Bhadrapada Purnima 2026: 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध होगा और 27 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू होगा। जानें श्राद्ध मुहूर्त और किन कामों से बचने की मान्यता है।मिथिला, महावीर और द्रिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि 26 सितंबर को है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसी दिन से पितृ पक्ष का आरंभ होता है। इस दिन ऋषि तर्पण का विधान बताया गया है। मुख्य रूप से अगस्त्य ऋषि का तर्पण किया जाता है।
पूर्णिमा तिथि में जिन पूर्वजों की मृत्यु हुई उनके लिए भी श्राद्ध यानी तर्पण और पिंडदान किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा पर कुछ कार्यों से बचने की सलाह धार्मिक मान्यताओं में दी गई है ताकि पितर प्रसन्न रहें।
भाद्रपद पूर्णिमा पर तामसिक भोजन और नशे से क्यों बचें?
भाद्रपद पूर्णिमा यानी 26 सितंबर को पितृ पक्ष शुरू हो रहा है। मान्यता के अनुसार इस दिन तामसिक पदार्थ जैसे प्याज, लहसुन, मांस, मछली और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए। अन्य नशीले पदार्थों से भी दूरी रखने को कहा गया है।
धार्मिक परंपरा में इन चीजों का सेवन इस दिन शुभ नहीं माना जाता। पितृ पक्ष के आरंभ पर सात्विक रहन-सहन पर जोर दिया जाता है। कई परिवार इस दिन से ही भोजन में बदलाव कर देते हैं।
नशे और तामसिक भोजन से दूर रहने की सलाह पूर्वजों को याद करने के भाव से जुड़ी है। जो लोग श्राद्ध करते हैं वे इस नियम का विशेष ध्यान रखते हैं।
क्रोध और बड़े-बुजुर्गों के अनादर से कैसे बचें?
मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन क्रोध करने से पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसलिए भाद्रपद पूर्णिमा पर किसी पर गुस्सा नहीं करना चाहिए और लड़ाई झगड़ा भी नहीं करना चाहिए।
परिवार के बड़े-बुजुर्गों का अपमान गलती से भी नहीं करना चाहिए। पितृ पक्ष में पूर्वजों का सम्मान और परिवार में शांति बनाए रखने पर जोर दिया जाता है। क्रोध और अनादर को अशुभ माना गया है।
घर में शांत माहौल रखना इस दिन की प्रमुख सलाहों में शामिल है। बड़े-बुजुर्गों की सेवा और आदर पितरों को प्रसन्न करने से जोड़ा जाता है।
मांगलिक कार्य और नई खरीदारी क्यों न करें?
भादो मास की पूर्णिमा से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है इसलिए इस दिन शादी, विवाह, मुंडन, उपनयन जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। ऐसे काम का आरंभ शुभ नहीं माना गया है।
नए वस्त्रों की खरीदारी से भी परहेज करने की सलाह है। धार्मिक परंपरा के अनुसार पितृ पक्ष के आरंभ पर नया कपड़ा खरीदना अशुभ माना जाता है। मांगलिक समारोह आमतौर पर पितृ पक्ष के बाद रखे जाते हैं।
जो परिवार श्राद्ध करते हैं वे इस अवधि में नए काम शुरू करने से बचते हैं। परंपरा के अनुसार यह समय पूर्वजों के लिए समर्पित माना जाता है।
घर आए व्यक्ति को खाली हाथ क्यों न लौटाएं?
भाद्रपद पूर्णिमा के दिन घर आए किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए। गरीब, लाचार या बीमार लोगों को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा करने से पूर्वज नाराज होते हैं।
दान और अतिथि सत्कार इस दिन की मान्यताओं से जुड़ा है। जो द्वार पर आए उसे कुछ न कुछ देकर विदा करने की परंपरा बताई गई है। पितृ पक्ष में दया और सहयोग पर विशेष ध्यान देने को कहा जाता है।
यह नियम घर की दहलीज पर आए हर व्यक्ति पर लागू करने की सलाह दी जाती है ताकि पुण्य बना रहे।
भाद्रपद पूर्णिमा पर श्राद्ध का मुहूर्त क्या है?
पंचांग के अनुसार पूर्णिमा श्राद्ध यानी तर्पण और पिंडदान के लिए कुतुप मुहूर्त सुबह 11 बजकर 30 मिनट से 12 बजकर 18 मिनट तक है। रौहिण मुहूर्त 12 बजकर 18 मिनट से 1 बजकर 06 मिनट तक रहेगा।
अपराह्न काल मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 06 मिनट से 3 बजकर 30 मिनट तक बताया गया है। स्थानीय समय के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए अपने शहर के पंचांग से पुष्टि कर लेना बेहतर रहता है।
पूर्णिमा तिथि वाले पूर्वजों का श्राद्ध इसी दिन किया जाता है। अगस्त्य ऋषि का तर्पण भी इसी दिन का विशेष विधान है। जो लोग पितृ पक्ष की शुरुआत से ही नियम अपनाना चाहते हैं वे इन मुहूर्तों का ध्यान रख सकते हैं।
भाद्रपद पूर्णिमा पितृ पक्ष का पहला दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन सात्विक आचरण, क्रोध से दूरी, मांगलिक कार्यों से परहेज और दान पर जोर दिया गया है। जो परिवार श्राद्ध करते हैं वे तर्पण और पिंडदान के मुहूर्त का पालन करते हैं। ये सलाहें परंपरा और पंचांग पर आधारित हैं। स्थानीय रीति और पुरोहित की सलाह के अनुसार काम करने वाले लोग इन बातों का ध्यान रखते हैं।
News Desk Declaration / Disclaimer
घोषणा: इस खबर में दी गई पूजा तिथि, मुहूर्त और धार्मिक नियम पंचांग एवं प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। पूजा के मुहूर्त में शहर और स्थान के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। पाठकों से अनुरोध है कि पूजा-अनुष्ठान से जुड़ी किसी भी विशेष जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य से पुष्टि करें। News Media Kiran किसी धार्मिक मान्यता को व्यक्तिगत या वैज्ञानिक सलाह के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।
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