Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि 2026 नजदीक है। कोलकाता के साथ बिहार झारखंड ओडिशा और देश के कई हिस्सों में पंडाल सजने लगते हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा इन्हीं दिनों घर और सार्वजनिक पंडाल का केंद्र बनती है। नवरात्रि के नौ दिन देवी के नौ स्वरूपों की पूजा के लिए विशेष माने जाते हैं। उदय तिथि के अनुसार 11 अक्टूबर को नवरात्रि का पहला दिन होगा। उस दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी।
इसी तैयारी के बीच एक सवाल बार बार उठता है। दुर्गा पूजा की मूर्ति में मां की आंखें सबसे आखिर में क्यों बनाई जाती हैं। बंगाल में इस अंतिम चरण को चक्षुदान कहा जाता है। अर्थ है प्रतिमा की आंखों को अंतिम रूप देना। धार्मिक भावना में आंखों को स्वरूप का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है क्योंकि वे प्रतिमा के भाव और अभिव्यक्ति को जीवंत दिखाती हैं।
रांची के मूर्तिकार प्रदीप पाल बताते हैं कि चेहरा तैयार करने के बाद सबसे अंत में आंखों की बारीक चित्रकारी होती है। रेखाएं और भाव सही बनाने के लिए विशेष कौशल चाहिए। पारंपरिक रूप से यह काम वे खुद करते हैं या अनुभवी कलाकारों के साथ मिलकर करते हैं। यह कला का अंतिम स्पर्श है और भक्तों के लिए भावनात्मक क्षण भी बन जाता है।
चक्षुदान क्या है और यह परंपरा कहां प्रचलित है?
चक्षुदान बंगाल की उस रीति का नाम है जिसमें दुर्गा प्रतिमा की आंखें बनाने का काम सबसे बाद रखा जाता है। शरीर मुकुट हाथ अस्त्र और चेहरे की बड़ी बनावट पहले पूरी हो चुकी होती है। आंखें अंत में आती हैं। कई परिवार और पंडाल समितियां इस चरण को अलग महत्व देती हैं।
शारदीय नवरात्रि 2026 में यही दृश्य फिर दिखेगा। पूर्वी भारत के पंडालों में मिट्टी की बड़ी प्रतिमाएं बनती हैं। कलाकार हफ्तों मेहनत करते हैं। आंखें जब पूरी होती हैं तब प्रतिमा भक्त की नजर में और करीब लगने लगती है। यह अनुभव आस्था से जुड़ा है मापी जा सकने वाली घटना नहीं।
बंगाल में चक्षुदान को महालया से जोड़ने की लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। महालया पितृपक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत से जुड़ा दिन माना जाता है। कई लोग उसी समय या उसके आसपास आंखें पूरी करने को शुभ समझते हैं। हर कार्यशाला एक ही घड़ी नहीं अपनाती। स्थानीय कलाकार अपनी सुविधा और समिति के कार्यक्रम के अनुसार समय तय करते हैं।
बिहार झारखंड और ओडिशा में भी दुर्गा प्रतिमा बनाने वाले कई कारीगर बंगाल वाली शैली से प्रभावित हैं। आंखें अंत में बनाना वहां भी दिखता है। नाम हर जगह चक्षुदान न हो फिर भी क्रम अक्सर वही रहता है। चेहरा पहले आंखें बाद में।
मां दुर्गा की आंखें सबसे अंत में क्यों बनाई जाती हैं?
कला की दृष्टि से आंखें चेहरे का सबसे नाजुक हिस्सा हैं। थोड़ी सी रेखा बदलते ही भाव बदल जाता है। क्रोध करुणा और शक्ति का फर्क पलक और दृष्टि की बनावट पर टिका रहता है। इसलिए अनुभवी हाथ अंत में इस काम को लेते हैं। कच्चा चेहरा पहले संभाल लिया जाता है ताकि अंतिम स्पर्श पर एकाग्रता बनी रहे।
प्रदीप पाल का कहना है कि चेहरा तैयार होने के बाद आंखों की बारीकी से चित्रकारी करनी होती है। सही भाव के लिए विशेष कौशल चाहिए। वे यह चरण स्वयं करते हैं या अनुभवी साथियों के साथ करते हैं। यानी यह काम नौसिखिए के प्रयोग के लिए नहीं छोड़ा जाता। परंपरा में जिम्मेदारी वरिष्ठ कलाकार पर रहती है।
धार्मिक भावना में आंखों को जीवंत अभिव्यक्ति से जोड़ा जाता है। भारतीय कला और पूजा परंपरा में आंखें भाव करुणा शक्ति और चेतना का प्रतीक मानी जाती रही हैं। देवी की प्रतिमा में इन्हें इसलिए सावधानी से बनाया जाता है। चक्षुदान सिर्फ रंग भरना नहीं कलाकार की श्रद्धा और सालों पुरानी रीति का हिस्सा बताया जाता है।
जब आंखें पूरी हो जाती हैं तब भक्तों के लिए वह क्षण भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से खास बन जाता है। लोग प्रतिमा की ओर ऐसे देखते हैं जैसे अब देवी उनसे मिल रही हों। यह अनुभव आस्था का है। इसे प्रयोगशाला में तौलने की कोशिश स्रोत ने उचित नहीं माना।
क्या आंखें बनते ही प्रतिमा में दिव्यता आ जाती है?
बंगाल में चक्षुदान से जुड़ी कई लोक धारणाएं हैं। कुछ लोग आंखें पूरी होते ही प्रतिमा को देवी स्वरूप मानने लगते हैं। स्रोत साफ कहता है कि यह कहना उचित नहीं होगा कि आंखें बनते ही धार्मिक मान्यता में प्रतिमा को देवी के स्वरूप के रूप में देखा जाता है या उसमें कोई वैज्ञानिक रूप से मापी जाने वाली ऊर्जा आ जाती है।
कई हिंदू पूजा परंपराओं में मूर्ति को पूजा योग्य बनाने के लिए प्राण प्रतिष्ठा सहित निर्धारित अनुष्ठानों का महत्व माना जाता है। हिंदू परंपरा में मूर्ति को पूजा योग्य बनाने के लिए निर्धारित विधि विधान बताया गया है। यानी केवल आंखें बन जाना पूरे पूजा विधान की जगह नहीं लेता।
यह फर्क पाठक के लिए जरूरी है। कला का अंतिम चरण और शास्त्रीय प्राण प्रतिष्ठा दो अलग परतें हैं। पहली परत कार्यशाला में पूरी होती है। दूसरी परत पंडाल या मंदिर में विधि के साथ जुड़ती है। दोनों को एक ही पल मान लेना स्रोत की चेतावनी के खिलाफ होगा।
भक्त की भावना फिर भी आंखों वाले क्षण से बंधी रहती है। आंखें लगते ही चेहरा बोलता हुआ लगता है। यही कारण है कि तस्वीरें और भीड़ उसी समय बढ़ जाती हैं। भावना को सम्मान देना और वैज्ञानिक दावा न जोड़ना दोनों साथ चल सकते हैं।
शारदीय नवरात्रि 2026 में यह परंपरा क्यों चर्चा में रहती है?
11 अक्टूबर को नवरात्रि का पहला दिन उदय तिथि के अनुसार माना गया है। शैलपुत्री की पूजा उसी दिन जुड़ी है। उसके पहले पंडालों में प्रतिमाएं सजाई जाती हैं। चक्षुदान अक्सर इसी तैयारी के अंतिम पड़ाव पर आता है। इसलिए शारदीय नवरात्रि 2026 की खबरों में आंखों वाला सवाल naturally उठता है।
कोलकाता की पहचान दुर्गा पूजा से जुड़ी है। बिहार झारखंड ओडिशा में भी पंडाल संस्कृति मजबूत है। एक ही देवी अलग शहरों में अलग आकार की प्रतिमाओं में विराजती हैं। आंखों का क्रम फिर भी बहुत जगह एक जैसा रहता है। पाठक जानना चाहते हैं कि कारीगर जानबूझकर आंखें क्यों बचाकर रखते हैं। उत्तर कौशल श्रद्धा और भाव दोनों में छिपा है।
नवरात्रि के नौ दिन नौ स्वरूपों की पूजा से जुड़े हैं। प्रतिमा उन दिनों का केंद्र होती है। अगर आंखें अधूरी लगें तो भक्त को स्वरूप अधूरा महसूस हो सकता है। इसलिए कलाकार अंत में उसी हिस्से को पूरा करते हैं जिससे पूरा चेहरा एक साथ खिले। यह व्यावहारिक कारण भी है धार्मिक व्याख्या भी।
परिवार घर की छोटी प्रतिमा पर भी इसी भावना से आंखें लगाते हैं। सार्वजनिक पंडाल की बड़ी मूर्ति पर वही काम अधिक दिखाई देता है। पैमाना बदलता है रीति की जड़ नहीं बदलती।
भक्तों और कलाकारों के लिए इस क्षण का क्या मतलब है?
कलाकार के लिए चक्षुदान साल भर की साधना का अंतिम हस्ताक्षर है। महीनों मिट्टी रंग और सजावट के बाद आंखें तय करती हैं कि प्रतिमा कितनी बोलती है। गलती यहां महंगी पड़ती है क्योंकि चेहरा पहले से पूरा दिख रहा होता है। इसलिए अनुभवी हाथ बुलाए जाते हैं।
भक्त के लिए यह क्षण दर्शन की तैयारी है। आंखें लगते ही वे देवी से नजर मिलाने का अनुभव लेते हैं। स्रोत के अनुसार यह भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से खास क्षण बन जाता है। भीड़ का शोर उस समय भी श्रद्धा में बदल जाता है।
पूजा बाद में प्राण प्रतिष्ठा और निर्धारित विधि से आगे बढ़ती है। आंखें उस यात्रा का दृश्य द्वार हैं पूरा विधान नहीं। शारदीय नवरात्रि 2026 में पंडाल जाते समय यही समझ काम आएगी। प्रतिमा की कला देखें आस्था रखें और लोक मान्यता को वैज्ञानिक चमत्कार न बनाएं।
दुर्गा प्रतिमा की आंखें अंत में इसलिए बनती हैं कि भाव सबसे नाजुक काम है। बंगाल इसे चक्षुदान कहता है। रांची जैसे शहरों के मूर्तिकार भी चेहरे के बाद आंखें पूरी करते हैं। महालया से जोड़ने की मान्यताएं हैं। ऊर्जा मापने का दावा उचित नहीं। विधि विधान अलग रहता है। आंखें कला और भक्ति दोनों का मिलन बिंदु बनती हैं।
News Desk Declaration / Disclaimer
घोषणा: इस खबर में दी गई पूजा तिथि, मुहूर्त और धार्मिक नियम पंचांग एवं प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। पूजा के मुहूर्त में शहर और स्थान के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। पाठकों से अनुरोध है कि पूजा-अनुष्ठान से जुड़ी किसी भी विशेष जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य से पुष्टि करें। News Media Kiran किसी धार्मिक मान्यता को व्यक्तिगत या वैज्ञानिक सलाह के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।
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