New Delhi: देश में निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान दवाइयों, मेडिकल डिवाइस और अन्य जरूरी सामान की कीमतों तथा मरीजों से वसूले जाने वाले बिल को लेकर निगरानी और नियमन की मांग तेज हो गई है। हालिया जांच और सर्वे में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और मरीजों से लिए जाने वाले शुल्क के बीच बड़ा अंतर सामने आया है।
महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स और मेडिकल डिवाइस की कीमतों का सर्वे किया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अस्पतालों के बिलों की समीक्षा में कंज्यूमेबल्स पर 200 से 300 प्रतिशत तक के मार्जिन के उदाहरण सामने आए। FDA ने ऐसे उत्पादों को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने के लिए National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) को प्रस्ताव भेजा है।
IV सेट और सिरिंज की कीमतों में बड़ा अंतर
हालिया रिपोर्ट में एक IV infusion set का उदाहरण दिया गया है, जिसकी थोक कीमत करीब ₹11 बताई गई, जबकि उसका MRP ₹325 तक दर्ज किया गया। इसी तरह एक डिस्पोजेबल सिरिंज की कीमत ₹7 से कम होने के बावजूद उसका MRP करीब ₹60 बताया गया। हालांकि MRP, अस्पताल की वास्तविक खरीद कीमत और मरीज से वसूले गए अंतिम शुल्क अलग-अलग अवधारणाएं हैं और हर अस्पताल पर एक ही पैटर्न लागू नहीं किया जा सकता।
महंगे मेडिकल डिवाइस में भी कीमतों का अंतर चर्चा में है। अप्रैल 2026 की एक रिपोर्ट में मेडिकल डिवाइस उद्योग से जुड़े संगठन AiMeD की ओर से अस्पतालों में कुछ डिवाइस और कंज्यूमेबल्स पर वास्तविक लागत की तुलना में कई गुना अधिक कीमत वसूले जाने का दावा किया गया था। वहीं Association of Healthcare Providers of India ने अस्पतालों के संचालन खर्च और उनके सामान्य मार्जिन को भी ध्यान में रखने की बात कही थी।

मरीजों के बिल में पारदर्शिता का मुद्दा
अस्पतालों की बिलिंग को लेकर देशभर में पारदर्शिता की मांग भी बढ़ी है। अगस्त 2026 में प्रकाशित LocalCircles सर्वे में 23,084 लोगों से प्रतिक्रियाएं ली गईं। इनमें 68 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने निजी अस्पतालों में इलाज की कीमत को बहुत अधिक बताया, जबकि 51 प्रतिशत ने दवाइयों और कंज्यूमेबल्स की कीमत अधिक होने की शिकायत की।
एक अन्य सर्वे के अनुसार, कुछ मरीजों ने दवाइयों या कंज्यूमेबल्स की मात्रा से जुड़ी अतिरिक्त बिलिंग और ऐसे शुल्क की शिकायत भी की जिनकी उन्हें पहले जानकारी नहीं थी।
सरकार के सामने चुनौती क्या है?
मामला सिर्फ दवाइयों की कीमत तक सीमित नहीं है। अस्पताल के अंतिम बिल में कमरे का शुल्क, ICU, जांच, डॉक्टर की फीस, मेडिकल डिवाइस, कंज्यूमेबल्स और दवाइयों समेत कई मद शामिल होती हैं। इसलिए नियामकों के सामने चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है जिसमें अस्पतालों की लागत और संचालन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मरीजों को स्पष्ट और समझने योग्य बिल मिले।
हाल में अस्पताल बिलिंग में एक समान और स्पष्ट प्रारूप की जरूरत पर भी चर्चा हुई है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) से संबंधित IS 19493:2025 के तहत अस्पताल बिलों को स्पष्ट, विस्तृत और मरीज-केंद्रित बनाने की दिशा में मानक तैयार किया गया है।
इस पूरे मामले में आगे की निगरानी, मूल्य नियंत्रण और अस्पतालों की बिलिंग में पारदर्शिता को लेकर उठाए जाने वाले कदम महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में अलग-अलग राज्यों और अस्पतालों के आंकड़े शामिल हैं, इसलिए इन्हें देश के हर अस्पताल की स्थिति का प्रतिनिधि आंकड़ा नहीं माना जा सकता।

