India Thermal Power Coal Crisis 2026: देश की बिजली व्यवस्था इस समय एक ऐसी चुनौती से गुजर रही है, जिस पर आम आदमी की नजर भले ही सीधे न हो, लेकिन इसका असर हर घर तक पहुंच सकता है। दरअसल देशभर के थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का भंडार तय मानक से आधे से भी कम रह गया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण यानी सीईए के आंकड़ों के मुताबिक, 2 सितंबर तक देश के 50 पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक क्रिटिकल यानी गंभीर स्तर तक पहुंच चुका है। सवाल यह है कि क्या इसका असर आने वाले दिनों में बिजली आपूर्ति पर भी दिखेगा।
बिजली की भारी मांग और मानसून के दौरान आई रुकावटों को इस संकट की मुख्य वजह बताया जा रहा है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं, लेकिन आंकड़े जिस तरह की तस्वीर पेश कर रहे हैं, वह चिंता बढ़ाने के लिए काफी है।
India Thermal Power Coal Crisis 2026: आखिर कितना बचा है कोयले का स्टॉक
सीईए के आंकड़ों के अनुसार लगभग 224 गीगावाट की संयुक्त क्षमता वाले संयंत्रों के पास बुधवार तक 28.2 मिलियन टन कोयला मौजूद था। यह आंकड़ा 58.7 मिलियन टन की निर्धारित जरूरत का महज 48 प्रतिशत ही है, यानी करीब आधा स्टॉक। 85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर के हिसाब से यह उपलब्ध कोयला सिर्फ 9 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है।
यह बात इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि सामान्य स्थिति में किसी भी पावर प्लांट के पास कम से कम 19 दिनों का बैकअप स्टॉक होना चाहिए। यानी मौजूदा हालात में देश के थर्मल प्लांट्स आधे से भी कम सुरक्षित मार्जिन पर काम कर रहे हैं। जानकार बताते हैं कि इतने कम स्टॉक के साथ चलना किसी भी बिजली उत्पादन प्रणाली के लिए जोखिम भरा माना जाता है।
किन प्लांट्स को माना जाता है क्रिटिकल
नियमों के मुताबिक जिन पावर प्लांट्स के पास निर्धारित मानक का 25 प्रतिशत से भी कम कोयला बचता है, उन्हें क्रिटिकल श्रेणी में रखा जाता है। मौजूदा समय में गंभीर कमी झेल रहे इन 50 संयंत्रों में से 45 प्लांट घरेलू कोयले पर निर्भर हैं, जबकि 4 प्लांट आयातित कोयले से चलते हैं। इसके अलावा एक संयंत्र ऐसा भी है, जो कोयला धुलाई के अवशेष पर काम कर रहा है।
देखने पर लगता है कि घरेलू कोयले पर निर्भर प्लांट्स की संख्या ज्यादा होने की वजह से घरेलू आपूर्ति चेन में आई रुकावट का असर सबसे ज्यादा इन्हीं पर पड़ा है। यह आंकड़ा इस बात का भी संकेत है कि देश की बिजली उत्पादन व्यवस्था अब भी घरेलू कोयले पर काफी हद तक निर्भर है।
मंत्रालय ने दी सफाई, कहा- सप्लाई बंद नहीं हुई
इतने बड़े आंकड़े सामने आने के बाद कोयला मंत्रालय के अधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। मंत्रालय के मुताबिक सभी संवेदनशील संयंत्रों की एक अंतर-मंत्रालयी टीम रोजाना निगरानी कर रही है और उन्हें लगातार ईंधन भेजा जा रहा है।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ किया कि सीईए के नियमों के तहत किसी प्लांट को क्रिटिकल घोषित करना एक नियमित निगरानी प्रक्रिया का ही हिस्सा है। उनका कहना है कि इसका मतलब सिर्फ इतना है कि उन प्लांट्स पर पैनी नजर रखी जाए और प्राथमिकता के आधार पर जरूरी कार्रवाई की जाए। मामला कुछ इस तरह से है कि अधिकारियों के मुताबिक इन संयंत्रों में कोयले की सप्लाई पूरी तरह बंद नहीं हो रही, बल्कि उस पर करीबी नजर रखी जा रही है।
मानसून बना कोयला संकट की बड़ी वजह
अधिकारियों के अनुसार 85 प्रतिशत पीएलएफ पर संयंत्रों की मानक जरूरत रोजाना 3.1 मिलियन टन कोयले की आंकी जाती है, जबकि वास्तविक दैनिक खपत करीब 2.4 मिलियन टन है। यह अंतर बताता है कि मांग और उपलब्धता के बीच पहले से ही एक गैप बना हुआ है।
हर साल मानसून के दौरान खदानों और परिवहन व्यवस्था में रुकावट आने से कोयला आपूर्ति प्रभावित होती रही है, और इस बार भी वही पैटर्न देखने को मिल रहा है। हालांकि राहत की बात यह है कि सितंबर से बारिश कम होने लगती है, जिसके साथ ही आमतौर पर हालात में सुधार आना शुरू हो जाता है।
मेंटेनेंस टालने के मिले निर्देश
बिजली उत्पादन में किसी तरह की रुकावट न आए, इसके लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि इस मामले पर विद्युत मंत्रालय की तरफ से अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक कुछ कोयला संयंत्रों को अपने नियमित मेंटेनेंस के काम को फिलहाल टालने के निर्देश दिए गए हैं।
यह कदम इस बात का संकेत है कि सरकार बिजली आपूर्ति को बाधित होने से बचाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। जानकार बताते हैं कि मेंटेनेंस टालने से अल्पकालिक राहत तो मिल सकती है, लेकिन लंबे समय में यह प्लांट्स की क्षमता पर असर डाल सकता है, इसलिए इसे सिर्फ अस्थायी उपाय के तौर पर देखा जाना चाहिए।
India Thermal Power Coal Crisis 2026: आम लोगों पर क्या पड़ सकता है असर
कोयला संकट सीधे तौर पर बिजली उत्पादन से जुड़ा मामला है, इसलिए इसका असर आम आदमी की जिंदगी पर भी पड़ सकता है। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो कुछ इलाकों में बिजली कटौती जैसी समस्या सामने आ सकती है, खासकर उन राज्यों में जहां घरेलू कोयले पर निर्भर प्लांट्स की संख्या ज्यादा है।
हालांकि फिलहाल अधिकारियों का दावा है कि हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं और सप्लाई चेन को बनाए रखने के लिए लगातार कोशिशें जारी हैं। फिर भी जिस तरह से 50 संयंत्र क्रिटिकल श्रेणी में पहुंच चुके हैं, उसे हल्के में लेना सही नहीं होगा।
कुल मिलाकर देखा जाए तो देश के थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले की यह कमी मानसून के असर और बढ़ती बिजली मांग का नतीजा है। सरकार और संबंधित मंत्रालय स्थिति को नियंत्रण में बताते हुए लगातार निगरानी और सप्लाई जारी रखने का दावा कर रहे हैं। हालांकि सितंबर में बारिश कम होने के साथ हालात में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है। फिलहाल आने वाले कुछ हफ्ते इस मामले में काफी अहम साबित होंगे, क्योंकि इसी दौरान यह साफ होगा कि कोयला संकट टलता है या और गहराता है।
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Sanjana Gupta
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