Jharkhand Health System: झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले से एक रूह कंपा देने वाली घटना सामने आई है जिसने राज्य की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। जिले के राजनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बिजली न होने के कारण डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने कथित तौर पर मोबाइल फोन की टॉर्च जलाकर एक महिला का प्रसव कराया। इस प्रक्रिया के दौरान हुई लापरवाही ने न केवल एक नवजात की जान ले ली बल्कि प्रसूता ने भी दम तोड़ दिया। इस हृदयविदारक घटना के बाद पूरे जिले में आक्रोश व्याप्त है और प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।
Jharkhand Health System: अस्पताल की घोर लापरवाही और अंधेरे में जिंदगी का सौदा
राजनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई यह घटना आधुनिक युग में चिकित्सा तंत्र पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। बताया जा रहा है कि गुरुवार की शाम जब एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के साथ अस्पताल लाया गया तो उस समय बाहर तेज आंधी और बारिश हो रही थी। खराब मौसम के कारण अस्पताल की सरकारी बिजली आपूर्ति ठप हो गई थी। नियमानुसार ऐसी स्थिति में अस्पताल के वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे जनरेटर, सोलर पावर या इन्वर्टर का उपयोग किया जाना चाहिए था लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से एक भी उपकरण काम नहीं कर रहा था। अस्पताल प्रशासन ने अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए मोबाइल की टॉर्च का सहारा लिया जो मां और बच्चे के लिए काल बन गया।
मृतक महिला के पति दुर्गा चरण बनरा ने भारी मन से अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी पिछली दोनों बेटियों का जन्म सामान्य प्रसव से हुआ था और वे स्वस्थ हैं। इस बार उन्हें बेटे के रूप में खुशी मिलने वाली थी लेकिन डॉक्टरों और नर्सों की संवेदनहीनता ने उनका पूरा संसार उजाड़ दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि अस्पताल में रोशनी की सही व्यवस्था होती और डॉक्टरों ने तत्परता दिखाई होती तो आज उनकी पत्नी और बच्चा उनके साथ होते। पीड़ित पति ने अब दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है ताकि किसी और परिवार को ऐसा दुख न झेलना पड़े।
प्रशासन का सख्त रुख और जांच समिति का गठन
मामले के तूल पकड़ने के बाद सरायकेला-खरसावां के डिप्टी कमिश्नर नीतीश कुमार सिंह ने तत्काल संज्ञान लिया है। उन्होंने इस घटना को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और गंभीर माना है। उपायुक्त के निर्देश पर सरायकेला के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट यानी एसडीएम अभिनव प्रकाश के नेतृत्व में तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम का गठन किया गया है। इस टीम में सिविल सर्जन डॉ. सरयू प्रसाद सिंह और सदर अस्पताल के वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवलाल कुंकल को शामिल किया गया है। यह समिति प्रसव के दौरान अपनाई गई चिकित्सा पद्धति, बिजली कटौती के कारणों और अस्पताल के वैकल्पिक संसाधनों के विफल होने की गहराई से जांच करेगी।
डिप्टी कमिश्नर ने स्पष्ट किया है कि अस्पताल में डीजल जनरेटर, सोलर पावर सिस्टम और इन्वर्टर जैसे कई विकल्प मौजूद थे। जांच का मुख्य बिंदु यह होगा कि इन सभी विकल्पों के होते हुए भी प्रसव अंधेरे में क्यों कराया गया। क्या उपकरणों के रखरखाव में कोताही बरती गई थी या फिर यह केवल मानवीय भूल थी। प्रशासन ने जांच टीम को सोमवार शाम तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट के आधार पर जो भी कर्मचारी या डॉक्टर दोषी पाया जाएगा उस पर सख्त से सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी की दलील और संसाधनों की विफलता
इस पूरे मामले पर राजनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. श्याम सोरेन ने अपना पक्ष रखा है। उनका कहना है कि जिस समय डिलीवरी की प्रक्रिया चल रही थी उस समय मौसम बहुत खराब था और भारी बारिश के साथ तूफान चल रहा था जिसकी वजह से मुख्य बिजली लाइन कट गई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय सोलर पावर सिस्टम में तकनीकी खराबी थी और इन्वर्टर के साथ-साथ डीजल जनरेटर भी काम नहीं कर रहा था। डॉ. सोरेन ने बताया कि उन्होंने हाल ही में इस केंद्र का कार्यभार संभाला है और वे मरम्मत कार्य की प्रक्रिया शुरू कर ही रहे थे कि यह दुखद घटना घट गई।
डॉक्टरों की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार महिला की डिलीवरी नॉर्मल हो रही थी लेकिन प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव यानी पोस्टपार्टम हैमरेज के कारण स्थिति बिगड़ गई। अत्यधिक खून बह जाने की वजह से मां और बच्चे की जान नहीं बचाई जा सकी। हालांकि ग्रामीण और परिजन इस दलील को मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर अस्पताल में पर्याप्त रोशनी और आधुनिक उपकरण क्रियाशील होते तो रक्तस्राव को नियंत्रित किया जा सकता था। अंधेरे में इलाज करना सीधे तौर पर मरीज की जान के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।
झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं
यह घटना झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति को दर्शाती है। करोड़ों रुपये का बजट खर्च करने के बावजूद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। जनरेटर के लिए तेल न होना या खराब मशीनों का महीनों तक ठीक न होना एक आम समस्या बन गई है। सरायकेला की इस घटना ने सरकार के उन दावों की भी पोल खोल दी है जिसमें हर गांव और हर अस्पताल तक निर्बाध बिजली और बेहतर इलाज की बात कही जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि राजनगर अस्पताल में अक्सर सुविधाओं की कमी रहती है लेकिन इस बार लापरवाही ने सीमा पार कर दी। एक तरफ राज्य सरकार मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए बड़े-बड़े अभियान चला रही है वहीं दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में मोबाइल टॉर्च के सहारे ऑपरेशन और प्रसव हो रहे हैं। इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या वे नियमित रूप से इन केंद्रों का निरीक्षण करते हैं या नहीं।
न्याय की उम्मीद और भविष्य के लिए सबक
फिलहाल पूरे क्षेत्र में मातम का माहौल है और लोग जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। पीड़ित परिवार को उम्मीद है कि प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति नहीं करेगा बल्कि दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजेगा। इस मामले ने यह भी संदेश दिया है कि केवल भवनों का निर्माण कर देने से स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर नहीं हो जातीं जब तक कि वहां तैनात स्टाफ संवेदनशील न हो और जीवन रक्षक उपकरण सही स्थिति में न हों।
सरायकेला जिला प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह इस जांच के माध्यम से अन्य अस्पतालों को भी यह कड़ा संदेश दे कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस घटना के बाद राज्य के अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के जनरेटर और इन्वर्टर ठीक किए जाते हैं या फिर एक और मौत का इंतजार किया जाएगा। फिलहाल इस घटना ने झारखंड की जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वे सरकारी अस्पतालों के भरोसे सुरक्षित हैं।
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