TMC Committee Chairperson: संसद की विभाग संबंधी स्थायी समितियों का 2026-27 के लिए पुनर्गठन कर दिया गया है। इस बदलाव में तृणमूल कांग्रेस को दो प्रमुख समितियों की चेयरपर्सनशिप गंवानी पड़ी है। राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शनिवार को समितियों के नए स्वरूप की घोषणा की। बीजेपी के सुधांशु त्रिवेदी को वाणिज्य समिति का नया अध्यक्ष बनाया गया है जबकि रसायन और उर्वरक समिति की जिम्मेदारी टीएमसी की बागी नेता काकोली घोष दस्तीदार को सौंपी गई है।
टीएमसी ने राज्यसभा के तहत आने वाली आठ समितियों में से किसी भी समिति की चेयरपर्सनशिप न मिलने पर आपत्ति जताई है। पार्टी के राज्यसभा नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने राज्यसभा सभापति को पत्र लिखकर इस मुद्दे को उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद को एक गहरा और अंधेरा कक्ष बनाया जा रहा है।
पुनर्गठन के दौरान कई समितियों के पुराने चेयरपर्सन को बरकरार रखा गया है जबकि कुछ जगहों पर नए चेहरे लाए गए हैं। कुल 24 विभाग संबंधी स्थायी समितियां हैं जिनमें से आठ राज्यसभा के सभापति के अधीन और 16 लोकसभा अध्यक्ष के निर्देशन में काम करती हैं। इनका कार्यकाल एक साल का होता है जिसके बाद दोबारा गठन किया जाता है।
किन समितियों में हुए प्रमुख बदलाव?
वाणिज्य से जुड़ी संसदीय समिति के नए चेयरपर्सन बीजेपी के सुधांशु त्रिवेदी बनाए गए हैं। उन्होंने टीएमसी की डोला सेन की जगह ली है। वहीं रसायन और उर्वरक समिति की चेयरपर्सन काकोली घोष दस्तीदार बनीं। उन्होंने अपनी पूर्व पार्टी सहयोगी कीर्ति आजाद की जगह यह जिम्मेदारी संभाली है।
इन दो बदलावों को टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। दोनों समितियां महत्वपूर्ण मानी जाती हैं और इनकी कमान पहले टीएमसी के पास थी। अब एक समिति बीजेपी के पास चली गई है जबकि दूसरी समिति टीएमसी से अलग हुए बागी गुट के पास पहुंच गई है।
पुनर्गठन की प्रक्रिया में राज्यसभा और लोकसभा दोनों स्तरों पर समितियों का नया स्वरूप तय किया गया। शनिवार को हुई घोषणा के बाद दलों के बीच चर्चा तेज हो गई है। कई दल अपने सदस्यों को मिली जिम्मेदारियों से संतुष्ट नजर आए जबकि टीएमसी ने असहमति जताई है।
TMC को क्यों लगा बड़ा झटका?
टीएमसी में हालिया टूट के कारण संसदीय समितियों में उसकी स्थिति प्रभावित हुई है। पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों के अलग होने के बाद संख्या बल में कमी आई है। इन्हीं बागी सांसदों का नेतृत्व काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं जिन्होंने नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी बनाई है और एनडीए को समर्थन देने का एलान किया है।
इस बदलाव का सीधा असर समितियों के आवंटन पर पड़ा है। टीएमसी को राज्यसभा के अधीन आने वाली आठ समितियों में से किसी की भी चेयरपर्सनशिप नहीं मिली। पार्टी का कहना है कि पहले के वर्षों में उसे ये जिम्मेदारियां दी गई थीं लेकिन इस बार उससे छीन ली गई हैं।
डेरेक ओ’ब्रायन ने अपने पत्र में कहा कि राज्यसभा में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है। इसके बाद कांग्रेस और फिर टीएमसी का स्थान आता है। उन्होंने 2024-25 और 2025-26 में मिली चेयरपर्सनशिप का जिक्र करते हुए पूछा कि अब ये जिम्मेदारियां क्यों ले ली गईं। उन्होंने 2019 का भी उदाहरण दिया जब उनके अनुसार टीएमसी को वंचित किया गया था और बाद में सुधार हुआ था।
बागी नेताओं और अन्य दलों को क्या मिला?
टीएमसी से अलग हुए गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार को रसायन और उर्वरक समिति की चेयरपर्सनशिप मिली है। यह उनके लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानी जा रही है। वहीं बीजेपी के सुधांशु त्रिवेदी को वाणिज्य समिति सौंपी गई है।
कई अन्य नेताओं को पुरानी जिम्मेदारियां फिर से दी गई हैं। डीएमके के तिरुचि शिवा को उद्योग समिति का चेयरपर्सन फिर बनाया गया है। कनिमोझी को खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण समिति की जिम्मेदारी मिली है। कांग्रेस के शशि थरूर विदेश मामलों की समिति के चेयरपर्सन बने रहेंगे। चरणजीत सिंह चन्नी कृषि समिति और मुकुल वासनिक शिक्षा, महिला, बाल एवं युवा मामलों की समिति की कमान संभालते रहेंगे।
समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव स्वास्थ्य और परिवार कल्याण समिति के चेयरपर्सन बने रहेंगे। बीजेपी के राधा मोहन सिंह को रक्षा समिति, अनुराग ठाकुर को कोयला, खान और इस्पात समिति, भरतृहरि महताब को वित्त समिति तथा राधा मोहन दास अग्रवाल को गृह मामलों की समिति सौंपी गई है। निशिकांत दुबे संचार और सूचना प्रौद्योगिकी समिति के प्रमुख बने रहेंगे।
TMC ने क्या आपत्ति जताई है?
टीएमसी के राज्यसभा नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि राज्यसभा के अधीन आने वाली आठ समितियों में से टीएमसी को एक भी चेयरपर्सनशिप नहीं मिली। यह स्थिति उनके अनुसार पहले भी बनी थी और बाद में सुधार किया गया था।
ओ’ब्रायन ने आरोप लगाया कि संसद को एक गहरा और अंधेरा कक्ष बनाया जा रहा है। उन्होंने अपने पत्र में विस्तार से पार्टी की स्थिति और पिछले वर्षों की तुलना पेश की। पार्टी का मानना है कि संख्या बल के हिसाब से उसे उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए था।
टीएमसी ने इस बदलाव को पार्टी में हुई टूट से जोड़कर देखा है। बागी सांसदों के अलग होने के बाद समितियों के आवंटन में बदलाव स्वाभाविक माना जा रहा है लेकिन पार्टी इसे राजनीतिक रूप से नुकसानदेह बता रही है।
अन्य सहयोगी दलों को क्या जिम्मेदारियां मिलीं?
एनडीए के सहयोगी दलों को भी महत्वपूर्ण समितियों की कमान सौंपी गई है। जदयू के संजय कुमार झा को परिवहन, पर्यटन और संस्कृति समिति का चेयरपर्सन फिर बनाया गया है। शिवसेना के श्रीरंग बारणे ऊर्जा समिति के प्रमुख बने रहेंगे। एनसीपी के सुनील तटकरे को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस समिति का चेयरपर्सन बनाया गया है।
बीजेपी और उसके सहयोगियों को कई प्रमुख समितियों में जगह मिली है। रक्षा, वित्त, गृह, कोयला और संचार जैसी महत्वपूर्ण समितियों की कमान उनके पास ही रहने दी गई है। यह आवंटन दलों की संख्या और संसदीय परंपराओं को ध्यान में रखकर किया गया है।
कुल मिलाकर इस पुनर्गठन में कुछ जगहों पर निरंतरता बनाए रखी गई है तो कुछ जगहों पर नए चेहरे लाए गए हैं। टीएमसी के लिए दो समितियों की कमान गंवाना सबसे बड़ा बदलाव रहा है। अब देखना यह होगा कि पार्टी आगे इस मुद्दे को किस तरह उठाती है और सभापति महोदय के पास भेजे गए पत्र का क्या जवाब मिलता है।
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Sanjana Gupta
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