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Himachal Cancer Cases: हिमाचल में तेजी से बढ़ रहा कैंसर, सालाना 16 हजार नए मरीज; राष्ट्रीय औसत से 3 गुना ज्यादा वृद्धि

Shimla: हिमाचल प्रदेश में कैंसर के बढ़ते मामले चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार प्रदेश में हर साल कैंसर के करीब 16 हजार नए मरीज सामने आ रहे हैं। कैंसर के मामलों में आंत का कैंसर सबसे अधिक बताया गया है।

इसके बाद स्तन और ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या अधिक है। विशेषज्ञों के मुताबिक रेड मीट का अधिक सेवन, धूम्रपान, फसलों में कीटनाशकों और रासायनिक खादों का अत्यधिक इस्तेमाल, वायु प्रदूषण और बदलती जीवनशैली इसके प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं।

अध्ययन के अनुसार हिमाचल प्रदेश में कैंसर की स्व-रिपोर्टेड दर सालाना 2.2 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जबकि राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर करीब 0.6 फीसदी है। पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा के बाद हिमाचल में भी कैंसर के बढ़ते मामले स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं।

58 से 67 वर्ष की उम्र में सबसे ज्यादा मामले

आईजीएमसी शिमला के टर्शरी कैंसर सेंटर में आने वाले मरीजों के पिछले वर्षों के आंकड़ों का कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के चिकित्सकों ने अध्ययन किया है। यह शोध जून 2026 में मेडलेटर जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में पाया गया कि 58 से 67 वर्ष की आयु के लोगों में कैंसर के मामले सबसे अधिक सामने आए। वहीं, 38 से 57 वर्ष की मध्यम आयु वर्ग की महिलाओं में भी कैंसर का जोखिम बढ़ता दिखाई दे रहा है।

Photo-AI

रेफरल सुविधाओं में हुआ सुधार

प्रदेश में कैंसर की जांच और मरीजों को रेफर करने की सुविधाओं में पहले की तुलना में सुधार हुआ है। इसके चलते दूरदराज के क्षेत्रों से भी मरीज जांच और उपचार के लिए अस्पतालों तक पहुंच रहे हैं।

हालांकि, बेहतर या विशेष उपचार के लिए कई मरीज चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों का रुख करते हैं। ऐसे में हिमाचल में दर्ज होने वाले मामलों की वास्तविक संख्या इससे अधिक होने की संभावना भी जताई जा रही है।

रेड मीट और धूम्रपान बड़े जोखिम कारक

विशेषज्ञों के अनुसार रेड मीट और असंतुलित खान-पान से आंत के कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। हिमाचल में सेब के बगीचों और सब्जियों में कीटनाशकों तथा रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई गई है।

इनके कारण खाद्य पदार्थों और पानी पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर लगातार अध्ययन की जरूरत है।

वहीं, बीड़ी, सिगरेट और हुक्के का सेवन पुरुषों में फेफड़ों और गले के कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल है। वायु प्रदूषण और बदलती जीवनशैली भी कैंसर के बढ़ते मामलों में भूमिका निभा सकती है।

समय पर जांच से बढ़ता है इलाज का असर Phoyo-AI

समय पर जांच से बढ़ता है इलाज का असर

विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने पर उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है। 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार नियमित जांच और मैमोग्राफी करवाने की सलाह दी जाती है।

पुरुषों को शरीर में किसी असामान्य गांठ, लंबे समय से बने हुए लक्षण या शरीर में किसी अन्य असामान्य बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

संतुलित खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान से दूरी और रेड मीट का सीमित सेवन कैंसर के कुछ जोखिम कारकों को कम करने में मदद कर सकता है।

डॉक्टर ने क्या कहा?

आईजीएमसी शिमला के टर्शरी कैंसर सेंटर के विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष गुप्ता के अनुसार, प्रदेश में हर साल करीब 16 हजार नए कैंसर मरीज सामने आते हैं। इनमें आंत के कैंसर के मरीजों की संख्या अधिक है।

उनके मुताबिक प्रदेश में आने वाले कुल मरीजों में लगभग आधे ही अपना उपचार हिमाचल में करवाते हैं, जबकि अन्य मरीज बेहतर उपचार के लिए बाहरी राज्यों का रुख करते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रदेश में कैंसर के अत्याधुनिक उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हैं और रेड मीट के अधिक सेवन तथा धूम्रपान जैसे जोखिम कारकों से बचाव जरूरी है।

Ragav Kalia
Author: Ragav Kalia

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