BRICS Summit 2026: दिल्ली में इन दिनों दुनियाभर के बड़े राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी ने एक बार फिर BRICS संगठन को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। साल 2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ शुरू हुआ यह संगठन अब 11 सदस्य देशों तक पहुंच चुका है, और दिलचस्प बात यह है कि करीब 40 और देश किसी न किसी रूप में इससे जुड़ने की इच्छा जता चुके हैं। शुरुआत में विकसित देशों के संगठन G7 के मुकाबले एक नया मंच खड़ा करने के मकसद से बना BRICS अब वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाला एक अहम समूह बनता जा रहा है। मिस्र, इथियोपिया, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देशों के जुड़ने के बाद संगठन का दायरा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतने देश इस संगठन का हिस्सा क्यों बनना चाहते हैं और अगर सदस्यता और बढ़ी, तो इसका असर किन-किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
BRICS Summit 2026: सबसे पहले समझें BRICS का बुनियादी ढांचा
BRICS की नींव ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर रखी थी। समय के साथ इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश भी जुड़ते गए, जिसके बाद अब कुल सदस्य देशों की संख्या 11 हो चुकी है। इस संगठन के गठन के पीछे मूल विचार यह था कि तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साझा मंच मिले, जहां वे आपसी व्यापार बढ़ा सकें और डॉलर पर निर्भर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश सकें। यही सोच आज भी संगठन के विस्तार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रही है।
40 देश आखिर क्यों दिखा रहे हैं दिलचस्पी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों का असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं ने बीते वर्षों में महसूस किया है, और यही वजह है कि कई देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। BRICS का एक अहम मकसद डी-डॉलराइजेशन है, यानी दो सदस्य देशों के बीच व्यापार सीधे उनकी अपनी-अपनी मुद्रा में हो, न कि डॉलर के माध्यम से। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि संगठन की कोई साझा मुद्रा बन गई है, बल्कि इसके लिए सदस्य देशों के बीच आपसी भरोसा मजबूत करना जरूरी माना जा रहा है। यही वजह है कि 2023 से 2026 के बीच एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व के करीब 40 देशों ने संगठन से जुड़ने या इसका पार्टनर बनने की इच्छा जताई है। 2025-2026 में बनाई गई “ब्रिक्स पार्टनर” कैटेगरी ने भी इस रुझान को और बढ़ावा दिया है, क्योंकि इसके जरिए बिना पूर्ण सदस्यता के भी देश व्यापार और निवेश परियोजनाओं से जुड़ सकते हैं।
विस्तार से भारत को क्या फायदा और चुनौती
BRICS का आकार जितना बड़ा होगा, भारत के लिए व्यापार, निवेश और कूटनीतिक सहयोग के उतने ही ज्यादा अवसर खुल सकते हैं। नए सदस्य देशों के जुड़ने से भारत को नए बाजार और साझेदारी के विकल्प मिल सकते हैं, जो लंबी अवधि में आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकते हैं। हालांकि इसके साथ एक चुनौती भी जुड़ी है, क्योंकि जितने ज्यादा सदस्य देश होंगे, उतनी ही नीतिगत असहमतियां और फैसलों में देरी की आशंका भी बढ़ जाएगी। ऐसे में संगठन के लिए आम सहमति बनाना पहले से ज्यादा जटिल हो सकता है, जो इसके भविष्य के फैसलों की रफ्तार पर असर डाल सकता है।
आम लोगों की जिंदगी पर क्या पड़ सकता है असर
अगर सदस्य देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाते हैं, तो डॉलर के उतार-चढ़ाव का असर धीरे-धीरे कम हो सकता है, जिसका सीधा फायदा आयात-निर्यात से जुड़ी वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता के रूप में मिल सकता है। तेल और गैस उत्पादक देशों के संगठन से जुड़ने से ऊर्जा आपूर्ति में स्थिरता बढ़ने की उम्मीद है, जो महंगाई को काबू में रखने में मददगार साबित हो सकती है। इसके अलावा संगठन मजबूत होने से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज वैश्विक मंचों पर और असरदार हो सकती है, जिससे नीतिगत फैसलों में इन देशों की भागीदारी बढ़ सकती है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक से भारत को मिल रहा फंड
BRICS के न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका भी इस पूरी कहानी में अहम है, क्योंकि यह सड़क, ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज मुहैया कराता है। भारत में चल रहे कुछ मेट्रो प्रोजेक्ट्स को भी इसी बैंक से आर्थिक सहायता मिल रही है। लखनऊ मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए करीब 311 मिलियन डॉलर यानी लगभग 31 करोड़ रुपये के कर्ज की उम्मीद जताई गई है, जो प्रोजेक्ट के कुल बजट का करीब आधा हिस्सा है। इसी तरह हैदराबाद में बन रहे दो एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स के लिए भी करीब 70 प्रतिशत फंडिंग इसी बैंक से आने की संभावना है, जो दिखाता है कि यह संगठन सिर्फ कूटनीतिक मंच नहीं बल्कि आर्थिक सहयोग का भी अहम जरिया बन चुका है।
कुल मिलाकर BRICS का बढ़ता आकर्षण दुनियाभर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की उस चाहत को दर्शाता है, जिसमें वे डॉलर केंद्रित वैश्विक व्यवस्था से आगे बढ़कर नए विकल्प तलाशना चाहती हैं। 40 देशों की दिलचस्पी यह साफ संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में यह संगठन वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति का एक बड़ा केंद्र बन सकता है। भारत के लिए यह विस्तार व्यापार, निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास के लिहाज से नए अवसर लेकर आ सकता है, हालांकि सदस्य देशों की संख्या बढ़ने के साथ आपसी तालमेल बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा। दिल्ली में हो रहा मौजूदा समिट इसी बदलते वैश्विक समीकरण की एक अहम कड़ी साबित हो सकता है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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