौजूद होंगे। हालांकि इलेक्ट्रिक और अन्य वैकल्पिक विकल्पों की मौजूदा रफ्तार यह संकेत जरूर दे रही है कि पेट्रोल की बादशाहत पहले जैसी नहीं रहने वाली।

