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Jharkhand High Court ने पटमदा गैंगरेप और कल्लू घोष हत्याकांड में सजा बरकरार रखी, दोनों अपीलें खारिज

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने गुरुवार को दो अहम आपराधिक मामलों में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। पटमदा गैंगरेप मामले में चार दोषियों की 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी गई। साथ ही धतकीडीह में कल्लू घोष की हत्या के मामले में चार भाइयों की उम्रकैद की सजा भी कायम रही। जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दोनों मामलों में दोषियों की ओर से दायर आपराधिक अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने साफ कहा कि मेडिकल जांच में कमी या कुछ तकनीकी कमियां होने मात्र से पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को नकारा नहीं जा सकता। हत्या के मामले में भी गवाहों की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से घटना साबित हुई। इन फैसलों से दोनों मामलों में लंबे समय से चली आ रही कानूनी प्रक्रिया एक चरण आगे बढ़ी। पटमदा मामले में तीन दोषी जमानत पर थे, जिनकी जमानत रद्द कर दी गई।

Jharkhand High Court: पटमदा गैंगरेप मामले का फैसला

पटमदा गैंगरेप मामले में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही माना। जमशेदपुर की ट्रायल कोर्ट ने 23 अगस्त 2018 को चारों आरोपियों को दोषी ठहराया था। 29 अगस्त 2018 को उन्हें 20-20 साल के कठोर कारावास और 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। दोषियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। खंडपीठ ने दोनों अपीलों को खारिज करते हुए सजा को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है। मेडिकल रिपोर्ट में सीमन नहीं मिलने या जांच में कुछ कमियां होने से उसकी बात को खारिज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने पीड़िता के शरीर पर चोट के निशानों को भी महत्वपूर्ण माना।

घटना कब और कैसे हुई

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पांच नवंबर 2013 को घटना हुई। पीड़िता उस दिन ससुराल से अपने मायके जा रही थी। दोपहर करीब तीन बजे लापित छेंचा जंगल के पास चार आरोपियों ने उसे पकड़ लिया। उन्होंने बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया। अगले दिन गांव में पंचायत के जरिए मामला सुलझाने की कोशिश हुई। आरोपी पंचायत में नहीं पहुंचे। इसके बाद आठ नवंबर 2013 को पटमदा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। जांच के बाद आरोप तय हुए और मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद फैसला सुनाया।

दोषियों की वर्तमान स्थिति

चार दोषियों में से हेमंत सिंह उर्फ हाटो सिंह पहले से जेल में बंद हैं। बाकी तीन रामनाथ सिंह उर्फ मुंडा सिंह, विभीषण सिंह उर्फ पंचू सिंह और फागु हांसदा उर्फ सुफल हांसदा जमानत पर थे। हाईकोर्ट ने इन तीनों की जमानत रद्द कर दी। अदालत ने निर्देश दिया कि वे फैसले की तारीख से दो महीने के अंदर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करें। इस आदेश के बाद तीनों दोषियों को निर्धारित समय सीमा के अंदर जेल जाना होगा। पटमदा गैंगरेप मामले में यह फैसला पीड़िता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कल्लू घोष हत्याकांड में उम्रकैद बरकरार

इसी खंडपीठ ने कल्लू घोष हत्याकांड में भी फैसला सुनाया। धतकीडीह हरिजन बस्ती में कल्लू घोष की गोली मारकर हत्या हुई थी। निचली अदालत ने चार भाइयों ज्योति मुखी, होलिया मुखी, खून मुखी उर्फ विकास मुखी और टीका मुखी उर्फ गोपी मुखी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोषियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। खंडपीठ ने दोनों अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से घटना की पुष्टि होती है। निचली अदालत ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था। इसलिए उसके फैसले में हस्तक्षेप का कोई कानूनी आधार नहीं है।

Jharkhand High Court: साक्ष्यों का मूल्यांकन

हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर जोर दिया। पटमदा मामले में पीड़िता की गवाही को आधार बनाया गया। चोट के निशान और घटना की परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया। कल्लू घोष मामले में गवाहों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट को पर्याप्त माना गया। अदालत ने साफ किया कि तकनीकी कमियों के कारण ठोस साक्ष्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये फैसले दिखाते हैं कि अदालत साक्ष्यों की गुणवत्ता को प्राथमिकता देती है। दोनों मामलों में लंबे समय बाद अंतिम फैसला आने से पीड़ित पक्ष को राहत मिली है।

झारखंड हाईकोर्ट के इन फैसलों ने पटमदा गैंगरेप और कल्लू घोष हत्याकांड दोनों मामलों में सजा को बरकरार रखा। पटमदा मामले में चार दोषियों को 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा कायम रही। तीन दोषियों की जमानत रद्द कर दी गई और उन्हें दो महीने में आत्मसमर्पण का आदेश दिया गया। कल्लू घोष मामले में चार भाइयों की उम्रकैद की सजा भी बनी रही। अदालत ने दोनों मामलों में साक्ष्यों को पर्याप्त माना और अपीलें खारिज कर दीं। इन फैसलों से न्यायिक प्रक्रिया एक चरण आगे बढ़ी है। पीड़ित पक्ष लंबे इंतजार के बाद राहत की सांस ले सकता है। आगे की कानूनी प्रक्रिया दोषियों की ओर से उच्च अदालत में जाने पर निर्भर करेगी।

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Author: Sanjna Gupta

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