Election Commission: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की खबरों पर अब खुद निर्वाचन आयोग ने विस्तृत सफाई दी है। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्तों के बीच फैसलों को लेकर गंभीर असहमति रही है, जिसके बाद विपक्षी दलों ने आयोग पर तीखे सवाल खड़े किए थे। इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग ने एक विस्तृत प्रेस नोट जारी किया और आठ बिंदुओं में अपनी कार्यप्रणाली तथा संवैधानिक भूमिका को स्पष्ट किया। आयोग ने साफ तौर पर कहा कि किसी भी संस्था में अलग-अलग राय का होना पूरी तरह सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और यह फैसला लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले पूरे कमीशन की सर्वसम्मति से लिए गए हैं, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी भी शामिल रहे हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से शुरू हुआ पूरा विवाद
यह पूरा मामला उस समय सुर्खियों में आया जब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयोग के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर गंभीर मतभेद रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की जानकारी के बिना ही कई अहम मामलों पर फैसले लिए गए, जिन पर उन्होंने पहले आपत्ति जताई थी। यह भी दावा किया गया कि करीब दस महीनों के दौरान कम से कम चौदह बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। इस रिपोर्ट के सामने आते ही विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर सवाल उठाना शुरू कर दिया, जिसके बाद आयोग के लिए सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना जरूरी हो गया।
चुनाव आयोग ने इन 8 प्वाइंट्स में दी सफाई

- ECI एक संवैधानिक संस्था है जो संविधान के अनुच्छेद 324, कानूनी नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के तहत काम करती है। यह एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में कार्य करती है, जहां लिखित नोट्स, ऑब्जर्वेशन, तकनीकी सुझाव और आंतरिक चेक-एंड-बैलेंस की प्रक्रिया लगातार पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए चलती रहती है।
- कमीशन के सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश पूरी तरह कानूनी रूप से मान्य हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए लिए जाते हैं।
- ड्राफ्ट स्टेज के दौरान कमीशन के सदस्यों द्वारा उठाए गए ऑपरेशनल सवाल या दिए गए सुझाव मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ी मानक प्रशासनिक प्रक्रिया का ही हिस्सा होते हैं, जिनका मकसद चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाना है।
- किसी भी संस्था में अलग-अलग विचारों का होना सामान्य बात है और यह अंतिम फैसला लेने से पहले की प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है। सिर्फ तीन आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकारी अपने सुझाव देने के लिए अधिकृत है।
- दस महीने के लंबे समय में फैले कुछ चुनिंदा आंतरिक नोट्स को अलग से उठाकर दिखाना और उस दौरान लिए गए बड़ी संख्या में फैसलों को नजरअंदाज करना तस्वीर का केवल एक अधूरा हिस्सा दिखाता है। हाल के महीनों में कमीशन ने करीब चालीस नई पहलें शुरू की हैं और SIR समेत कई इलेक्टोरल रिफॉर्म किए हैं, जो सर्वसम्मति से लिए गए फैसलों का नतीजा हैं।
- आयोग ने हाल ही में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में बड़े चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न कराए हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और ऑपरेशनल मशीनरी के साथ-साथ आयोग की कई मंजूरियां और निर्देश शामिल रहे।
- कमीशन का डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet बिना अनुमति किसी भी तरह की छेड़छाड़ को रोकने के लिए सख्त डेटा सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करता है। इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर और डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर जैसी कानूनी अथॉरिटी भी कानून के तहत मिली शक्तियों के अनुसार ही काम करती हैं।
- भारत का निर्वाचन आयोग अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाने के लिए तत्पर है और देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अपनी अहम भूमिका को भलीभांति समझता है।
तीन अधिकारियों के पास है फैसले लेने का अधिकार
चुनाव आयोग में फैसले लेने का अधिकार तीन शीर्ष अधिकारियों के पास होता है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इन दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी के बिना ही उन मामलों पर फैसले लिए गए, जिन पर उन्होंने पहले आपत्ति जताई थी। यह भी आरोप लगाया गया कि उनकी आपत्ति के बावजूद SIR को लेकर फैसले जारी कर दिए गए, और दस महीनों में कम से कम चौदह बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज की गई थीं। इन आरोपों के जवाब में आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR समेत सभी फैसले सर्वसम्मति से और तीनों अधिकारियों की मंजूरी से ही लिए गए हैं।
विपक्ष के सवालों के बीच आयोग की सफाई
अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े किए थे। इसी को देखते हुए आयोग ने यह विस्तृत प्रेस नोट जारी करना जरूरी समझा, ताकि अपनी संवैधानिक भूमिका और फैसला लेने की प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता दी जा सके। आयोग की इस प्रतिक्रिया को विपक्षी आरोपों के जवाब में एक सुनियोजित और तथ्यपरक स्पष्टीकरण के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें पारदर्शिता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया गया है।
आगे क्या रहेगी इस मुद्दे की दिशा
चुनाव आयोग की इस विस्तृत सफाई के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्षी दल इस स्पष्टीकरण को किस तरह लेते हैं। आयोग ने अपने आठ बिंदुओं के जरिए यह स्थापित करने की कोशिश की है कि SIR से जुड़े सभी फैसले पूरी तरह सर्वसम्मति और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप लिए गए हैं। हालांकि विपक्ष की तरफ से उठाए गए सवाल अभी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं, इसलिए आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना बनी हुई है।
चुनाव आयोग की यह सफाई SIR प्रक्रिया को लेकर उठे विवाद को शांत करने की एक अहम कोशिश मानी जा रही है। आयोग ने अपने बयान में यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि संस्थागत लोकतंत्र में अलग-अलग राय होना कोई असामान्य बात नहीं, बल्कि बेहतर फैसलों तक पहुंचने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हालांकि विपक्षी दलों के आरोप अभी थमे नहीं हैं, इसलिए आने वाले दिनों में इस विषय पर सियासी हलचल बनी रहने की पूरी संभावना है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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