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MP News : जीएसटी धोखाधड़ी नोटिस अब सबूत के बिना नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दी व्यापारियों को राहत

MP News : सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णयों के बाद जीएसटी अधिकारी अब अपनी मर्जी से व्यापारियों को धोखाधड़ी या जानबूझकर टैक्स चोरी का नोटिस नहीं दे सकते। विभाग को नोटिस में ही धोखाधड़ी के तथ्य स्पष्ट रूप से बताने होंगे। धारा 73 और 74 के मनमाने इस्तेमाल पर रोक लग गई है। सिर्फ ऑडिट टिप्पणी के आधार पर जारी सैकड़ों पुराने नोटिस निरस्त होने के आसार हैं। व्यापारियों को मोटी पेनाल्टी से भी राहत मिल सकती है। इंदौर समेत कई क्षेत्रों में ऐसे नोटिसों को लेकर व्यापारी संगठन पहले ही ज्ञापन सौंप चुके थे। कर सलाहकारों के अनुसार अब हर नोटिस की वैधानिकता चुनौती दी जा सकती है।

MP News : धारा 73 और 74 में क्या है फर्क

जीएसटी में धारा 73 तब लागू होती है जब करदाता गलती से कम टैक्स चुकाता है या इनपुट टैक्स क्रेडिट में कोई भूल हो जाती है। इसमें अधिकतम तीन साल तक कार्रवाई का अधिकार विभाग के पास होता है। इसके विपरीत धारा 74 जानबूझकर कर चोरी या धोखाधड़ी के मामलों में लगती है। यहां पेनाल्टी ज्यादा होती है और अधिकारी को पांच साल तक कार्रवाई का समय मिल जाता है। लंबे समय से धारा 74 के दुरुपयोग पर कर जगत में चर्चा चल रही थी।

ऑडिट टिप्पणी पर धारा 74 का गलत इस्तेमाल

कई मामलों में ऑडिट या खातों की जांच में छोटी त्रुटि पकड़ में आने पर अधिकारी उसे धोखाधड़ी बताकर धारा 74 का नोटिस जारी कर देते थे। मकसद सिर्फ समय सीमा बढ़ाने का रहता था। तीन साल की मियाद खत्म होने के बाद पांच साल का लाभ लेने के लिए धारा 74 का सहारा लिया जाता था। इससे व्यापारियों पर अनावश्यक दबाव और भारी पेनाल्टी का खतरा बढ़ जाता था।

MP News : टाटा स्टील मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

एक मामले में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने टाटा स्टील की इनपुट टैक्स क्रेडिट में त्रुटियां पकड़ी थीं। विभाग ने इस पर धारा 74 का नोटिस जारी कर दिया। कोर्ट में विभाग ने माना कि पुराना प्रकरण होने और तीन साल की सीमा बीत जाने के कारण धारा 74 का इस्तेमाल किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ समय सीमा का लाभ लेने के लिए धारा 74 का प्रयोग अवैध है।

जीआर इंफ्रा मामले में भी सख्ती

दूसरे मामले में जीएसटी विभाग ने जीआर इंफ्रा को धारा 74 का नोटिस दिया था। नोटिस में यह स्पष्ट नहीं था कि कारोबारी ने कहां धोखाधड़ी की। कोर्ट के पूछने पर विभाग ने बाद में हलफनामा दाखिल कर बिंदु स्पष्ट किए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी अमान्य कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि प्रारंभिक नोटिस में ही धोखाधड़ी के तथ्य स्पष्ट लिखे जाने चाहिए।

नोटिस में क्या-क्या साफ लिखना होगा

अब यदि धारा 74 लगाई जाती है तो विभाग को नोटिस में ही बताना होगा कि किन बिंदुओं पर धोखाधड़ी साबित हो रही है। हर इनवॉइस एंट्री और इनपुट टैक्स क्रेडिट की जानकारी स्पष्ट रूप से उल्लेखित होनी चाहिए। सिर्फ नोटिस देकर बाद में आरोप साबित करने की परंपरा को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। इससे मनमाने नोटिसों पर रोक लगेगी।

MP News : व्यापारियों को कैसे मिलेगी राहत

चार्टर्ड अकाउंटेंट अनुज गुप्ता के अनुसार अब हर व्यापारी को अपने नोटिस का पूरा विश्लेषण करना चाहिए। यदि नोटिस में आरोप और तथ्य स्पष्ट नहीं हैं तो उसकी वैधानिकता को चुनौती दी जा सकती है। इंदौर क्षेत्र में ही सैकड़ों व्यापारियों को ऑडिट बिंदुओं के आधार पर धारा 74 के नोटिस मिले थे। कर सलाहकार और व्यापारी संगठन लंबे समय से इसके दुरुपयोग पर चिंता जता रहे थे।

पुराने मामलों पर असर

सुप्रीम कोर्ट के इन दो फैसलों से बीते दिनों में जारी कई नोटिस प्रभावित होंगे। जो नोटिस सिर्फ समय सीमा बढ़ाने या बिना सबूत के जारी किए गए थे वे निरस्त होने की कतार में आ सकते हैं। व्यापारियों को भारी पेनाल्टी और लंबी कानूनी प्रक्रिया से राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। कर सलाहकार आरएस गोयल ने भी इन निर्णयों को महत्वपूर्ण बताया है।

MP News : विभाग की जिम्मेदारी बढ़ी

अब अधिकारियों को धारा 74 लगाने से पहले ठोस सबूत जुटाने होंगे। नोटिस जारी करते समय ही धोखाधड़ी के सभी बिंदु स्पष्ट करने होंगे। इससे विभाग की जवाबदेही बढ़ेगी और व्यापारियों पर अनावश्यक दबाव कम होगा। जीएसटी व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता की दिशा में यह बड़ा कदम माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसलों ने जीएसटी धारा 74 के मनमाने इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। अब अधिकारी बिना स्पष्ट सबूत के धोखाधड़ी का नोटिस नहीं दे सकते। टाटा स्टील और जीआर इंफ्रा मामलों में दिए गए निर्णयों से पुराने सैकड़ों नोटिस चुनौती के दायरे में आ गए हैं। व्यापारियों को पेनाल्टी और लंबी कार्रवाई से राहत मिलने की संभावना है। हर नोटिस में आरोप और तथ्य स्पष्ट होने चाहिए। कर विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि व्यापारी अपने नोटिस की अच्छी तरह जांच करें और जरूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता अपनाएं। यह फैसला पूरे कर जगत के लिए राहत भरा साबित हो सकता है।

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Netsha Singh
Author: Netsha Singh

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