Dhanbad News: झारखंड के धनबाद कोयलांचल में भू-धंसान की समस्या अब छिटपुट घटना नहीं, बल्कि लगातार बढ़ता खतरा बन चुकी है। बंद पड़ी खदानों, भूमिगत खाली जगहों, कमजोर पिलरों और दशकों पुरानी भूमिगत आग की विरासत अब सीधे आबादी वाले इलाकों को प्रभावित कर रही है। हाल ही में 13 सितंबर को रामकनाली प्रोजेक्ट में अवैध खनन के दौरान खदान धंसने से तीन लोगों की जान चली गई, जबकि इससे पहले सिजुआ की तीनपटिया बस्ती में जमीन धंसने से एक बच्चे की मौत हो गई थी। अनुमान के मुताबिक धनबाद में 100 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र किसी न किसी स्तर पर संवेदनशील माना जा रहा है, जिसके दायरे में करीब 2.3 से 2.75 लाख लोग रह रहे हैं। यह खतरा अब सिर्फ झरिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कतरास और निरसा जैसे इलाकों में भी तेजी से फैल रहा है।
Dhanbad News: कहां-कितना क्षेत्र माना जा रहा संवेदनशील
क्षेत्रवार अनुमान के अनुसार धनबाद शहर से सटे इलाकों में करीब 10 वर्ग किमी, झरिया में 25 वर्ग किमी, कतरास में 40 वर्ग किमी और निरसा में करीब 40 वर्ग किमी क्षेत्र भू-धंसान की दृष्टि से संवेदनशील बताया जा रहा है। धनबाद नगर निगम का कुल क्षेत्रफल करीब 355.77 वर्ग किमी है, ऐसे में शहर से सटे हिस्से, झरिया और कतरास को मिलाकर करीब 75 वर्ग किमी क्षेत्र इस दायरे में आता है, जो निगम क्षेत्र का लगभग 21 फीसदी बैठता है। हालांकि यह आंकड़े अनुमान आधारित हैं और इन्हें सरकारी रूप से अंतिम प्रभावित क्षेत्र नहीं माना जा सकता।
ढाई लाख से ज्यादा आबादी खतरे की जद में

संवेदनशील मानी जा रही जमीन पर सिर्फ खाली भूखंड नहीं, बल्कि घर, स्कूल, बाजार और पूरी बस्तियां बसी हुई हैं। अनुमानों के अनुसार धनबाद शहर से सटे इलाकों में 10 से 15 हजार, झरिया में 50 से 60 हजार, कतरास में 70 हजार से एक लाख और निरसा में करीब एक लाख की आबादी संभावित खतरे के दायरे में रह रही है। सभी क्षेत्रों को जोड़ने पर यह आंकड़ा करीब 2.3 से 2.75 लाख लोगों तक पहुंचता है, जो भी अनुमान पर आधारित है।
हालिया घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
पिछले कुछ महीनों में हुई घटनाओं ने इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। 31 मार्च 2026 को टंडाबाड़ी में मकान के नीचे जमीन धंसने से तीन लोगों की मौत हो गई थी। जुलाई-अगस्त में छाताबाद में कई मकान प्रभावित हुए, वहीं आठ सितंबर को सिजुआ की तीनपटिया बस्ती में एक बच्चे की जान चली गई। इसके बाद 13 सितंबर को रामकनाली में खदान धंसने से तीन और मौतें दर्ज की गईं, जिसने प्रशासन और स्थानीय लोगों दोनों को चिंता में डाल दिया है।
मार्च के बाद 17 घटनाएं, कतरास सबसे प्रभावित
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस साल मार्च के बाद धनबाद में भू-धंसान की कुल 17 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं, जिनमें से अकेले 11 घटनाएं कतरास कोयलांचल क्षेत्र में हुई हैं। यह आंकड़ा बताता है कि खतरा अब केवल पुराने चर्चित इलाकों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि नए और अपेक्षाकृत कम चर्चित क्षेत्रों में भी जमीन की स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
भू-धंसान के पीछे कौन से कारण

धनबाद की जमीन धंसने के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं। भूमिगत खनन के बाद छूटी खाली जगहें यानी पुराने गोफ समय के साथ कमजोर होकर ऊपर की जमीन को प्रभावित करते हैं। इसी तरह पुराने खनन क्षेत्रों में छोड़े गए कमजोर पिलर भी जमीन की स्थिरता बिगाड़ सकते हैं। इसके अलावा दशकों से सुलग रही भूमिगत आग और कमजोर हिस्सों में हो रहा अवैध खनन इस खतरे को और गंभीर बना रहा है।
भूमिगत आग का दायरा घटा, लेकिन खतरा बरकरार
एनआरएससी के आंकड़ों के अनुसार 2017-18 में धनबाद में सतही कोयला आग का क्षेत्र 3.26 वर्ग किमी था, जो 2020-21 में घटकर 1.80 वर्ग किमी और 2024-25 में 1.53 वर्ग किमी रह गया। जनवरी 2026 में 27 फायर लोकेशन पर सक्रिय आग का क्षेत्र करीब 1.03 वर्ग किमी दर्ज किया गया। यानी आग का दायरा भले घटा हो, लेकिन इससे जुड़ा भू-धंसान का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
पुनर्वास योजना और उसकी धीमी रफ्तार
झरिया में आग और भू-धंसान प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए वर्ष 2004 में जेआरडीए का गठन किया गया था। जून 2025 में केंद्र सरकार ने संशोधित झरिया मास्टर प्लान को 5,940.47 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी दी, जिसमें 81 संवेदनशील स्थलों की पहचान की गई है, जहां करीब 15,080 परिवार रहते हैं। हालांकि 2022-23 से 2024-25 के बीच केवल 649 परिवारों का ही पुनर्वास हो सका, जो चिह्नित परिवारों का महज 4.3 फीसदी है।
Dhanbad News: खतरे के बीच खुद पलायन कर रहे परिवार
एक तरफ सरकारी पुनर्वास की रफ्तार धीमी है, तो दूसरी तरफ झरिया के कई परिवार खुद भी सुरक्षित इलाकों की तलाश में पलायन कर रहे हैं। गोविंदपुर और धनबाद से सटे वनस्थली कॉलोनी, कोलाकुसमा तथा सीएमपीएफ को-ऑपरेटिव कॉलोनी जैसे गैर-कोयला क्षेत्रों में लोग जमीन खरीदकर बस रहे हैं। इससे संवेदनशील इलाकों की आबादी घट सकती है, लेकिन बिना नियोजन के बढ़ती नई बस्तियां सड़क, पानी और सीवरेज जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए नई चुनौती भी खड़ी कर सकती हैं।
धनबाद कोयलांचल की जमीन के नीचे दशकों पुराने खनन की विरासत आज भी मौजूद है, और हर नई घटना इस जोखिम की चेतावनी बनकर सामने आती है। सौ वर्ग किलोमीटर से अधिक संवेदनशील क्षेत्र और ढाई लाख से ज्यादा प्रभावित आबादी का अनुमान बताता है कि यह समस्या अब स्थानीय स्तर से आगे बढ़कर बड़ी चुनौती बन चुकी है। पुनर्वास की धीमी रफ्तार और लगातार बढ़ती घटनाओं के बीच जरूरी है कि संवेदनशील क्षेत्रों की वैज्ञानिक निगरानी और समयबद्ध पुनर्वास योजना को प्राथमिकता दी जाए, ताकि आने वाले समय में जान-माल का नुकसान रोका जा सके।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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