Bihar Politics: बिहार की राजनीति में सरकार गठन के बाद अब एक और बड़ा बदलाव होता दिख रहा है। सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि विधान परिषद के सभापति की कुर्सी एक बार फिर जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू के पास जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के भीतर इस मुद्दे पर सहमति भी बन चुकी है। अगर यह बदलाव होता है, तो इसे भाजपा और जदयू के बीच सत्ता-संतुलन साधने की दिशा में बेहद अहम कदम माना जाएगा। फिलहाल विधान परिषद सभापति की जिम्मेदारी भाजपा के वरिष्ठ नेता अवधेश नारायण सिंह के पास है, लेकिन अब इस पद को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है।
Bihar Politics: भाजपा के पास पहले से हैं कई अहम पद
नई सरकार में मुख्यमंत्री पद समेत कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां पहले से ही भाजपा के पास मौजूद हैं। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष का पद भी भाजपा के खाते में है। ऐसे में विधान परिषद सभापति की कुर्सी अगर जदयू को दी जाती है, तो इसे एनडीए के भीतर राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की एक स्पष्ट कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। सदन के दो प्रमुख संवैधानिक पदों में से एक पर जदयू की मौजूदगी गठबंधन के भीतर जिम्मेदारियों के संतुलित बंटवारे का संकेत देती है।
विधान परिषद में सदस्यों की संख्या का पूरा गणित
बिहार विधान परिषद में सदस्यों की संख्या पर नजर डालें तो भाजपा के 25 और जदयू के 20 सदस्य मौजूद हैं। इसके अलावा राजद के 15, कांग्रेस के दो और सात निर्दलीय सदस्य भी परिषद में शामिल हैं। वहीं सीपीआई, सीपीएम, हम, रालोमो और लोजपा रामविलास गुट का एक-एक सदस्य भी परिषद का हिस्सा है। हालांकि विधान परिषद में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में मौजूद है, फिर भी जदयू की स्थिति भी काफी मजबूत मानी जा रही है।
विधानसभा में भी करीबी मुकाबला, इसलिए अहम है संतुलन
विधानसभा में भी भाजपा और जदयू के बीच सीटों का फासला बहुत बड़ा नहीं है। भाजपा के पास 88 विधायक हैं, जबकि जदयू के 85 विधायक सदन में मौजूद हैं। दोनों दलों की लगभग बराबर राजनीतिक ताकत को देखते हुए ही संवैधानिक पदों के बंटवारे को एनडीए गठबंधन के भीतर सत्ता-संतुलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि सभापति पद को लेकर चल रही चर्चा को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
जदयू के लिए नई नहीं है यह कुर्सी
विधान परिषद सभापति के पद पर जदयू की दावेदारी कोई नई बात नहीं है। मौजूदा सभापति अवधेश नारायण सिंह से पहले जदयू सांसद देवेश चंद्र ठाकुर करीब दो वर्षों तक इस अहम पद पर रह चुके हैं। इसके अलावा महागठबंधन सरकार के दौरान उपसभापति हारुण रशीद ने भी कार्यकारी सभापति के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। इन उदाहरणों से साफ है कि विधान परिषद की शीर्ष कुर्सी को लेकर जदयू की भूमिका अतीत में भी अहम रही है।
Bihar Politics: किसे मिलेगी जिम्मेदारी, अभी तस्वीर साफ नहीं
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सभापति का पद जदयू के हिस्से आता है, तो पार्टी अपने किस वरिष्ठ विधान पार्षद को यह जिम्मेदारी सौंपेगी। पार्टी के भीतर अनुभवी नेताओं के नामों पर मंथन चल रहा है, हालांकि इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि नई सरकार के दौर में भाजपा और जदयू के बीच सत्ता-साझेदारी का एक नया प्रारूप उभरकर सामने आ रहा है।
कुल मिलाकर बिहार विधान परिषद सभापति पद को लेकर चल रही यह चर्चा एनडीए गठबंधन के भीतर शक्ति-संतुलन की दिशा में एक बड़ा संकेत मानी जा रही है। भाजपा के पास मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष जैसे अहम पद पहले से मौजूद हैं, ऐसे में सभापति की कुर्सी जदयू को मिलना गठबंधन धर्म निभाने जैसा कदम साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि जदयू किस नेता को यह जिम्मेदारी सौंपती है, और यह फैसला बिहार की सियासत में आगे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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