West Bengal GI Tag Products: पश्चिम बंगाल के पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। देशी खस्सी के मांस, हिल्सा मछली से बने उत्पादों और सूखी झींगा मछली के लिए आवेदन मंजूर हो गए हैं। राज्य सरकार, नाबार्ड और सूक्ष्म, लघु एवं कुटीर उद्योग विभाग की सक्रियता से यह प्रक्रिया आगे बढ़ी है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अगले एक वर्ष के भीतर इन उत्पादों को अंतिम जीआई टैग मिल सकता है।
राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद इन उत्पादों को विशिष्ट पहचान दिलाने की पहल तेज हुई है। संबंधित क्षेत्रों के कलाकारों और कारोबारियों के संगठनों ने आवेदन की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाई है। जीआई विशेषज्ञ रजनीकांत के अनुसार राज्य सरकार के सहयोग से काम आगे बढ़ा है।
West Bengal GI Tag Products: किन उत्पादों के लिए आवेदन मंजूर हुए हैं?
जानकारी के मुताबिक देशी खस्सी के मांस, हिल्सा से बने उत्पादों और सूखी झींगा मछली के लिए इस महीने के पहले पखवाड़े में आवेदन मंजूर किए गए हैं। हालांकि इन उत्पादों को अंतिम रूप से जीआई टैग मिलने की प्रक्रिया अभी पूरी होनी बाकी है। राज्य के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कल्याण चक्रवर्ती के अनुसार कई उत्पादों के लिए आवेदन किए गए हैं।
देशी खस्सी का मांस और सूखी झींगा मछली शामिल हैं जबकि हिल्सा से बने उत्पाद के लिए एक निजी संगठन ने आवेदन किया है। मंत्री ने कहा कि इन पहलों से राज्य के पारंपरिक उत्पादों की विशिष्टता और पहचान सामने आएगी। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अगले एक वर्ष के भीतर ये उत्पाद जीआई टैग हासिल कर सकते हैं।
जीआई टैग की प्रक्रिया में किन विभागों ने भूमिका निभाई?
जीआई विशेषज्ञ रजनीकांत ने बताया कि बंगाल के पारंपरिक उत्पादों को यह दर्जा दिलाने के लिए पहले भी प्रयास किए गए थे। नई सरकार के गठन के बाद इस विषय पर उच्च स्तर पर बातचीत हुई। सूक्ष्म, लघु एवं कुटीर उद्योग विभाग के प्रधान सचिव अनूप अग्रवाल ने भी इस प्रक्रिया में सहयोग किया। नाबार्ड के पूर्वी क्षेत्रीय कार्यालय और एमएसएमई विभाग की सक्रियता से काम आगे बढ़ा।
सामान्य तौर पर जीआई से जुड़े मामले राज्य का विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग देखता है। इस बार सूक्ष्म, लघु एवं कुटीर उद्योग विभाग को भी जिम्मेदारी दी गई है। दोनों विभागों के सहयोग से आवेदन प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी। संबंधित संगठनों ने दस्तावेज और सबूत जुटाने में मदद की।
कुम्हारटोली की प्रतिमाओं और अन्य उत्पादों का क्या हाल है?
बंगाल के पारंपरिक हस्तशिल्प को जीआई पहचान दिलाने की पहल केवल मछली और मांस तक सीमित नहीं है। कोलकाता के कुम्हारटोली में बनने वाली दुर्गा प्रतिमाओं के लिए भी एक संगठन के माध्यम से आवेदन किया गया है। विशेषज्ञ को उम्मीद है कि अगले दो-तीन महीनों में इस मामले में सकारात्मक परिणाम मिल सकता है।
इसके अलावा बंगाल के जूट से बने औद्योगिक उत्पादों और चालताबेड़िया की टेराकोटा कला के लिए भी आवेदन मंजूर होने की जानकारी दी गई है। ये सभी प्रयास राज्य की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को मजबूत करने की दिशा में हैं। कुम्हारटोली की प्रतिमाएं बंगाल की पहचान मानी जाती हैं।
जीआई टैग मिलने से क्या फायदे होंगे?
जीआई टैग मिलने से किसी क्षेत्र के विशिष्ट उत्पाद की भौगोलिक पहचान सुरक्षित होती है। इससे बाजार में उसकी अलग पहचान बनाने में मदद मिलती है। बंगाल के पारंपरिक खाद्य उत्पादों और हस्तशिल्प को यह दर्जा मिलने पर स्थानीय उत्पादकों, कारीगरों और कारोबारियों को लाभ मिलने की संभावना है।
उत्पादों की क्वालिटी और उत्पत्ति की गारंटी मिलती है। नकली उत्पादों से सुरक्षा होती है और निर्यात की संभावनाएं बढ़ती हैं। किसानों, मछुआरों और कारीगरों की आय में वृद्धि हो सकती है। राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।
आगे की प्रक्रिया क्या है और कब मिल सकता है टैग?
आवेदन मंजूर हो चुके हैं लेकिन अंतिम जीआई टैग मिलने की प्रक्रिया अभी बाकी है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अगले एक वर्ष के भीतर देशी खस्सी मांस, हिल्सा उत्पाद और सूखी झींगा को यह पहचान मिल सकती है। कुम्हारटोली प्रतिमाओं के मामले में दो-तीन महीने में नतीजा आ सकता है।
राज्य सरकार और संबंधित विभागों की सक्रियता से प्रक्रिया तेज हुई है। दस्तावेजों की जांच और सत्यापन के बाद टैग जारी किया जाता है। स्थानीय संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। आगे भी निगरानी और प्रमोशन की जरूरत रहेगी ताकि टैग का पूरा लाभ मिल सके।
कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल के देशी खस्सी मांस, हिल्सा उत्पादों और सूखी झींगा मछली को जीआई टैग मिलने की संभावना मजबूत हुई है। आवेदन मंजूर हो चुके हैं और अगले एक वर्ष में अंतिम पहचान मिलने की उम्मीद है। कुम्हारटोली प्रतिमाएं और जूट उत्पाद भी दौड़ में हैं। यह कदम राज्य के पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में मदद करेगा।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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