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West Bengal Politics: जादवपुर यूनिवर्सिटी ने मिटाई विवादित ग्रैफिटी, सीएम शुभेंदु अधिकारी की चेतावनी के अगले ही दिन चला सफाई अभियान

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जादवपुर यूनिवर्सिटी के कैंपस को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सख्त चेतावनी के महज एक दिन बाद ही यूनिवर्सिटी प्रशासन हरकत में आ गया, और शनिवार को कैंपस की दीवारों पर बनी कई विवादित पेंटिंग और नारों पर सफेदी करा दी गई। सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या लिखा था दीवारों पर, जिसने राज्य के मुखिया को खुद मैदान में उतरने पर मजबूर कर दिया।

मामला सिर्फ एक-दो नारों तक सीमित नहीं था। यूनिवर्सिटी के जनरल मेंटेनेंस विभाग को इस सफाई अभियान में पूरे छह घंटे लगे, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैंपस की दीवारों पर कितना कुछ लिखा और बनाया गया था।

West Bengal Politics: शुक्रवार को दी थी चेतावनी, शनिवार को शुरू हुआ सफाई अभियान

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को जादवपुर यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 2 से करीब 200 मीटर दूर एक सभा को संबोधित किया था। इस दौरान उन्होंने कैंपस में लगे कुछ नारों को लेकर छात्रों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने “या तो वे या हम” वाले लहजे में साफ चेतावनी दी थी, जिसके बाद प्रशासन के पास ज्यादा वक्त नहीं बचा था।

देखने पर लगता है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने बिना किसी देरी के इस चेतावनी को गंभीरता से लिया। अगले ही दिन शनिवार को सफाई का काम शुरू करा दिया गया, और इसके लिए एक कॉन्ट्रैक्टर को जिम्मेदारी सौंपी गई।

चार्ली चैपलिन का म्यूरल और नाजी सैल्यूट भी हटाई गई

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सफाई अभियान में सिर्फ राजनीतिक नारे ही नहीं, बल्कि चार्ली चैपलिन का एक म्यूरल भी मिटाया गया। इस म्यूरल पर लिखा था, “फासीवाद पर बहस नहीं की जाती, इसे कुचल दिया जाता है।” इसके साथ ही नाजी सैल्यूट को दर्शाती ग्रैफिटी भी हटाई गई, जिन पर “लाल रंग से फासीवाद को खत्म करो” जैसे नारे लिखे थे।

इसी सफाई अभियान में “कॉमरेड किशनजी जिंदाबाद” लिखा नारा भी मिटा दिया गया। यहीं से मामला सबसे ज्यादा राजनीतिक रंग लेता नजर आता है, क्योंकि किशनजी का नाम आते ही यह पूरा प्रकरण एक अलग ही मोड़ ले लेता है।

आखिर कौन था किशनजी, जिसने मचाया इतना बवाल

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने भाषण में सीधे तौर पर पूछा कि जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों की किशनजी को रेड सैल्यूट लिखने की हिम्मत कैसे हुई। उन्होंने कहा, “क्या आप इतने बेताब हैं? किशनजी कौन है? वही, जिसने भारत के संविधान को जलाया था। वह चुनाव का बहिष्कार करने का आह्वान करता था। आप इस किशनजी को रेड सैल्यूट देंगे?”

बता दें कि किशनजी एक बड़ा माओवादी नेता था, जिसे साल 2011 में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया था। जाहिर है, एक कैंपस की दीवार पर उसका नाम रेड सैल्यूट के साथ लिखा जाना मुख्यमंत्री को बर्दाश्त नहीं हुआ, और यही बात इस पूरे विवाद की जड़ बन गई।

ओपन-एयर थिएटर की दीवारें भी नहीं बचीं

सफाई अभियान सिर्फ मुख्य कैंपस तक सीमित नहीं रहा। ओपन-एयर थिएटर की दीवारों पर लिखी कुछ बेहद तीखी बातें भी इस दौरान मिटा दी गईं। इनमें एक लाइन थी, “फासीवादी लोकतंत्र के लायक नहीं हैं, वे सिर में गोली खाने के लायक हैं।” यह वाक्य अपने आप में इतना उग्र था कि इसे लेकर प्रशासन के पास बचाव का कोई खास तर्क नहीं बचा था।

इसके अलावा शरजील इमाम की तस्वीर के साथ लिखा नारा, “चक्का जाम समाधान है, देशद्रोह नहीं” भी हटाया गया। पैगंबर मोहम्मद का एक कोट भी दीवार से मिटा दिया गया। फलस्तीन की आजादी की मांग करने वाली ग्रैफिटी को भी इस पूरी सफाई मुहिम में साफ कर दिया गया।

यूनिवर्सिटी प्रशासन बोला, विवाद से बचना चाहते थे

इस पूरे मामले पर यूनिवर्सिटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी सफाई भी दी। उनके मुताबिक, “जनरल मेंटेनेंस सेक्शन को ग्रैफिटी हटाने का काम इसलिए सौंपा गया क्योंकि हम और विवाद से बचना चाहते थे।” यानी प्रशासन का रुख साफ है कि उसने यह कदम किसी दबाव में नहीं, बल्कि मामले को शांत करने के मकसद से उठाया।

मगर सवाल यह भी उठता है कि क्या यह फैसला वाकई सिर्फ प्रशासनिक था, या फिर सीएम की चेतावनी के बाद उठाया गया एक मजबूरी भरा कदम था। जानकार मानते हैं कि टाइमिंग को देखते हुए दोनों बातों को पूरी तरह अलग करना मुश्किल है।

कैंपस की दीवारें हमेशा से रही हैं राजनीतिक बहस का अखाड़ा

जादवपुर यूनिवर्सिटी अपने राजनीतिक रूप से मुखर छात्र संगठनों के लिए वर्षों से जानी जाती रही है। कैंपस की दीवारों पर वामपंथी विचारधारा से जुड़े नारे और ग्रैफिटी बनाना यहां की पुरानी परंपरा मानी जाती रही है। ऐसे में इस बार की सफाई मुहिम को कई लोग यूनिवर्सिटी की उस पुरानी सांस्कृतिक पहचान पर सीधा हस्तक्षेप मानकर देख रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह है कि हिंसा भड़काने वाले या किसी उग्रवादी नेता का महिमामंडन करने वाले नारों को शिक्षण संस्थान की दीवारों पर जगह नहीं दी जा सकती। यह टकराव आगे और गहरा हो सकता है, क्योंकि छात्र संगठनों की ओर से अभी तक इस सफाई अभियान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

West Bengal Politics: आम छात्रों के लिए क्या मायने रखता है यह विवाद

इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ राजनीतिक हलकों तक सीमित नहीं रहने वाला। जादवपुर यूनिवर्सिटी के आम छात्रों के लिए भी यह मामला अहम है, क्योंकि कैंपस की दीवारें लंबे समय से उनके लिए अपनी बात रखने का एक जरिया रही हैं। अगर प्रशासन इस तरह सख्ती से ग्रैफिटी हटाता रहा, तो आने वाले समय में छात्र संगठनों और प्रशासन के बीच तनाव और बढ़ सकता है।

कई छात्रों का मानना है कि दीवार लेखन उनकी अभिव्यक्ति का हिस्सा रहा है, जबकि दूसरी तरफ यह भी सच है कि कुछ नारे वाकई बेहद उग्र भाषा में लिखे गए थे। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कैंपस के भीतर बहस तेज होने की पूरी संभावना है।

जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुआ यह सफाई अभियान महज दीवारों की रंगाई-पुताई भर का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक दबाव के बीच की एक बड़ी बहस बन चुका है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की चेतावनी और उसके अगले ही दिन प्रशासन की तेज कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि यह मुद्दा आसानी से शांत होने वाला नहीं है। आने वाले दिनों में छात्र संगठनों और यूनिवर्सिटी प्रशासन के बीच इस पर और टकराव देखने को मिल सकता है, फिलहाल सबकी नजरें अगले घटनाक्रम पर टिकी हैं।

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Author: Sanjna Gupta

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