यह उपचुनाव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि विजयी दल आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के नेता हुमायूं कबीर के बेटे गुलाम नबी आजाद मैदान में हैं, लेकिन पिता-पुत्र दोनों प्रचार से लगभग गायब हैं। कबीर का कहना है कि पार्टी सिर्फ ऑनलाइन और सोशल मीडिया पर प्रचार करेगी। विपक्षी खेमे में कांग्रेस, भाकपा (मार्क्सवादी) और तृणमूल कांग्रेस के दो गुटों के उम्मीदवार भी हैं। सभी ने मुस्लिम समुदाय से प्रत्याशी उतारे हैं। स्थानीय भाजपा नेता इसे हिंदू वोट एकजुट रखने और मुस्लिम वोट बंटने का मौका बता रहे हैं।
सामिक भट्टाचार्य ने रेजीनगर रैली में क्या कहा?
सामिक भट्टाचार्य ने रेजीनगर की रैली में कहा कि पश्चिम बंगाल में उनकी सरकार पिछले छह महीनों से है और इस दौरान एक भी दंगा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि यह बाबरी मस्जिद और राम मंदिर का मुद्दा उठाने का समय नहीं है। अगले 20 वर्षों तक केंद्र और राज्य दोनों जगह उनकी ही सरकार रहेगी, इसलिए लोगों को उनके साथ रहना होगा और चुनना होगा। यह बयान ऐसे इलाके में दिया गया जहां अप्रैल के चुनाव में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति बनाने की बात चुनावी चर्चा का केंद्र बनी थी। भट्टाचार्य की अपील सीधे मुस्लिम श्रोताओं से थी। पार्टी सूत्रों के अनुसार, घर-घर संपर्क भी इसी दिशा में चल रहा है। शुभेंदु अधिकारी की भूमिका को भी इसी अभियान से जोड़ा जा रहा है, हालांकि उनके अलग उद्धरण इस रिपोर्ट के आधार सामग्री में विस्तार से नहीं हैं।
बाबरी का जिक्र भाजपा ने क्यों किया?
प्रदेश अध्यक्ष द्वारा बाबरी मस्जिद का नाम जानबूझकर लिया गया, ऐसा ही आकलन स्थानीय राजनीतिक चर्चा में है। अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में रेजीनगर से AJUP के हुमायूं कबीर विजयी हुए थे। उन्हें 51.62 प्रतिशत वोट मिले। भाजपा उस मुकाबले में कबीर की तुलना में लगभग आधी पर सिमट गई थी। तृणमूल कांग्रेस को सिर्फ 17.43 प्रतिशत वोट मिला था। कबीर ने उसी इलाके में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति बनाने की नींव रखी थी। उस प्रतीकात्मक कदम ने मुस्लिम बहुल इलाके में उनकी पहचान को तीखा बना दिया था। उपचुनाव में भाजपा उसी प्रतीक को पीछे धकेलकर विकास, कानून-व्यवस्था और दंगे न होने का तर्क रख रही है। यह लाइन पार्टी की राष्ट्रीय छवि से अलग स्थानीय समायोजन मानी जा रही है।
हुमायूं कबीर और उनके बेटे प्रचार से क्यों दूर हैं?
रेजीनगर उपचुनाव में AJUP के टिकट पर कबीर के बेटे गुलाम नबी आजाद उम्मीदवार हैं। वे मैदान में कम दिखते हैं। कबीर का बयान है कि पार्टी ऑनलाइन और सोशल मीडिया तक ही प्रचार सीमित रखेगी। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के हवाले से कबीर कहते हैं कि उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर किया जा रहा है। वे अपनी पुरानी आक्रामक छवि से अलग और शांत दिख रहे हैं। उनके अनुसार, उनके खिलाफ नए मामले दर्ज हुए हैं और पार्टी नेताओं पर पुराने मामले फिर खोले गए। इनमें से 24 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। 12 को जमानत मिल गई, लेकिन पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए बुलाती रही और समर्थकों को परेशान करती रही। इसी वजह से उन्होंने फैसला किया कि न बेटा प्रचार करेगा और न वे खुद। ये दावे कबीर के हैं। पुलिस या प्रशासन की तरफ से इस रिपोर्ट के स्रोत में कोई आधिकारिक सफाई शामिल नहीं है।
कबीर को जीत का भरोसा क्यों है और टीएमसी क्या कह रही है?
कबीर अन्य उम्मीदवारों को लेकर चिंतित नहीं दिखते। उनका कहना है कि असली मुकाबला सीधे भाजपा और उनके बीच है। यदि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र हुए तो बेटा जीतेगा और बाकी पार्टियों की जमानत जब्त होगी। वे भाजपा पर मुस्लिम वोट बांटने और हिंदुओं को एकजुट करने का आरोप लगाते हैं, लेकिन मानते हैं कि निष्पक्ष मतदान से पता चल जाएगा कि लोग उनके साथ हैं। तृणमूल कांग्रेस ने रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। चौधरी ममता बनर्जी को अपना ट्रंप कार्ड बताते हैं। उनका तर्क है कि इस वोट से सरकार नहीं बदलेगी, लेकिन अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए अपने मुद्दे रखने का मौका है। वे कबीर पर सांप्रदायिक राजनीति कर भाजपा का दूसरा चेहरा बनने का आरोप भी लगाते हैं। कांग्रेस और वाम दल भी मुस्लिम प्रत्याशियों के साथ मैदान में हैं, जिससे वोट बंटने की संभावना सभी खेमे मान रहे हैं।
भाजपा को रेजीनगर में जीत का आधार क्या दिख रहा है?
भाजपा के एक स्थानीय नेता के अनुसार यह चुनाव पार्टी के लिए निर्णायक है। इलाके में पहले से हिंदू वोट बैंक मजबूत बताया जाता है। अब कार्यकर्ता मुस्लिम घरों में भी बात कर रहे हैं। नेता का कहना है कि अगर जीत हुई तो इतिहास बनेगा, क्योंकि यहां मुस्लिम वोट पहले कभी नहीं मिला। उन्हें यह भी लाभ दिखता है कि बाकी प्रमुख उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से हैं, जिससे मुस्लिम वोट एकजुट नहीं हो पाएगा। अप्रैल में कबीर को मिले 51.62 प्रतिशत और टीएमसी के 17.43 प्रतिशत के आंकड़े इस बार के समीकरण को जटिल बनाते हैं। कबीर के मैदान से हटने से खाली जगह किसके पक्ष में जाती है, यह मतदान और मतगणना के बाद ही साफ होगा। उपचुनाव का नतीजा पूरे बंगाल में मुस्लिम बहुल सीटों की रणनीति पर असर डाल सकता है, लेकिन अभी यह दावा अनुमान है, परिणाम नहीं।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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