Shimla: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी के गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी के खिलाफ दायर पति की आपराधिक समीक्षा याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल उम्रदराज होने या वृद्धावस्था पेंशन पर निर्भर रहने से पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता।
मामले में 78 वर्षीय पति को फैमिली कोर्ट सरकाघाट ने पत्नी को दिए जा रहे मासिक गुजारा भत्ते को 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये प्रति माह करने का आदेश दिया था। पति ने इस फैसले को चुनौती देते हुए अपनी उम्र और सीमित आय का हवाला दिया था। हाईकोर्ट ने उसकी दलील को स्वीकार नहीं किया।
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 2010 में तय किए गए 1,500 रुपये के गुजारा भत्ते को करीब 15 साल बाद बढ़ाकर 3,500 रुपये करना किसी भी दृष्टि से अत्यधिक नहीं है। अदालत ने महंगाई और बढ़ते जीवन-यापन के खर्चों को ध्यान में रखते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को तर्कसंगत ठहराया।
संपत्ति और वाहनों का भी सामने आया जिक्र
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी की थी। दूसरी पत्नी के बेटों के नाम पर संपत्ति और जमीन दर्ज होने की बात भी सामने आई। इसके अलावा पत्नी ने जिरह के दौरान पति के पास गाड़ियों और ट्रकों के होने का बयान दिया था, जिसे पति की ओर से चुनौती नहीं दी गई।
अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि मौजूदा समय में एक वृद्ध महिला के लिए 3,500 रुपये गुजारा भत्ता और 1,500 रुपये सामाजिक पेंशन से जीवन-यापन करना कितना मुश्किल होगा, यह विचारणीय है।
हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए पति की समीक्षा याचिका खारिज कर दी और गुजारा भत्ते में की गई बढ़ोतरी को बरकरार रखा।

