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Uttarakhand Politics: कांग्रेस ने खरगे के उत्तराखंड विवाद को दलित खतरे में हैं नैरेटिव से जोड़ा

Uttarakhand Politics: मानसून सत्र के आखिरी दिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उत्तराखंड भाजपा इकाई पर आरोप लगाया था कि हल्द्वानी रैली के बाद शुद्धिकरण समारोह कराया गया क्योंकि वे दलित हैं। उसके बाद पार्टी काफी हद तक चुप रही।

सोनिया गांधी खरगे के साथ राज्यसभा अध्यक्ष से शिकायत करने गईं। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में खरगे ने कहा कि पार्टी के कई नेताओं ने मुद्दा नहीं उठाया। एक सप्ताह बाद राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के साथ कांग्रेस ने इस विषय पर जोरदार अभियान शुरू किया। सूत्रों के विश्लेषण के अनुसार पार्टी इसे सिर्फ खरगे के समर्थन तक सीमित नहीं रखना चाहती। नजर उत्तर प्रदेश पंजाब विधानसभा चुनावों और 2029 लोकसभा पर है।

Uttarakhand Politics: खरगे के आरोप के बाद पार्टी का रुख

खरगे ने आरोप लगाया कि हल्द्वानी रैली के बाद भाजपा इकाई ने शुद्धिकरण कराया। उन्होंने इसे अपनी जाति से जोड़ा। सत्र समाप्त होने के बाद कांग्रेस ज्यादा मुखर नहीं रही। सोनिया गांधी के साथ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई। कार्यसमिति में खरगे ने आंतरिक उदासीनता का जिक्र किया। इसके बाद पार्टी स्तर पर मुद्दा जोरशोर से उठाया जाने लगा।

राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बदलाव

खरगे की टिप्पणी के लगभग एक सप्ताह बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उसके बाद कांग्रेस ने विषय को व्यापक बनाने की कोशिश की। पार्टी इसे व्यक्तिगत अपमान से आगे ले जाकर सामाजिक न्याय का मुद्दा बनाना चाहती है। खरगे इस नैरेटिव के तात्कालिक केंद्र बने हुए हैं। संगठन स्तर पर प्रचार तेज किया गया है।

Uttarakhand Politics: चुनावी गणित क्या बताया जा रहा है

देश में दलित आबादी करीब 16 प्रतिशत बताई जाती है। उत्तर प्रदेश में यह हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है। पंजाब में अनुसूचित जाति आबादी करीब 32 प्रतिशत है। कांग्रेस का आकलन है कि 2024 लोकसभा में संविधान खतरे में हैं वाला नारा कुछ दलित वर्गों को जोड़ने में सहायक रहा। भाजपा तब पूर्ण बहुमत से चूक गई थी। अब दलित खतरे में हैं जैसा संदेश दोहराने की कोशिश बताई जा रही है।

दलित वोट को लेकर क्या चुनौतियां हैं

दलित वोट एकमात्र पार्टी के पास नहीं है। बसपा अभी भी महत्वपूर्ण ताकत बनी हुई है। चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी इसी राजनीतिक स्थान पर दावा कर रही है। प्रतिस्पर्धा तेज है इसलिए एक नारे से समेकन आसान नहीं माना जाता। कांग्रेस को इन विकल्पों के बीच जगह बनानी होगी। राज्य स्तर पर समीकरण अलग-अलग हैं।

भाजपा का प्रति-नैरेटिव क्या है

भाजपा का तर्क है कि दलितों को सिर्फ वोट बैंक की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। पार्टी का दावा है कि केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंच रहा है। उत्तराखंड विवाद पर सत्ता पक्ष ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब जाति संबंधी टिप्पणियों से भी दिया है। दोनों पक्ष अपने-अपने संदेश पर अड़े हैं। बहस अब चुनावी मैदान की ओर बढ़ रही है।

Uttarakhand Politics: पंजाब 2022 का उदाहरण क्यों याद किया जाता है

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री चेहरा बनाया था। वे दलित नेता हैं फिर भी पार्टी जीत नहीं सकी। यह उदाहरण बताता है कि केवल चेहरा या नारा पर्याप्त नहीं होता। संगठन और स्थानीय समीकरण भी मायने रखते हैं। कांग्रेस के लिए यह सावधानी भरा सबक माना जा रहा है।

कांग्रेस खरगे के हल्द्वानी शुद्धिकरण आरोप को व्यापक दलित सुरक्षा के नैरेटिव से जोड़ रही है। पार्टी का आकलन है कि 2024 वाले संविधान वाले नारे की तरह यह संदेश उत्तर प्रदेश और पंजाब में मदद कर सकता है और 2029 की तैयारी का हिस्सा बन सकता है। साथ ही बसपा और अन्य दलित नेतृत्व वाले दलों की मौजूदगी बड़ी चुनौती है।

भाजपा योजनाओं के सीधे लाभ का दावा कर जवाब दे रही है। पंजाब 2022 का अनुभव दिखाता है कि प्रतीकात्मक कदम जीत की गारंटी नहीं होते। आगे दोनों पक्ष इसी मुद्दे पर अपने संदेश को और पैना करेंगे।

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Netsha Singh
Author: Netsha Singh

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