यूनियन बजट 2026: सरकार का फोकस फिस्कल अनुशासन और प्राइवेट इनवेस्टमेंट पर
नई दिल्ली: बजट 2026 में कैपिटल एक्सपेंडिचर में ज्यादा इजाफा करने की उम्मीद कम है। कैपिटल एक्सपेंडिचर में ज्यादा इजाफा करने से सरकार को ज्यादा कर्ज लेना पड़ेगा, जो इकोनॉमी के लिए ठीक नहीं है। फाइनेंस मिनिस्ट्री के तीन अधिकारियों ने मनीकंट्रोल को यह बताया। पहले अधिकारी ने बताया कि सरकार अगले बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर को जीडीपी का 3.2 फीसदी रख सकती है। यह मौजूदा फाइनेंशियल ईयर (2025-26) के 3.1 फीसदी से थोड़ा ज्यादा होगा।
पूंजीगत खर्च एक सीमा से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता
फाइनेंस मिनिस्ट्री के दूसरे अधिकारी ने बताया, “पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) कितना बढ़ाया जा सकता है, इसकी एक लिमिट है। सरकार का निवेश पहले से मैक्सिमम लेवल पर है। इसके बाद सरकार को बाजार से काफी उधार लेना पड़ेगा।” उन्होंने कहा कि पूंजीगत खर्च मौजूदा लेवल से बढ़ाने का असर प्राइवेट इनवेस्टमेंट पर पड़ेगा, जो ठीक नहीं है। अब प्राइवेट इनवेस्टमेंट बढ़ने के शुरुआती संकेत दिखने लगे हैं। इकोनॉमी की स्थिति अनुकूल है।
FY26 में पूंजीगत खर्च का टारगेट 11.21 लाख करोड़
केंद्र सरकार ने FY26 के लिए पूंजीगत खर्च का 11.21 लाख करोड़ रुपये का टारगेट रखा था। यह FY25 में 10.52 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत खर्च (एक्चुअल) से 6.6 फीसदी ज्यादा है। FY25 में पूंजीगत खर्च जीडीपी का 3.2 फीसदी था। FY24 में यह जीडीपी का 3.1 फीसदी और FY23 में जीडीपी का 2.8 फीसदी था। FY22 से इकोनॉमी की ग्रोथ में केंद्र सरकार के पूंजीगत खर्च की बड़ी भूमिका रही है। सरकार ने फरवरी 2021 में पेश बजट में ग्रोथ की रफ्तार बढ़ाने के लिए पूंजीगत खर्च पर ज्यादा ध्यान देने की स्ट्रेटेजी अपनाई थी।

पूंजीगत खर्च बढ़ाने से आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं
सरकार के पूंजीगत खर्च बढ़ाने का मतलब है कि रोड, रेलवे और पोर्ट्स जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का खर्च बढ़ता है। रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (सैलरीज या सब्सिडी जैसे खर्च) के मुकाबले इसका ज्यादा असर पड़ता है। कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ने से सीमेंट, स्टील, मशीनरी आदि की डिमांड बढ़ती है। साथ ही लेबर की मांग भी बढ़ती है। इसके अलावा वर्कर्स को वेजेज के पेमेंट और कॉन्ट्रैक्टर्स की कमाई बढ़ने से कंजम्प्शन बढ़ता है। इससे डिमांड को बढ़ावा मिलता है और आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं।
FY26 में बाजार से कर्ज के लिए 14.72 लाख करोड़ का टारगेट
FY26 में सरकार ने बाजार से कर्ज के लिए 14.72 लाख करोड़ रुपये का टारगेट रखा है। नेट बॉरोइंग टारगेट 11.54 लाख करोड़ रुपये है। सरकार अपने फिस्कल डेफिसिट को पूरा करने के लिए पब्लिक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस से पैसे उधार लेती है। मार्केट से ज्यादा कर्ज लेने से सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ता है। इससे सरकार को इंटरेस्ट के रूप में ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं।
निष्कर्ष :
यूनियन बजट 2026 में सरकार के पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) में बड़ा इजाफा होने की संभावना कम है। सरकार इसे जीडीपी के करीब 3.2% तक सीमित रख सकती है, ताकि ज्यादा कर्ज लेने से बचा जा सके और इकोनॉमी पर नकारात्मक असर न पड़े। चूंकि सरकारी निवेश पहले ही ऊंचे स्तर पर है, इसलिए इससे आगे बढ़ाने पर प्राइवेट इनवेस्टमेंट प्रभावित हो सकता है।
हालांकि, बीते वर्षों में पूंजीगत खर्च ने आर्थिक विकास को गति दी है और इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजगार व डिमांड बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। अब सरकार का फोकस फिस्कल बैलेंस बनाए रखने, कर्ज के बोझ को नियंत्रित करने और प्राइवेट सेक्टर के निवेश को बढ़ावा देने पर ज्यादा दिखता है।



