Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम उपचुनाव से ठीक पहले चुनाव चिह्न को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। घास व जोड़ाफूल चिह्न के फ्रीज होने के बाद रीतब्रत बनर्जी खेमे को चुनाव आयोग ने नया नाम डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस और लिफाफा चुनाव चिह्न आवंटित किया है, लेकिन यही लिफाफा चिह्न अब विवाद की जड़ बन गया है। इंडियन सेक्युलर फ्रंट यानी ISF ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए दावा किया है कि यह चिह्न 2021 से उसका है और वह लगातार इसी सिंबल पर चुनाव लड़ती आई है। पार्टी के एकमात्र विधायक नौशाद सिद्दीकी ने इस मामले को लेकर चुनाव आयोग को पत्र भेजकर कानूनी चुनौती देने की बात कही है। दूसरी ओर, रीतब्रत खेमे के नंदीग्राम प्रत्याशी मोहम्मद एतेशामुल हक ने नया चिह्न मिलने पर खुशी जताई है और इसी सिंबल के साथ प्रचार शुरू करने का ऐलान किया है। इस विवाद ने नंदीग्राम उपचुनाव से पहले बंगाल की सियासत को एक नया मोड़ दे दिया है।
Bengal Politics: क्या है पूरा मामला, कैसे शुरू हुआ विवाद
बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुई टूट के बाद रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे को पार्टी का पुराना चुनाव चिह्न घास व जोड़ाफूल इस्तेमाल करने से रोक दिया गया, क्योंकि चुनाव आयोग ने इसे फ्रीज कर दिया था। इसके बाद आयोग ने इस खेमे को नया राजनीतिक पहचान देते हुए डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम और लिफाफा चुनाव चिह्न सौंपा। यह आवंटन होते ही इंडियन सेक्युलर फ्रंट की ओर से तुरंत आपत्ति दर्ज कराई गई, क्योंकि पार्टी का दावा है कि लिफाफा चिह्न पहले से ही उसकी पहचान से जुड़ा हुआ है। इस तरह चुनाव आयोग के एक फैसले ने दो अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच सीधा टकराव खड़ा कर दिया है, जो अब कानूनी रास्ते की ओर बढ़ता दिख रहा है।
नौशाद सिद्दीकी ने उठाए तीखे सवाल
आइएसएफ के एकमात्र विधायक नौशाद सिद्दीकी ने शुक्रवार को पत्रकार सम्मेलन के दौरान इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी ने 10 मार्च 2026 को लिफाफा चुनाव चिह्न का विधिवत नवीनीकरण कराया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह चिह्न आइएसएफ के इस्तेमाल में पहले से मौजूद रहा है। सिद्दीकी ने सवाल उठाया कि जब यह सिंबल पहले से ही उनकी पार्टी के पास दर्ज है, तो फिर रीतब्रत खेमे को यही चिह्न किस आधार पर आवंटित कर दिया गया। उनके अनुसार, 2021 से ही आइएसएफ लगातार इसी चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ती आई है, इसलिए यह आवंटन नियमों के अनुरूप नहीं लगता।
आइएसएफ ने चुनाव आयोग को भेजा कानूनी पत्र
अपनी आपत्ति को औपचारिक रूप देते हुए आइएसएफ ने चुनाव आयोग को पत्र भेजकर इस आवंटन को कानूनी तौर पर चुनौती देने की बात कही है। नौशाद सिद्दीकी ने साफ किया कि पार्टी इस मुद्दे को यूं ही जाने नहीं देगी और जरूरत पड़ने पर आगे भी कानूनी विकल्प अपनाए जाएंगे। इस कदम से यह संकेत मिलता है कि नंदीग्राम उपचुनाव से पहले यह विवाद और गहरा सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने दावे पर अड़े हुए हैं। चुनाव चिह्न से जुड़ा यह मसला अब सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं रहा, बल्कि इसने सीधे तौर पर चुनावी रणनीति और पहचान की लड़ाई का रूप ले लिया है।
साजिश का आरोप भी लगाया गया
नौशाद सिद्दीकी ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ी साजिश होने का आरोप भी लगाया। उनका कहना था कि आइएसएफ को कमजोर करने के मकसद से जानबूझकर ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है, ताकि पार्टी की चुनावी पहचान पर असर पड़े। हालांकि यह उनका राजनीतिक आरोप है और इसकी अभी तक स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिए विभिन्न तरीकों का सहारा लिया जा रहा है। इस तरह का बयान बताता है कि यह विवाद अब सिर्फ दो छोटे दलों के बीच सीमित न रहकर व्यापक राजनीतिक रंग लेता जा रहा है।
आइएसएफ का सियासी सफर और उसकी पहचान
इंडियन सेक्युलर फ्रंट का गठन 21 फरवरी 2021 को फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की देखरेख में हुआ था, जिसके बाद पार्टी की बागडोर उनके भाई नौशाद सिद्दीकी के हाथों में आ गई। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को सीमित सफलता मिली और केवल नौशाद सिद्दीकी ही भांगड़ सीट से जीत दर्ज कर सके थे। 2026 के विधानसभा चुनाव में भी नौशाद ही आइएसएफ के इकलौते विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचे। इन दोनों चुनावों में पार्टी लिफाफा चिह्न पर ही मैदान में उतरी थी, यही वजह है कि पार्टी इस सिंबल को अपनी राजनीतिक पहचान से जोड़कर देखती है और इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।
रीतब्रत खेमे के प्रत्याशी ने जताई खुशी
इस पूरे विवाद के बीच रीतब्रत बनर्जी खेमे की तरफ से नंदीग्राम उपचुनाव के प्रत्याशी मोहम्मद एतेशामुल हक ने नया चुनाव चिह्न मिलने पर संतोष जताया है। शुक्रवार को उन्होंने कहा कि उन्हें लिफाफा चुनाव चिह्न मिलने की खुशी है और वे इसी पहचान के साथ नंदीग्राम में अपना चुनाव प्रचार आगे बढ़ाएंगे। एतेशामुल हक के इस बयान से साफ है कि रीतब्रत खेमा इस विवाद को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं है और चुनाव आयोग के फैसले को अपने पक्ष में मानते हुए आगे बढ़ने की तैयारी में जुटा है। इससे नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान भी यह मुद्दा लगातार सुर्खियों में बना रह सकता है।
नंदीग्राम उपचुनाव पर क्या पड़ सकता है असर
नंदीग्राम सीट पश्चिम बंगाल की राजनीति में हमेशा से ही खास अहमियत रखती रही है, और ऐसे में चुनाव चिह्न को लेकर उठा यह विवाद उपचुनाव के माहौल को प्रभावित कर सकता है। अगर आइएसएफ की कानूनी चुनौती पर चुनाव आयोग जल्द फैसला नहीं लेता, तो यह मामला मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति भी पैदा कर सकता है। दोनों पक्षों के बीच खींचतान बढ़ने से यह भी देखना दिलचस्प होगा कि आयोग इस विवाद को किस तरह सुलझाता है और क्या नंदीग्राम में मतदान से पहले इस पर कोई स्पष्ट निर्णय आ पाता है। फिलहाल स्थिति यह है कि दोनों दल अपने-अपने तर्कों के साथ मैदान में डटे हुए हैं।
नंदीग्राम उपचुनाव से पहले लिफाफा चुनाव चिह्न को लेकर छिड़ा यह विवाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ता नजर आ रहा है। आइएसएफ के नौशाद सिद्दीकी जहां इसे अपनी पुरानी पहचान बताते हुए कानूनी लड़ाई की तैयारी में हैं, वहीं रीतब्रत खेमा इसे अपने नए राजनीतिक सफर की शुरुआत मानकर आगे बढ़ रहा है। चुनाव आयोग के सामने अब यह चुनौती है कि वह इस विवाद को समय रहते सुलझाए, ताकि नंदीग्राम में निष्पक्ष और स्पष्ट चुनावी माहौल बना रहे। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी सियासी हलचल देखने को मिल सकती है।
Read More Here:-
Tirupati Laddu Ghee Scam 2026: ED के हाथ लगा बड़ा सुराग, कंपनी मालिक कैलाश चंद मंगला गिरफ्तार
UPI Payment: मध्य प्रदेश पेट्रोल पंप, 16 अक्टूबर से 2000 रुपये से ज्यादा यूपीआई बंद करने का ऐलान
UP News: मेरठ नीला ड्रम हत्याकांड, 30 सितंबर को आएगा फैसला, मुस्कान और साहिल जेल में
Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
Sanjana Gupta is a Hindi Content Writer at New Media Kiran, creating accurate, engaging, and reader-friendly news and web content for digital platforms. She specializes in well-researched Hindi articles that keep audiences informed and interested.

