Bengal Land Policy: शुभेंदु अधिकारी की अगुआई वाली सरकार पश्चिम बंगाल में औद्योगिक निवेश को गति देने के लिए जमीन उपलब्ध कराने की दोहरी रणनीति अपनाने जा रही है। एक तरफ किसानों से सीधे जमीन खरीदकर उद्योगों को सौंपी जाएगी, दूसरी तरफ लैंड-पूलिंग व्यवस्था लागू की जाएगी। इस नीति का मकसद निवेशकों को आकर्षित करना और साथ ही किसानों के साथ जबरदस्ती से बचते हुए उनके हितों का ध्यान रखना है। गुरुवार को औद्योगिक प्रोत्साहन नीति की घोषणा करते हुए अधिकारी ने साफ कहा कि सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगी और न ही उद्योगपतियों को खुद जमीन खरीदने के लिए मजबूर करेगी।
Bengal Land Policy: योगी मॉडल की तर्ज पर शुभेंदु अधिकारी का नया प्रस्ताव, जमीन के बदले किसानों को शेयर
मुख्य बातें
- लैंड-पूलिंग व्यवस्था क्या है और यह कैसे काम करती है?
- शुभेंदु अधिकारी ने योगी आदित्यनाथ का मॉडल क्यों चुना?
- जमीन खरीदने और देने का नया फॉर्मूला क्या है?
- जमीन मालिकों को कंपनी में शेयर कैसे मिलेंगे?

लैंड-पूलिंग व्यवस्था क्या है और यह कैसे काम करती है?
लैंड-पूलिंग एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जमीन का मालिक अपनी जमीन स्वेच्छा से सरकार को सौंपता है। सरकार उस जमीन को विकसित करने के बाद उसका एक हिस्सा मूल मालिक को वापस कर देती है। विकसित हिस्से में सड़क, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाएं शामिल होती हैं। इस व्यवस्था का फायदा यह है कि जमीन मालिक को अपनी जमीन का कुछ हिस्सा विकसित रूप में वापस मिल जाता है और बाकी हिस्से पर उद्योग लगने से क्षेत्र का मूल्य बढ़ता है।
पश्चिम बंगाल में यह मॉडल उत्तर प्रदेश, हरियाणा और आंध्र प्रदेश की नीतियों के आधार पर लागू किया जाएगा। शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि विकसित जमीन का 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा मूल मालिकों को वापस दिया जाएगा। साथ ही, जिन लोगों ने अपनी जमीन दी है, उन्हें उस जमीन पर लगने वाले उद्योगों में हिस्सेदारी (शेयर) भी दी जाएगी। अधिकारियों का मानना है कि इससे किसानों को न सिर्फ जमीन का मूल्य मिलेगा बल्कि भविष्य में होने वाले लाभ में भी उनकी भागीदारी बनी रहेगी।
शुभेंदु अधिकारी ने योगी आदित्यनाथ का मॉडल क्यों चुना?
मुख्यमंत्री बनने के बाद से शुभेंदु अधिकारी लगातार निवेशकों को बंगाल लाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ द्वारा अपनाई गई रणनीति को अपनाया है। उत्तर प्रदेश में लैंड बैंक बनाने और उद्योगों को जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया गया था। बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस की सरकार जमीन के मामलों से दूर रहने की नीति अपनाती रही थी, जबकि लेफ्ट फ्रंट की सरकारें जबरन अधिग्रहण की राह पर चली थीं। दोनों नीतियों के नतीजे उद्योगों के लिए नुकसानदेह रहे।
नई सरकार इन दोनों चरम नीतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। अधिकारी ने कहा कि न तो किसानों से बंदूक की नोक पर जमीन छीनी जाएगी और न ही निवेशकों को खुद जमीन खरीदने के लिए कहा जाएगा। इसके बजाय सरकार खुद लैंड बैंक तैयार करेगी। जिन निवेशकों को तुरंत जमीन चाहिए, उनके लिए सीधे खरीद का रास्ता अपनाया जाएगा। बाकी बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए लैंड-पूलिंग का सहारा लिया जाएगा।
जमीन खरीदने और देने का नया फॉर्मूला क्या है?
नई नीति के तहत जमीन बेचने वाले किसानों को 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार मुआवजा दिया जाएगा। इस कानून के तहत बाजार मूल्य का चार गुना मुआवजा मिलता है। अगर जमीन पर मकान या अन्य संरचना है तो उसकी अलग से कीमत भी दी जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों और रेलवे परियोजनाओं के लिए इसी तरह के मुआवजे पर सैकड़ों एकड़ जमीन अधिग्रहित की जा चुकी है। इसलिए यह तरीका सुरक्षित और स्वीकार्य माना जा रहा है।
सीधे खरीद के जरिए बड़े क्षेत्रफल की जमीन एक जगह इकट्ठा करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि कुछ मालिक बेचने से इनकार कर सकते हैं। ऐसे मामलों में अच्छी कीमत देने का संकेत दिया गया है। लैंड-पूलिंग से बड़े क्षेत्र की जमीन जुटाने में समय लग सकता है, इसलिए तत्काल जरूरत वाले निवेशकों के लिए खरीद का विकल्प रखा गया है। सरकार का लक्ष्य है कि उद्योगों को एक ही स्थान पर पर्याप्त जमीन मिले ताकि प्रोजेक्ट जल्दी शुरू हो सकें।
जमीन मालिकों को कंपनी में शेयर कैसे मिलेंगे?
लैंड-पूलिंग के तहत जमीन देने वाले किसानों को न सिर्फ विकसित जमीन का हिस्सा वापस मिलेगा बल्कि उस जमीन पर लगने वाले उद्योग में शेयर भी दिए जाएंगे। शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि जमीन देने वाले लोगों को उद्योगों में हिस्सेदारी मिले। इसका मतलब है कि अगर कोई कंपनी उस जमीन पर फैक्ट्री या प्लांट लगाती है तो मूल जमीन मालिकों को उस कंपनी में कुछ इक्विटी या लाभ में हिस्सा मिल सकता है।
यह व्यवस्था किसानों को दीर्घकालिक लाभ दिलाने की कोशिश है। सिर्फ एक बार मुआवजा लेकर जमीन से अलग होने के बजाय वे उद्योग के विकास से जुड़ेंगे। अधिकारीयों के अनुसार इससे स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ेगी और विरोध की संभावना कम होगी। साथ ही, यह निवेशकों के लिए भी सुविधाजनक होगा क्योंकि जमीन मालिकों की सहमति से जमीन उपलब्ध होगी।
अप्रयुक्त लीज जमीनों का क्या होगा?
सरकार उन जमीनों को वापस लेने की प्रक्रिया भी शुरू कर रही है जिन्हें सालों पहले निवेशकों को लीज पर दिया गया था लेकिन जिन पर कोई उद्योग नहीं लगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन निवेशकों ने सालों से अपने प्लॉट का इस्तेमाल नहीं किया है, उन्हें तीन महीने के भीतर काम शुरू करना होगा या जमीन सरकार को वापस करनी होगी। सरकार उन्हें वह रकम वापस कर देगी जो उन्होंने जमीन के लिए दी थी।
यह कदम लैंड बैंक को मजबूत करने और फालतू पड़ी जमीन को नए निवेशकों के लिए उपलब्ध कराने के लिए उठाया गया है। बंगाल में कई जगहों पर सालों से लीज पर दी गई जमीनें बेकार पड़ी हैं। इन्हें वापस लेकर सरकार नए प्रोजेक्ट्स के लिए इस्तेमाल कर सकेगी। इससे पुराने समझौतों के तहत जमीन का दुरुपयोग भी रोका जा सकेगा।
नई नीति का मकसद पश्चिम बंगाल को निवेश के लिए आकर्षक बनाना है। लैंड-पूलिंग और सीधे खरीद के जरिए सरकार लैंड बैंक बनाएगी। किसानों को बेहतर मुआवजा, विकसित जमीन का हिस्सा और शेयर मिलने से उनकी सहमति मिलने की संभावना बढ़ेगी। निवेशकों को जमीन की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा। हालांकि, बड़े क्षेत्र की जमीन जुटाने में चुनौतियां आ सकती हैं। अगर यह मॉडल सफल होता है तो बंगाल में औद्योगिक विकास को नई गति मिल सकती है।
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Sanjana Gupta
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