सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु, गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। इसे गुरपुरब, प्रकाश उत्सव या गुरु नानक जयंती के नाम से जाना जाता है। गुरु नानक देव जी ने ऐसे समय में समानता, सच्ची मेहनत और सेवा का संदेश दिया, जब समाज जात-पात, अंधविश्वास और भेदभाव में बंटा हुआ था। उनकी शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। इस लेख में जानिए गुरु नानक देव जी का जीवन परिचय, उनकी यात्राएं, प्रमुख शिक्षाएं और गुरपुरब कैसे मनाया जाता है।
Guru Nanak Jayanti: गुरु नानक देव जी का जीवन, उदासियां और तीन अमर शिक्षाएं, जानें गुरपुरब का महत्व
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी के जीवन, यात्राओं, नाम जपना-किरत करनी-वंड छकना की शिक्षाओं और गुरपुरब मनाने की परंपरा के बारे में विस्तार से जानें।
मुख्य बातें
- गुरु नानक देव जी का जन्म और प्रारंभिक जीवन
- सुल्तानपुर लोधी और आध्यात्मिक जागरण
- उदासियां: ज्ञान और संदेश की लंबी यात्राएं
- गुरु नानक देव जी की तीन प्रमुख शिक्षाएं

गुरु नानक देव जी का जन्म और प्रारंभिक जीवन
गुरु नानक देव जी का जन्म सन 1469 में राय भोई की तलवंडी नामक गांव में हुआ था, जो आज पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ननकाना साहिब के नाम से प्रसिद्ध है। उनके पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता था। उनकी बड़ी बहन बेबे नानकी थीं, जिन्हें गुरु नानक जी के आध्यात्मिक स्वरूप को सबसे पहले पहचानने वालों में माना जाता है।
बचपन से ही नानक जी का मन सांसारिक बातों से अधिक ईश्वर-चिंतन में लगता था। जनमसाखियों (गुरु जी के जीवन से जुड़ी पारंपरिक कथाओं) में बताया गया है कि वे अपने शिक्षकों से गहरे आध्यात्मिक प्रश्न पूछते थे। एक प्रसिद्ध प्रसंग “सच्चा सौदा” का है, जिसमें पिता ने उन्हें व्यापार के लिए पैसे दिए और उन्होंने उन पैसों से भूखे साधुओं को भोजन करा दिया। उन्होंने इसे ही सबसे सच्चा व्यापार बताया।
सुल्तानपुर लोधी और आध्यात्मिक जागरण
युवावस्था में गुरु नानक जी अपनी बहन बेबे नानकी के पास सुल्तानपुर लोधी (वर्तमान पंजाब, भारत) चले गए, जहां उन्होंने एक मोदीखाने (अनाज भंडार) में काम किया। परंपरा के अनुसार, यहीं वेईं नदी में स्नान के दौरान उन्हें आध्यात्मिक अनुभव हुआ। इसके बाद उन्होंने कहा, “ना कोई हिंदू, ना मुसलमान”, यानी ईश्वर की नजर में सभी इंसान एक समान हैं। यह वाक्य उनके पूरे जीवन दर्शन का आधार बना।
उदासियां: ज्ञान और संदेश की लंबी यात्राएं
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के कई वर्ष लंबी यात्राओं में बिताए, जिन्हें “उदासियां” कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, उन्होंने चार प्रमुख दिशाओं में यात्राएं कीं। इन यात्राओं में उनके साथी भाई मरदाना थे, जो रबाब बजाते थे और गुरु जी की वाणी को संगीत के साथ गाया जाता था।
इन यात्राओं के दौरान वे अनेक धार्मिक स्थलों पर गए, विभिन्न मतों के विद्वानों, संतों और आम लोगों से संवाद किया। माना जाता है कि वे पूर्व में असम तक, दक्षिण में श्रीलंका तक, उत्तर में हिमालय क्षेत्र तक और पश्चिम में मक्का-बगदाद तक गए। हर जगह उन्होंने कर्मकांड की जगह सच्चे मन से ईश्वर को याद करने और मानवता की सेवा करने का संदेश दिया।
गुरु नानक देव जी की तीन प्रमुख शिक्षाएं
सिख परंपरा में गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं को तीन मूल सिद्धांतों में समझाया जाता है:
1. नाम जपना
ईश्वर का नाम सच्चे मन से याद करना और ध्यान करना। गुरु जी ने बताया कि ईश्वर एक है, जिसे उन्होंने “इक ओंकार” कहा।
2. किरत करनी
ईमानदारी और मेहनत से अपनी रोजी-रोटी कमाना। गुरु जी ने भिक्षा या दूसरों पर निर्भर रहने की बजाय परिश्रम को महत्व दिया।
3. वंड छकना
अपनी कमाई का हिस्सा जरूरतमंदों के साथ बांटना। यही विचार आगे चलकर लंगर और सेवा की परंपरा का आधार बना।
लंगर और समानता का संदेश
गुरु नानक देव जी ने लंगर की परंपरा को बढ़ावा दिया, जिसमें सभी लोग, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति के हों, एक साथ पंगत में बैठकर भोजन करते हैं। यह उस समय के समाज में एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने महिलाओं के सम्मान पर भी जोर दिया। आज दुनिया भर के गुरुद्वारों में लंगर की यह परंपरा जारी है और रोज लाखों लोग इसका लाभ लेते हैं।
करतारपुर: जीवन का अंतिम पड़ाव
अपनी यात्राओं के बाद गुरु नानक देव जी रावी नदी के किनारे करतारपुर में बस गए, जो आज पाकिस्तान में है। यहां उन्होंने स्वयं खेती की और एक ऐसा समुदाय बनाया, जहां लोग मिलकर काम करते, कीर्तन करते और लंगर में साथ भोजन करते थे। सन 1539 में करतारपुर में ही वे ज्योति-जोत समाए। उन्होंने अपने शिष्य भाई लहणा को उत्तराधिकारी चुना, जो गुरु अंगद देव जी के नाम से सिखों के दूसरे गुरु बने।
भारत और पाकिस्तान के बीच बना करतारपुर कॉरिडोर नवंबर 2019 में गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के अवसर पर खोला गया था, जिससे भारतीय श्रद्धालु गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर के दर्शन कर सकें।
गुरु नानक देव जी की वाणी
गुरु नानक देव जी की रचनाएं श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। इनमें “जपुजी साहिब” सबसे प्रसिद्ध है, जिसका पाठ सिख श्रद्धालु प्रतिदिन सुबह करते हैं। उनकी वाणी पंजाबी भाषा में गुरमुखी लिपि में दर्ज है और अलग-अलग रागों में गाई जाती है।
गुरपुरब कैसे मनाया जाता है
- अखंड पाठ: गुरपुरब से दो दिन पहले गुरुद्वारों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब का लगातार 48 घंटे का पाठ शुरू होता है।
- नगर कीर्तन: एक दिन पहले पंज प्यारों की अगुवाई में शोभायात्रा निकाली जाती है।
- प्रभात फेरी: सुबह-सुबह संगत भजन-कीर्तन करते हुए मोहल्लों में घूमती है।
- कीर्तन और लंगर: गुरपुरब के दिन गुरुद्वारों में कीर्तन, कथा और विशाल लंगर का आयोजन होता है।
- दीपमाला: शाम को गुरुद्वारों और घरों को दीयों और रोशनी से सजाया जाता है।
आज के समय में गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं की प्रासंगिकता
आज जब समाज में तनाव, प्रतिस्पर्धा और भेदभाव की खबरें आम हैं, गुरु नानक देव जी का संदेश हमें सरल जीवन, ईमानदार कमाई और दूसरों की मदद करने की प्रेरणा देता है। उनकी शिक्षाएं किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी मानवता के लिए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
गुरु नानक देव जी का जन्म कहां हुआ था?
उनका जन्म 1469 में राय भोई की तलवंडी में हुआ था, जिसे आज ननकाना साहिब (पाकिस्तान) कहा जाता है।
गुरु नानक जयंती किस दिन मनाई जाती है?
यह पर्व हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।
गुरु नानक देव जी की तीन मुख्य शिक्षाएं क्या हैं?
नाम जपना, किरत करनी और वंड छकना।
सिखों के दूसरे गुरु कौन थे?
गुरु अंगद देव जी, जिन्हें गुरु नानक देव जी ने स्वयं अपना उत्तराधिकारी चुना था।

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कवरेज: Sudhanshu Tiwari, News Media Kiran
