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West Bengal Uniform Civil Code: पश्चिम बंगाल में यूनिफॉर्म सिविल कोड की तैयारी शुरू, 13 विवाह कानूनों की जगह लेगा एक साझा कानून

West Bengal Uniform Civil Code: पश्चिम बंगाल में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी यूसीसी को लेकर बड़ी हलचल शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने इस दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन कर दिया है, जो शादी, तलाक, गुजारा भत्ता और उत्तराधिकार जैसे मामलों से जुड़े 13 अलग-अलग कानूनों की जगह एक साझा कानून का मसौदा तैयार करेगी। इस समिति की पहली बैठक गुरुवार को दिल्ली में हुई, और इसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। सवाल यह है कि आखिर बंगाल का यह प्रस्तावित यूसीसी बाकी राज्यों से किस तरह अलग होगा, और आम लोगों की जिंदगी पर इसका क्या असर पड़ेगा।

देखने पर लगता है कि यह पहल सिर्फ कानूनी सुधार भर नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक और राजनीतिक बनावट में भी बड़ा बदलाव ला सकती है। यही वजह है कि इस मसौदे पर हर किसी की निगाहें टिकी हुई हैं।

West Bengal Uniform Civil Code: 13 मैरिज एक्ट की जगह लेगा एक कानून

गुरुवार को हुई समिति की पहली बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि किस तरह 13 अलग-अलग मैरिज एक्ट को खत्म कर एक ही कानून बनाया जाए। इसमें शादी, तलाक, गुजारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी और संपत्ति में वारिस से जुड़े नियम अब सभी समुदायों के लिए एक जैसे रखने की योजना है। हालांकि इस पूरी कवायद से अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखा जाएगा, ताकि उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों में किसी तरह का दखल न हो।

जानकारी के मुताबिक प्रस्तावित कानून के तहत विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और अभिभावकत्व जैसे मामलों के लिए एक साझा कानूनी ढांचा बनाया जाएगा। यह ढांचा धर्म आधारित मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों की जगह लेगा। सूत्रों की मानें तो प्रस्तावित यूसीसी में सबसे पहले लैंगिक समानता पर जोर दिया जाएगा, उसके बाद धर्म-निरपेक्षता को प्राथमिकता मिलेगी।

कौन-कौन से पुराने कानून हो सकते हैं निरस्त

सूत्रों के अनुसार जिन 13 पुराने अधिनियमों को निरस्त करने की संभावना जताई जा रही है, उनमें भारतीय तलाक अधिनियम 1869, भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872 और बंगाल मुहम्मदन विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम 1876 शामिल हैं। इसी सूची में आनंद विवाह अधिनियम 1909, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1936, आर्य विवाह वैधता अधिनियम 1937 और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून यानी शरिया आवेदन अधिनियम 1937 भी शामिल हैं।

इसके अलावा मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम 1939, विशेष विवाह अधिनियम 1954, हिंदू विवाह अधिनियम 1955, विदेशी विवाह अधिनियम 1969, मुस्लिम महिला तलाक पर अधिकारों का संरक्षण अधिनियम 1986 और मुस्लिम महिला विवाह पर अधिकारों का संरक्षण अधिनियम 2019 भी इस सूची में हैं। यह सभी कानून फिलहाल धर्म, अंतर-धार्मिक विवाह और व्यक्तिगत मान्यताओं के आधार पर लागू होते हैं, और नई व्यवस्था लागू होने पर राज्य द्वारा अधिसूचित अधिकारियों के पास तय समय-सीमा के भीतर हर शादी का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया जाएगा।

तलाक और गुजारा भत्ते के नियमों में आएगी सख्ती

प्रस्तावित कोड के प्रावधानों के मुताबिक कोर्ट के बाहर दिए जाने वाले तलाक को अब कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी। तलाक के कानूनी आधार दोनों पार्टनर्स के लिए बिल्कुल एक जैसे रखे जाएंगे, जो मौजूदा व्यवस्था से एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। साथ ही पति और पत्नी दोनों को तलाक के बाद गुजारा भत्ते यानी एलिमनी को लेकर समान अधिकार दिए जाएंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक इस नए ढांचे में निकाह हलाला जैसी कुछ पारंपरिक प्रथाओं को भी खत्म किया जा सकता है। यही नहीं, बंगाल के प्रस्तावित यूसीसी के तहत एक से अधिक विवाह यानी बहुविवाह की अनुमति का कोई प्रावधान नहीं रखा जाएगा। यह बदलाव जाहिर तौर पर उन समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा, जहां अब तक पर्सनल लॉ के तहत अलग-अलग नियम लागू होते रहे हैं।

समिति में कौन-कौन शामिल है

इस उच्चस्तरीय समिति की अध्यक्षता जहां न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं, वहीं इसमें मेघालय के पूर्व राज्यपाल तथागत राय, आईएएस अधिकारी दुष्यंत नरियाला और सेवानिवृत्त आईएएस शत्रुघ्न सिंह को भी सदस्य बनाया गया है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल सरकार की मुख्य सचिव संघमित्रा घोष, शिक्षाविद डॉ रत्ना भट्टाचार्य, पूर्व कुलपति गोपालचंद्र मिश्रा, कलकत्ता उच्च न्यायालय के अधिवक्ता उस्मान गनी मलिक तथा निर्मल्य भट्टाचार्य भी इस समिति का हिस्सा हैं।

इतने अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों को समिति में शामिल किया जाना बताता है कि सरकार इस मसौदे को कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक, तीनों नजरिए से परखना चाहती है।

बंगाल बनेगा यूसीसी लागू करने वाला चौथा राज्य

अधिसूचना में साफ तौर पर कहा गया है कि यह पूरी पहल संविधान के अनुच्छेद 44 को ध्यान में रखते हुए की जा रही है, जो राज्यों को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है। साल 2014 के बाद से उत्तराखंड, गुजरात और असम, ये तीन राज्य पहले ही यूसीसी को अपना चुके हैं, और अब पश्चिम बंगाल इस सूची में चौथे राज्य के तौर पर जुड़ने जा रहा है।

मुख्य पहलुओं के लिहाज से इस प्रस्तावित विधेयक का ढांचा उत्तराखंड और असम के मॉडल से मिलता-जुलता बताया जा रहा है। दिलचस्प यह है कि यूसीसी, 2026 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चुनावी वादों में से एक रहा था। पार्टी सत्ता में आई और राज्य में तृणमूल कांग्रेस के करीब 15 साल के शासन को समाप्त कर दिया, जिसके बाद अब यह वादा जमीन पर उतरता हुआ नजर आ रहा है।

West Bengal Uniform Civil Code: आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर

पश्चिम बंगाल जैसे सामाजिक और धार्मिक विविधता वाले राज्य में यूसीसी लागू होने का असर सीधे तौर पर लाखों परिवारों पर पड़ेगा। शादी, तलाक और संपत्ति के बंटवारे से जुड़े नियम अब तक अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग रहे हैं, ऐसे में एक साझा कानून आने पर बहुत से लोगों के मन में उत्सुकता के साथ-साथ आशंका भी स्वाभाविक है। जानकार बताते हैं कि इस तरह के बड़े कानूनी बदलावों को लागू करने से पहले व्यापक चर्चा और स्पष्टता बेहद जरूरी होती है, ताकि किसी समुदाय को यह न लगे कि उसके अधिकारों में कोई कमी की जा रही है।

पश्चिम बंगाल में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर बना यह मसौदा आने वाले दिनों में राज्य की सामाजिक-राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकता है। समिति ने काम शुरू कर दिया है, लेकिन असल तस्वीर तब साफ होगी जब मसौदा पूरी तरह तैयार होकर सामने आएगा। तब तक 13 पुराने कानूनों की जगह लेने वाला यह नया प्रस्तावित ढांचा लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहेगा। मामले की आगे की जानकारी अभी आनी बाकी है, और अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट कब तक सौंपती है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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